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surah Nisa in hindi

सूरए निसा

सूरए निसा 
सूरए (1) निसा मदीने में उतरी, आयतें 176, रूकू चौबीस, 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला 

सूरए निसा – पहला रूकू

ऐ लोगों (2)
अपने रब से डरो जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया (3)
और उसी में उसका जोड़ा बनाया और उन दोनों से बहुत से मर्द व औरत फैला दिये और अल्लाह से डरो जिसके नाम पर मांगते हो और रिश्तों का लिहाज़ रखो(4)
बेशक अल्लाह हर वक़्त तुम्हें देख रहा है (1)और यतीमों को उनके माल दो (5)
और सुथरे(6)
के बदले गन्दा न लो(7)
और उनके माल अपने मालों में मिला कर न खा जाओ बेशक यह बड़ा गुनाह है (2) और अगर तुम्हें डर हो कि यतीम (अनाथ) लड़कियों में इन्साफ़ न करोगे (8)
तो निकाह में लाओ जो औरतें तुम्हें ख़ुश आऐं दो दो और तीन तीन और चार चार (9)
फिर अगर डरो कि दो बीवियों को बराबर न रख सकोगे तो एक ही करो या कनीज़े (दासियां) जिनके तुम मालिक हो पर उससे ज़्यादा क़रीब है कि तुम से ज़ुल्म न हो  (10)(3)
और औरतों को उनके मेहर ख़ुशी से दो(11)
फिर अगर वो अपने दिल की ख़ुशी से मेहर में से तुम्हें कुछ दें तो उसे खाओ रचता पचता (12) (4)
और बेअक़्लों को (13)
उनके माल न दो जो तुम्हारे पास हैं जिनको अल्लाह ने तुम्हारी बसर औक़ात (गुज़ारा) किया है और उन्हें उसमें से खिलाओ और पहनाओ और उनसे अच्छी बात कहो (14) (5)
और यतीमों को आज़माते रहो  (15)
यहां तक कि जब वह निकाह के क़ाबिल हों तो अगर तुम उनकी समझ ठीक देखो तो उनके माल उन्हें सुपुर्द कर दो और उन्हें न खाओ हद से बढ़कर और इस जल्दी में कि कहीं बड़े न हो जाएं और जिसे हाजत (आवश्यकता) न हो वह बचता रहे (16)
और जो हाजत वाला हो वह मुनासिब हद तक खाए फिर जब तुम उनके माल उन्हें सुपुर्द करो तो उनपर गवाह कर लो और अल्लाह काफ़ी है हिसाब लेने को (6) मर्दों के लिये हिस्सा है उसमें से जो छोड़ गए मां बाप और क़रावत (रिश्तेदार) वाले और औरतों के लिये हिस्सा है उसमें से जो छोड़ गए मां बाप  और क़रावत वाले तर्का (माल व जायदाद) थोड़ा हो या बहुत, हिस्सा है अन्दाज़ा बांधा हुआ(17) (7)
फिर बांटते वक़्त अगर रिश्तेदार और यतीम और मिस्कीन (दरिद्र) (18)
आजाएं तो उसमें से उन्हें भी कुछ दो  (19)
और उनसे अच्छी बात कहो (20) (8)
और डरें (21) वो लोग अगर अपने बाद कमज़ोर औलाद छोड़ते तो उनका कैसा उन्हें ख़तरा होता तो चाहिये कि अल्लाह से डरें (22)
और सीधी बात करें (23)  (9)
वो जो यतीमों का माल नाहक़ खाते हैं वो तो अपने पेट में निरी आग भरते हैं (24)
और कोई दम जाता है कि भड़कते धड़े में जाएंगे (10)

surah nisa ruku 1

तफ़सीर : 
सूरए निसा – पहला रूकू

(1) सूरए निसा मदीनए तैय्यिबह में उतरी, इसमें 24 रूकू, 176 आयतें, 3045 कलिमे और 16030 अक्षर हैं.

(2) ये सम्बोधन आया है तमाम आदमी की औलाद को.

(3) अबुल बशर हज़रत आदम से, जिनको माँ बाप के बग़ैर मिट्टी से पैदा किया था. इन्सान की पैदाइश के आरम्भ का बयान करके अल्लाह की क़ुदरत की महानता का बयान फ़रमाया गया. अगरचे दुनिया के बेदीन अपनी बेअक़्ली और नासमझी से इसका मज़ाक़ उड़ाते हैं लेकिन समझ वाले और अक़्ल वाले जानते हैं कि ये मज़मून ऐसी ज़बरदस्त बुरहान से साबित है जिसका इन्कार असभंव है. जन गणना का हिसाब बता देता है कि आज से सौ बरस पहले दुनिया में इन्सानों की संख्या आज से बहुत कम थी और इससे सौ बरस पहले और भी कम. तो इस तरह अतीत की तरफ़ चलते चलते इस कमी की हद एक ज़ात क़रार पाएगी या यूँ कहिये कि क़बीलों की बहुसंख्या एक व्यक्ति की तरफ़ ख़त्म हो जाती है. मसलन, सैयद दुनिया में करोड़ो पाए जाएंगे मगर अतीत की तरफ़ उनका अन्त सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की एक ज़ात पर होगा और बनी इस्त्राईल कितने भी ज़्यादा हों मगर इस तमाम ज़ियादती का स्त्रोत हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम की एक ज़ात होगी. इसी तरह और ऊपर को चलना शुरू करें तो इन्सान के तमाम समुदायों और क़बीलों का अन्त एक ज़ात पर होगा, उसका नाम अल्लाह की किताबों में आदम अलैहिस्सलाम है और मुमकिन नहीं कि वह एक व्यक्ति मानव उत्पत्ति या इन्सानी पैदायश के मामूली तरीक़े से पैदा हो सके. अगर उसके लिये बाप भी मान लिया जाये तो माँ कहाँ से आए. इसलिये ज़रूरी है कि उसकी पैदायश बग़ैर माँ बाप के हो और जब बग़ैर माँ बाप के पैदा हुआ तो यक़ीनन उन्हीं अनासिर या तत्वों से पैदा होगा जो उसके अस्तित्व या वुजूद में पाए जाते हैं. फिर तत्वों में से वह तत्व उसका ठिकाना हो और जिसके सिवा दूसरे में वह न रह सके, लाज़िम है कि वही उसके वुजूद में ग़ालिब हो इसलिये पैदायश की निस्बत उसी तत्व की तरफ़ की जाएगी. यह भी ज़ाहिर है कि मानव उत्पत्ति का मामूली तरीक़ा एक व्यक्ति से जारी नहीं हो सकता, इसलिये उसके साथ एक और भी हो कि जोड़ा हो जाए और वह दूसरा व्यक्ति जो उसके बाद पैदा हो तो हिकमत का तक़ाज़ा यही है कि उसी के जिस्म से पैदा किया जाए क्योंकि एक व्यक्ति के पैदा होने से नस्ल तो पैदा हो चुकी मगर यह भी लाज़िम है कि उसकी बनावट पहले इन्सान से साधारण उत्पत्ति के अलावा किसी और तरीक़े से हो, क्योंकि साधारण उत्पत्ति दो के बिना संभव ही नहीं और यहाँ एक ही है. लिहाज़ा अल्लाह की हिकमत ने हज़रत आदम की एक बाईं पसली उनके सोते में निकाली और उससे उनकी बीबी हज़रत हव्वा को पैदा किया. चूंकि हज़रत हव्वा साधारण उत्पत्ति के तरीक़े से पैदा नहीं हुईं इसलिये वह औलाद नहीं हो सकतीं जिस तरह कि इस तरीक़े के ख़िलाफ़ मानव शरीर से बहुत से कीड़े पैदा हुआ करते हैं, वो उसकी औलाद नहीं हो सकते हैं. नींद से जागकर हज़रत आदम ने अपने पास हज़रत हव्वा को देखा तो अपने जैसे दूसरे को पाने की महब्बत दिल में पैदा हुई. उनसे फ़रमाया तुम कौन हो. उन्हों ने अर्ज़ किया औरत. फ़रमाया, किस लिये पैदा की गई हो. अर्ज़ किया आपका दिल बहलाने के लिये. तो आप उनसे मानूस हुए.

(4) उन्हें तोड़ो या काटे मत. हदीस शरीफ़ में है, जो रिज़्क़ में बढ़ौतरी चाहे उसको चाहिये कि अपने रिशतेदारों के साथ मेहरबानी से पेश आए और उनके अधिकारों का ख़याल रखे.

(5) एक व्यक्ति की निगरानी में उसके अनाथ भतीजे का बहुत सा माल था. जब वह यतीम बालिग़ हुआ और उसने अपना माल तलब किया तो चचा ने देने से इन्कार कर दिया. इस पर यह आयत उतरी. इसको सुनकर उस व्यक्ति ने यतीम का माल उसके हवाले किया और कहा कि हम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करते है.

(6) यानी अपने हलाल माल.

(7) यतीम का माल जो तुम्हारे लिये हराम है, उसको अच्छा समझकर अपने रद्दी माल से न बदलो क्योंकि वह रद्दी तुम्हारे लिये हलाल और पाक है, और यह हराम और नापाक.

(8) और उनके अधिकार का ख़याल न रख सकोगे.

(9) आयत के मानी में विभिन्न क़ौल हैं. हसन का क़ौल है कि पहले ज़माने में मदीने के लोग अपनी सरपरस्ती वाली यतीम लड़की से उसके माल की वजह से निकाह कर लेते जबकि उसकी तरफ़ रग़बत न होती. फिर उसके साथ सहवास में अच्छा व्यवहार न करते और उसके माल के वारिस बनने के लिये उसकी मौत की प्रतीक्षा करतें. इस आयत में उन्हें इससे रोका गया. एक क़ौल यह है कि लोग यतीमों की सरपरस्ती से तो बेइन्साफ़ी होने के डर से घबराते थे और ज़िना की पर्वाह न करते थे. उन्हें बताया गया कि अगर तुम नाइन्साफ़ी के डर से यतीमों की सरपरस्ती से बचते हो तो ज़िना से भी डरो और इससे बचने के लिये जो औरतें तुम्हारे लिये हलाल हैं उनसे निकाह करो और हराम के क़रीब मत जाओ. एक क़ौल यह है कि लोग यतीमों की विलायत और सरपरस्ती में तो नाइन्साफ़ी का डर करते थे और बहुत से निकाह करने में कुछ भी नहीं हिचकिचाते थे. उन्हें बताया गया कि जब ज़्यादा औरतें निकाह में हों तो उनके हक़ में नाइन्साफ़ी होने से डरो. उतनी ही औरतों से निकाह करो जिनके अधिकार अदा कर सको. इकरिमा ने हज़रत इब्ने अब्बास से रिवायत की कि क़ुरैश दस दस बल्कि इससे ज़्यादा औरतें करते थे और जब उनका बोझ न उठ सकता तो जो यतीम लड़कियाँ उनकी सरपरस्ती में होतीं उनके माल ख़्रर्च कर डालते. इस आयत में फ़रमाया गया कि अपनी क्षमता देख ली और चार से ज़्यादा न करो ताकि तुम्हें यतीमों का माल ख़र्च करने की ज़रूरत पेश न आए. इस आयत से मालूम हुआ कि आज़ाद मर्द के लिये एक वक़्त में चार औरतों तक से निकाह जायज़ है, चाहे वो आज़ाद हों या दासी. तमाम उम्मत की सहमित है कि एक वक़्त में चार औरतों से ज़्यादा निकाह में रखना किसी के लिये जायज़ नहीं सिवाय रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के. यह आप की विशेषताओं में से हैं. अबू दाऊद की हदीस में है कि एक व्यक्ति इस्लाम लाए. उनकी आठ बीबीयाँ थीं. हुज़ूर ने फ़रमाया उनमें से चार रखना. तिरमिज़ी की हदीस में है कि ग़ीलान बिन सलमा सक़फ़ी इस्लाम लाए. उनकी दस बीबीयाँ थीं. वो साथ मुसलमान हुई. हुज़ूर ने हुक्म दिया, इनमें से चार रखो.

(10) इससे मालूम हुआ कि बीबीयों के बीच इन्साफ़ फ़र्ज़ है. नई पुरानी, सब अधिकारों में बराबर हैं. ये इन्साफ़ लिबास में, खाने पीने में, रहने की जगह में, और रात के सहवास में अनिवार्य है. इन बातों में सब के साथ एक सा सुलूक हो.

(11) इससे मालूम हुआ कि मेहर की अधिकारी औरतें हैं न कि उनके सरपरस्त. अगर सरपरस्तों ने मेहर वसूल कर लिया हो तो उन्हें लाज़िम है कि वो मेहर हक़दार औरत को पहुंचा दें.

(12) औरतों की इख़्तियार है कि वो अपने शौहरों को मेहर का कोई हिस्सा हिबा करें या कुल मेहर मगर मेहर बख़्शवाने के लिये उन्हें मजबूर करना, उनके साथ दुर्व्यवहार न करना चाहिये क्योंकि अल्लाह तआला ने “तिब्ना लकुम” फ़रमाया जिसका मतलब है दिल की ख़ुशी के साथ माफ़ करना.

(13) जो इतनी समझ नहीं रखते कि माल कहाँ ख़र्च किया जाए इसे पहचानें. और जो माल को बेमहल ख़र्च करते हैं और अगर उन पर छोड़ दिया जाए तो वो जल्द नष्ट कर देंगे.

(14) जिससे उनके दिल की तसल्ली हो और वो परेशान न हों जैसे यह कि माल तुम्हारा है और तुम होशियार हो जाओगे तो तुम्हारे सुपुर्द कर दिया जाएगा.

(15) कि उनमें होशियारी और मामला जानने की समझ पैदा हुई या नहीं.

(16) यतीम का माल खाने से.

(17) जिहालत के ज़माने में औरतों और बच्चों को विरासत न देते थे. इस आयत में उस रस्म को बातिल किया गया.

(18) अजनबी, जिन में से कोई मैयत का वारिस न हो.

(19) तक़सीम से पहले, और यह देना मुस्तहब है.

(20) इसमें ख़ूबसूरत बहाना, अच्छा वादा और भलाई की दुआ, सब शामिल हैं. इस आयत में मैयत के तर्के से ग़ैर वारिस रिशतेदारों और यतीमों और मिस्कीनों को कुछ सदक़े के तौर पर देने और अच्छी बात कहने का हुक्म दिया. सहाबा के ज़माने में इस पर अमल था. मुहम्मद बिन सीरीन से रिवायत है कि उनके वालिद ने विरासत की तक़सीम के वक़्त एक बकरी ज़िबह कराके खाना पकाया और रिश्तेदारों, यतीमों और मिस्कीनों को खिलाया और यह आयत पढ़ी. इब्ने सीरीन ने इसी मज़मून की उबैदा सलमानी से भी रिवायत की है. उसमें यह भी है कि कहा अगर यह आयत न आई होती तो यह सदक़ा मैं अपने माल से करता. तीजा, जिसको सोयम कहते हैं और मुसलमानों का तरीक़ा है, वह भी इसी आयत का अनुकरण है कि उसमें रिश्तेदारों यतीमों और मिस्कीनों पर सदक़ा होता है और कलिमे का ख़त्म और क़ुरआने पाक की तिलावत और दुआ अच्छी बात है. इसमें कुछ लोगों को बेजा इसरार हो गया है जो बुजुर्गों के इस अमल का स्त्रोत तो तलाश कर न सके, जब कि इतना साफ़ क़ुरआन पाक में मौजूद था, अलबत्ता उन्होंने अपनी राय को दीन में दख़्ल दिया और अच्छे काम को रोकने में जुट गये, अल्लाह हिदायत करे.

(21) जिसके नाम वसिय्यत की गई वह और यतीमों के सरपरस्त और वो लोग जो मौत के क़रीब मरने वाले के पास मौजूद हों.

(22) और मरने वाले की औलाद के साथ मेहरबानी के अलावा कोई कायर्वाही न करें जिससे उसकी औलाद परेशान हो.

(23) मरीज़ के पास उसकी मौत के क़रीब मौजूद होने वालों की सीधी बात तो यह है कि उसे सदक़ा और वसिय्यत में यह राय दें कि वह उतने माल से करे जिससे उसकी औलाद तंगदस्त और नादार न रह जाए और वसी यानी जिसके नाम वसिय्यत की जाए और वली यानी सरपरस्त की सीधी बात यह है कि वो मरने वाले की ज़ुर्रियत के साथ सदव्यवहार करें, अच्छे से बात करें जैसा कि अपनी औलाद के साथ करते हैं.

(24) यानी यतीमों का माल नाहक़ खाना मानो आग खाना है. क्योंकि वह अज़ाब का कारण है. हदीस शरीफ़ में है, क़यामत के दिन यतीमों का माल खाने वाले इस तरह उठाए जाएंगे कि उनकी क़ब्रों से और उनके मुंह से और उनके कानों से धुवाँ निकलता होगा तो लोग पहचानेंगे कि यह यतीम का माल खाने वाला ह

सूरए निसा _ दूसरा रूकू

सूरए निसा _ दूसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है (1) 
तुम्हारी औलाद के बारे में  (2)
बेटे का हिस्सा दो बेटियों के बराबर है (3)
फिर अगर निरी लड़कियां हो अगरचे दो से ऊपर (4)
तो उनको तर्के की दो तिहाई और अगर एक लड़की हो तो उसका आधा (5)
और मैयत के माँ बाप को हर एक को उसके तर्के से छटा, अगर मैयत के औलाद हो (6)
फिर अगर उसकी औलाद न हो और माँ बाप छोड़े (7)
तो माँ का तिहाई फिर अगर उसके कई बहन भाई हों(8)
तो माँ का छटा (9)
बाद उस वसियत के जो कर गया और दैन के (10)
तुम्हारे बाप और तुम्हारे बेटे तुम क्या जानो कि उनमें कौन तुम्हारे ज़्यादा काम आएगा (11)
यह हिस्सा बांधा हुआ है अल्लाह की तरफ़ से बेशक अल्लाह इल्म वाला हिकमत (बोध) वाला है  (11)
और तुम्हारी बीवियाँ जो छोड़ जाएं उसमें तुम्हें आधा है अगर उनके औलाद हो तो उनके तर्के में से तुम्हें चौथाई है (12)
जो वसिय्यत वो कर गई और दैन (ऋण) निकाल कर और तुम्हारे तर्के में औरतों का चौथाई है अगर तुम्हारे औलाद न हो. फिर अगर तुम्हारे औलाद हो तो उनका तुम्हारे तर्के में से आठवाँ (13)
जो वसिय्यत तुम कर जाओ  दैन (ऋण) निकाल कर और अगर किसी ऐसे मर्द या औरत का तर्का बटता हो जिसने माँ बाप औलाद कुछ न छोड़े और माँ की तरफ़ से उसका भाई या बहन है तो उनमें से हर एक को छटा फिर अगर  वो बहन भाई एक से ज़्यादा हों तो सब तिहाई में शरीक हैं (14)
मैयत की वसिय्यत और दैन निकाल कर जिसमें उसने नुक़सान न पहुंचाया हो  (15)
यह अल्लाह का इरशाद  (आदेश) है और  अल्लाह इल्म वाला हिल्म (सहिष्णुता) वाला है (12) ये अल्लाह की हदें हैं, और जो हुक्म माने अल्लाह और अल्लाह के रसूल का, अल्लाह उसे बाग़ों में ले जाएगा जिनके नीचे नेहरें बहें हमेशा उनमें रहेंगे और यही है बड़ी कामयाबी (13)
और जो अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी करे और उसकी कुल हदों से बढ़ जाए अल्लाह उसे आग में दाख़िल करेगा जिसमें हमेशा रहेगा और उसके लिये ख़्वारी (ज़िल्लत) का अज़ाब है (16) (14)

तफ़सीर :

सूरए निसा – दूसरा रूकू

(1) विरासत के बारे में.

(2) अगर मरने वाले ने बेटे बेटियाँ दोनों छोड़ी हों तो.

(3) यानी बेटी का हिस्सा बेटे से आधा है और अगर मरने वाले ने सिर्फ़ लड़के छोड़े हों तो कुल माल उन का.

(4) या दो.

(5) इससे मालूम हुआ कि अगर लड़का अकेला वारिस रहा हो तो कुल माल उसका होगा क्योंकि ऊपर बेटे का हिस्सा बेटियों से दूना बताया गया है तो जब अकेली लड़की का आधा हुआ तो अकेले लड़के का उससे दूना हुआ और वह कुल है.

(6) चाहे लड़का हो या लड़की कि उनमें से हर एक को औलाद कहा जाता है.

(7) यानी सिर्फ़ माँ बाप छोड़े और अगर माँ बाप के साथ शौहर या बीवी में से किसी को छोड़ा, तो माँ का हिस्सा बीवी का हिस्सा निकालने के बाद जो बाक़ी बचे उसका तिहाई होगा न कि कुल का तिहाई.

(8) सगे चाहे सौतेले.

(9) और एक ही भाई हो तो वह माँ का हिस्सा नहीं घटा सकता.

(10) क्योंकि वसिय्यत और क़र्ज़ विरासत की तक़सीम से पहले है. और क़र्ज़ वसिय्यत से भी पहले है. हदीस शरीफ़ में है “इन्नद दैना क़बलल वसिय्यते” जिसका अर्थ यह होता है कि वसिय्यत पर अमल करने से पहले मरने वाले का क़र्ज़ अदा करना ज़रूरी है.

(11) इसलिये हिस्सो का मुक़र्रर करना तुम्हारी राय पर न छोड़ा.

(12  चाहे एक बीबी हो या कई. एक होगी तो वह अकेली चौथाई पाएगी. कई होंगी तो सब उस चौथाई में बराबर शरीक होंगी चाहे बीबी एक हो या कई, हिस्सा यही रहेगा.

(13) चाहे बीबी एक हो या ज़्यादा.

(14) क्योंकि वो माँ के रिश्ते की बदौलत हक़दार हुए और माँ तिहाई से ज़्यादा नहीं पाती और इसीलिये उनमें मर्द का हिस्सा औरत से ज़्यादा नहीं है.

(15) अपने वारिसों को तिहाई से ज़्यादा वसिय्यत करके या किसी वारिस के हक़ में वसिय्यत करके. वारिस के क़र्ज़ कई क़िस्म हैं. असहाबे फ़राइज़ वो लोग हैं जिनके लिये हिस्सा मुक़र्रर है जैसे बेटी एक हो तो आधे माल की मालिक, ज़्यादा हों तो सब के लिये दो तिहाई. पोती और पड़पोती और उससे नीचे की हर पोती, अगर मरने वाले के औलाद न हो तो बेटी के हुक्म में है. और अगर मैयत ने एक बेटी छोड़ी है तो यह उसके साथ छटा पाएगी और अगर मैयत ने बेटा छोड़ा तो विरासत से वंचित हो जाएगी, कुछ न पाएगी और अगर मरने वाले ने दो बेटियाँ छोड़ीं तो भी पोती वंचित यानी साक़ित हो गई. लेकिन अगर उसके साथ या उसके नीचे दर्जे में कोई लड़का होगा तो वह उसको इसबा बना देगा. सगी बहन मैयत के बेटा या पोता न छोड़ने की सूरत में बेटियों के हुक्म में है. अल्लाती बहनें, जो बाप में शरीक हों और उनकी माएं अलग अलग हों, वो सगी बहनों के न होने की सूरत में उनकी मिस्ल है और दोनों क़िस्म की बहनें, यानी सगी और अल्लाती, मैयत की बेटी या पोती के साथ इसबा हो जाती हैं और बेटे और पोते और उसके मातहत पोते और बाप के साथ साक़ित या वंचित और इमाम साहब के नज़दीक दादा के साथ भी मेहरूम हैं. सौतेले भाई बहन जो फ़क़त माँ में शरीक हों, उनमें से एक हो तो छटा और ज़्यादा हों तो तिहाई और उनमें मर्द और औरत बराबर हिस्सा पाएंगे. और बेटे पोते और उसके मातहत के पोते और बाप दादा के होते मेहरूम हो जाएंगे. बाप छटा हिस्सा पाएगा अगर मैयत ने बेटा या पोता या उससे नीचे की कोई पोती छोड़ी हो तो बाप छटा और वह बाक़ी भी पाएगा जो असाबे फ़र्ज़ को देकर बचे. दादा यानी बाप का बाप, बाप के न होने की सूरत में बाप की मिस्ल है सिवाय इसके कि माँ को मेहरूम न कर सकेगा. माँ का छटा हिस्सा है. अगर मैयत ने अपनी औलाद या अपने बेटे या पोते या पड़पोते की औलाद या बहन भाई में से दो छोड़े हों चाहे वो सगे भाई हों या सौतेले और अगर उनमें से कोई छोड़ा न हो तो तो माँ कुल माल का तिहाई पाएगी और अगर मैयत ने शौहर या बीबी और माँ बाप छोड़े हों तो माँ को शौहर या बीबी का हिस्सा देने के बाद जो बाक़ी रहे उसका तिहाई मिलेगा और जद्दा का छटा हिस्सा है चाहे वह माँ की तरफ़ से हो यानी नानी या बाप की तरफ़ से हो यानी दादी. एक हो, ज़्यादा हों, और क़रीब वाली दूर वाली के लिये आड़ हो जाती है. और माँ हर एक जद्दा यानी नानी और दादी को मेहरूम कर देती है. और बाप की तरफ़ की जद्दात यानी दादियाँ बाप के होने की सूरत में मेहजूब यानी मेहरूम हो जाती हैं. इस सूरत में कुछ न मिलेगा. ज़ौज को चौथा हिस्सा मिलेगा. अगर मैयत ने अपनी या अपने बेटे पोते परपोते वग़ैरह की औलाद छोड़ी हो और अगर इस क़िस्म की औलाद न छोड़ी हो तो शौहर आधा पाएगा. बीवी मैयत की और उसके बेटे पोते वग़ैरह की औलाद होने की सूरत में आठवाँ हिस्सा पाएगी और न होने की सूरत में चौथाई. इसबात वो वारिस है जिनके लिये कोई हिस्सा निश्चित नहीं है. फ़र्ज़ वारिसों से जो बाक़ी बचता है वो पाते हैं. इन में सबसे ऊपर बेटा है फिर उसका बेटा फिर और नीचे के पोते फिर बाप फिर उसका बेटा फिर और नीचे के पोते फिर बाप फिर दादा फिर बाप के सिलसिले में जहाँ तक कोई पाया जाए. फिर सगा भाई फिर सौतेला यानी बाप शरीक भाई फिर सगे भाई का बेटा फिर बाप शरीक भाई का बेटा, फिर आज़ाद करने वाला और जिन औरतों का हिस्सा आधा या दो तिहाई है वो अपने भाईयों के साथ इसबा हो जाती हैं और जो ऐसी न हों वो नहीं. ख़ून के रिश्तों, फ़र्ज़ वारिस और इसबात के सिवा जो रिश्तेदार हैं वो ज़विल अरहाम में दाख़िल हैं और उनकी तरतीब इस्बात की मिस्ल है.

(16) क्योंकि कुल हदों के फलांगने वाला काफ़िर है. इसलिये कि मूमिन कैसा भी गुनाहगार हो, ईमान की हद से तो न गुज़रेगा.

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सूरए निसा _ तीसरा रूकू

सूरए निसा _ तीसरा रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और तुम्हारी औरतें जो बदकारी करें उन पर ख़ास अपने में (1)
के चार मर्दों की गवाही लो फिर अगर वो गवाही दे दें तो उन औरतों को घर में बंद रखो (2)
यहां तक कि उन्हें मौत उठाले या अल्लाह उनकी कुछ राह निकाले(3)(15)
और तुम में जो मर्द औरत ऐसा काम करें उनको ईज़ा (कष्ट) दो(4)
फिर अगर वो तौबह कर लें और नेक हो जाएं तो उनका पीछा छोड़ दो बेशक अल्लाह बड़ा तौबह क़ुबूल करने वाला मेहरबान है (5)(16)
वह तौबह जिसका क़ुबूल करना अल्लाह ने अपने फ़ज़्ल(कृपा) से लाज़िम कर लिया है वह उन्हीं की है जो नादानी से बुराई कर बैठे फिर थोड़ी देर में तौबा करलें (6)
ऐसो पर अल्लाह अपनी रहमत से रूजू (तवज्जुह)करता है और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है(17) और वह तौबा उनकी नहीं जो गुनाहों में लगे रहते हैं(7)
यहां तक कि जब उनमें किसी को मौत आए तो कहे अब मैं ने तौबा की(8)
और न उनकी जो काफ़िर मरें उनके लिये हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है (9)(18)
ऐ ईमान वालों, तुम्हें हलाल नहीं कि औरतों के वारिस बन जाओ ज़बरदस्ती (10)
और औरतों को रोको नहीं इस नियत से कि जो मेहर उनको दिया था उसमें से कुछ ले लो (11)
मगर उस सूरत में कि खुल्लमखुल्ला बेहयाई का काम करें (12)
और उनसे अच्छा बर्ताव करो (13)
फिर अगर वो तुम्हें पसन्द न आएं (14)
तो क़रीब है कि कोई चीज़ तुम्हें नापसन्द हो और अल्लाह उसमें बहुत भलाई रखे (15) (19)
और अगर तुम एक बीबी के बदले दूसरी बदलना चाहो (16)
और उसे ढेरों माल दे चुके हो (17)
तो उसमें से कुछ वापिस न लो (18)
क्या उसे वापिस लोगे झूठ बांधकर और खुले गुनाह से (19) (20)
और किस तरह वापिस लोगे हालांकि तुम में एक दूसरे के सामने बेपर्दा हो लिया और वो तुम से गाढ़ा अहद (प्रतिज्ञा) ले चुकीं  (20)(21)
और बाप दादा की मनकूहा (विवाहिता) से निकाह न करो  (21)
मगर जो हो गुज़रा वह बेशक बेहयाई (22)
और गज़ब (प्रकोप) का काम है और  बहुत बुरी राह (23) (22)

तफसीर 
सूरए निसा – तीसरा रूकू

(1) यानी मुसलमानों में के.

(2) कि वो बदकारी न करने पाएं.

(3) यानी हद निश्चित करे या तौबह और निकाह की तौफ़ीक़ दे. जो मुफ़स्सिर इस आयत “अलफ़ाहिशता” (बदकारी) से ज़िना मुराद लेते हैं वो कहते हैं कि हब्स का हुक्म हूदूद यानी सज़ाएं नाज़िल होने से पहले था. सज़ाएं उतरने के बाद स्थगित किया गया. (ख़ाज़िन, जलालैन व तफ़सीरे अहमदी)

(4) झिड़कों, घुड़को, बुरा कहो, शर्म दिलाओ, जूतियाँ मारो, (जलालैन, मदारिक व ख़ाज़िन वग़ैरह)

(5) हसन का क़ौल है कि ज़िना की सज़ा पहले ईज़ा यानी यातना मुक़र्रर की गई फिर क़ैद फिर कोड़े मारना या संगसार करना. इब्ने बहर का क़ौल है कि पहली आयत “वल्लती यातीना” (और तुम्हारी औरतों में…..) उन औरतों के बारे में है जो औरतों के साथ बुरा काम करती हैं और दूसरी आयत “वल्लज़ाने”(और तुममें जो मर्द…..) लौंडे बाज़ी या इग़लाम करने वालों के बारे में उतरी. और ज़िना करने वाली औरतें और ज़िना करने वाले मर्द का हुक्म सूरए नूर में बयान फ़रमाया गया. इस तक़दीर पर ये आयतें मन्सूख़ यानी स्थगित हैं और इनमें इमाम अबू हनीफ़ा के लिये ज़ाहिर दलील है उस पर जो वो फ़रमाते हैं कि लिवातत यानी लौंडे बाज़ी में छोटी मोटी सज़ा है, बड़ा धार्मिक दण्ड नहीं.

(6) ज़ुहाक का क़ौल है कि जो तौबह मौत से पहले हो, वह क़रीब है यानी थोड़ी देर वाली है.

(7)  और तौबह में देरी कर जाते है.

(8) तौबह क़ुबूल किये जाने का वादा जो ऊपर की आयत में गुज़रा वह ऐसे लोगों के लिये नहीं है. अल्लाह मालिक है, जो चाहे करे. उनकी तौबह क़ुबूल करे या न करे. बख़्श दे या अज़ाब फ़रमाए, उस की मर्ज़ी. (तफ़सीरे अहमदी)

(9) इससे मालूम हुआ कि मरते वक़्त काफ़िर की तौबह और उसका ईमान मक़बूल नहीं.

(10) जिहालत के दौर में लोग माल की तरह अपने रिश्तेदारों की बीबियों के भी वारिस बन जाते थे फिर अगर चाहते तो मेहर के बिना उन्हें अपनी बीबी बनाकर रखते या किसी और के साथ शादी कर देते और ख़ुद मेहर ले लेते या उन्हें क़ैद कर रखते कि जो विरासत उन्हों ने पाई है वह देकर रिहाई हासिल करलें या मर जाएं तो ये उनके वारिस हो जाएं. ग़रज़ वो औरतें बिल्कुल उनके हाथ में मजबूर होती थीं और अपनी मर्ज़ी से कुछ भी नहीं कर सकती थीं. इस रस्म को मिटाने के लिये यह आयत उतारी गई.

(11) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया यह उसके सम्बन्ध में है जो अपनी बीबी से नफ़रत रखता हो और इस लिये दुर्व्यवहार करता हो कि औरत परेशान होकर मेहर वापस कर दे या छोड़ दे. इसकी अल्लाह तआला ने मनाही फ़रमाई. एक क़ौल यह है कि लोग औरत को तलाक़ देते फिर वापस ले लेते, फिर तलाक़ देते. इस तरह उसको लटका कर रखते थे. न वह उनके पास आराम पा सकती, न दूसरी जगह ठिकाना कर सकती. इसको मना फ़रमाया गया. एक क़ौल यह है कि मरने वाले के सरपरस्त को ख़िताब है कि वो उसकी बीबी को न रोकें.

(12) शौहर की नाफ़रमानी या उसकी या उसके घर वालों की यातना, बदज़बानी या हरामकारी ऐसी कोई हालत हो तो ख़ुलअ चाहने में हर्ज नहीं.

(13) खिलाने पहनाने में, बात चीत में और मियाँ बीवी के व्यवहार में.

(14) दुर्व्यवहार या सूरत नापसन्द होने की वजह से, तो सब्र करो और जुदाई मत चाहो.

(15) नेक बेटा वग़ैरह.

(16) यानी एक को तलाक़ देकर दूसरी से निकाह करना.

(17) इस आयत से भारी मेहर मुक़र्रर करने के जायज़ होने पर दलील लाई गई है. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने मिम्बर पर से फ़रमाया कि औरतों के मेहर भारी न करो. एक औरत ने यह आयत पढ़कर कहा कि ऐ  इब्ने ख़त्ताब, अल्लाह हमें देता है और तुम मना करते हो, इस पर अमीरूल मूमिनीन हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया, ऐ उमर, तुझसे हर शख़्स ज़्यादा समझदार है. जो चाहो मेहर मुक़र्रर करो. सुब्हानल्लाह, ऐसी थी रसूल के ख़लीफ़ा के इन्साफ़ की शान और शरीफ़ नफ़्स की पाकी. अल्लाह तआला हमें उनका अनुकरण करने की तौफ़ीक अता फ़रमाए. आमीन.

(18) क्योंकि जुदाई तुम्हारी तरफ़ से है.

(19) यह जिहालत वालों के उस काम का रद है कि जब उन्हें कोई दूसरी औरत पसन्द आती तो वो अपनी बीबी पर तोहमत यानी लांछन लगाते ताकि वह इससे परेशान होकर जो कुछ ले चुकी है वापस कर दे. इस तरीक़े को इस आयत में मना फ़रमाया गया और झुट और गुनाह बताया गया.

(20) वह अहद अल्लाह तआला का यह इरशाद है ” फ़ इम्साकुन बि मअरूफ़िन फ़ तसरीहुम बि इहसानिन” यानी फिर भलाई के साथ रोक लेना है या नेकूई के साथ छोड़ देना है. (सूरए बक़रह, आयत 229) यह आयत इस पर दलील है कि तन्हाई में हमबिस्तरी करने से मेहर वाजिब हो जाता है.

(21) जैसा कि जिहालत के ज़माने में रिवाज था कि अपनी माँ के सिवा बाप के बाद उसकी दूसरी औरत को बेटा अपनी बीवी बना लेता था.

(22) क्योंकि बाप की बीवी माँ के बराबर है. कहा गया है कि निकाह से हम-बिस्तरी मुराद है. इससे साबित होता है कि जिससे बाप ने हमबिस्तरी की हो, चाहे निकाह करके या ज़िना करके या वह दासी हो, उसका वह मालिक होकर, उनमें से हर सूरत में बेटे का उससे निकाह हराम है.

(23) अब इसके बाद जिस क़द्र औरतें हराम हैं उनका बयान फ़रमाया जाता है. इनमें सात तोनसब से हराम है.F

सूरए निसा – चौथा रूकू

सूरए निसा – चौथा रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला


हराम हुई तुम पर तुम्हारी माएं  (1)
और बेटियां (2)
और बहनें और फुफियां और ख़ालाएं और भतीजियां(3)
और भांजियां और तुम्हारी माएं जिन्होंने दूध पिलाया (4)
और दूध की बहनें और औरतों की माएं  (5)
और उनकी बेटियां जो तुम्हारी गोद में हैं (6)
तो उनकी बेटियों में हर्ज नहीं (7)
और तुम्हारी नस्ली बेटों की बीबियां(8)
और दो बहनें इकट्ठी करना (9)
मगर जो हो गुज़रा बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (23)

पाँचवां पारा – वल – मुहसनात
(सूरए निसा _ चौथा रूकू जारी)

और हराम हैं शौहरदार औरतें  मगर काफ़िरों की औरतें जो तुम्हारी मिल्क में आ जाएं (10)
यह अल्लाह का लिखा हुआ है तुमपर और उन (11)
के सिवा जो रहीं वो तुम्हें हलाल हैं कि अपने मालों के इवज़ तलाश करो कै़द लाते (12)
न पानी गिराते (13)
तो जिन औरतों को निकाह में लाना चाहो उनके बंधे हुए मेहर उन्हें दे दो और क़रारदाद (समझौते) के बाद अगर तुम्हारे आपस में कुछ रज़ामन्दी हो जावे तो उसमें गुनाह नहीं (14)
बेशक अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है  (24) और तुमसे बेमक़दूरी (असामथर्य) के कारण जिनके निकाह में आज़ाद औरतें ईमान वालियां न हों तो उनसे निकाह करे जो तुम्हारे हाथ की मिल्क हैं ईमान वाली कनीजे़ (15)
और अल्लाह तुम्हारे ईमान को ख़ूब जानता है, तुम में एक,दूसरे से है तो उनसे निकाह करो  (16)
उनके मालिकों  की इज़ाज़त से (17)
और दस्तूर के मुताबिक़  उनके मेहर उन्हें दो(18)
क़ैद में आतियां, न मस्ती निकालती और न यार बनाती (19)
जब वो कै़द में आजाएं (20)
फिर बुरा काम करें तो उनपर उसकी सज़ा आधी है जो आज़ाद औरतों पर है  (21)
यह (22)
उसके लिये जिसे तुम में से ज़िना  (व्यभिचार) का डर है और सब्र करना तुम्हारे लिये बेहतर है (23)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है(25)

तफसीर 
सूरए निसा – चौथा रूकू

(1) और हर औरतें जिसकी तरफ़ बाप या माँ के ज़रिये से नसब पलटता हो, यानी दादियाँ व नानियाँ , चाहे क़रीब की हों या दूर की, सब माएं हैं  अपनी वालिदा के हुक्म में दाख़िल हैं.

(2) पोतियाँ नवासियाँ किसी दर्जे की हों, बेटियों में दाख़िल हैं.

(3) ये सब सगी हों या सौतेली. इनके बाद उन औरतों का बयान किया जाता है जो सबब से हराम हैं.

(4) दूध के रिश्ते, दूध पीने को मुद्दत में थोड़ा दूध पिया जाय या बहुत सा, उसके साथ हुरमत जुड़ जाती है. दूध पीने की मुद्दत हज़रत इमाम अबू हनीफ़ रदियल्लाहो अन्हो के नज़दीक दो साल है. दूध पीने की मुद्दत के बाद जो दूध पिया जाए उससे हुरमत नहीं जुड़ती. अल्लाह तआला ने रिज़ाअत (दूध पीने) को नसब की जगह किया है और दूध पिलाने वाली को दूध पीने वाले बच्चे की माँ और उसकी लड़की को बच्चे की बहन फ़रमाया. इसी तरह दूध पिलाई का शौहर दूध पीने वाले बच्चे का बाप और उसका बाप बच्चे का दादा और उसकी बहन उसकी फुफी और उसका हर बच्चा जो दूध पिलाई के सिवा और किसी औरत से भी हो, चाहे वह दूध पीने से पहले पैदा हुआ या उसके बाद, वो सब उसके सौतेले भाई बहन हैं. और दूध पिलाई की माँ दूध पीने वाले बच्चे की नानी और उसकी बहन उसकी ख़ाला और उस शौहर से उसके जो बच्चे पैदा हो वो दूध पीने वाले बच्चे के दूध शरीक भाई बहन, और उस शौहर के अलावा दूसरे शौहर से जो हों वह उसके सौतेले भाई बहन, इसमें अस्ल यह हदीस है कि दूध पीने से वो रिश्ते हराम हो जाते हैं जो नसब से हराम हैं. इसलिये दूध पीने वाले बच्चे पर उसके दूध माँ बाप और उनके नसबी और रिज़ाई उसूल व फ़रोअ सब हराम हैं.

(5) बीवियों की माएं, बीवियों की बेटियाँ और बेटो की बीवियाँ बीवियों की माएं सिर्फ़ निकाह का बन्धन होते ही हराम हो जाती हैं चाहें उन बीवियों से सोहबत या हमबिस्तरी हुई हो या नहीं.

(6) गोद में होना ग़ालिबे हाल का बयान है, हुरमत के लिये शर्त नहीं.

(7) उनकी माओ से तलाक़ या मौत वग़ैरह के ज़रीये से, सोहबत से पहले जुदाई होने की सूरत में उनके साथ निकाह जायज़ है.

(8) इससे लेपालक निकल गए. उनकी औरतों के साथ निकाह जायज़ है. और दूध बेटे की बीबी भी हराम है क्योंकि वह सगे के हुक्म् में है. और पोते परपोते बेटों में दाख़िल हैं.

(9) यह भी हराम है चाहे दोनों बहनों को निकाह में जमा किया जाए या मिल्के यमीन के ज़रिये से वती में. और हदीस शरीफ़ में फुफी भतीजी और ख़ाला भांजी का निकाह में जमा करना भी हराम फ़रमाया गया. और क़ानून यह है कि निकाह में हर ऐसी दो औरतों का जमा करना हराम है जिससे हर एक को मर्द फ़र्ज़ करने से दूसरी उसके लिये हलाल न हो, जैसे कि फुफी भतीजी, कि अगर फुफी को मर्द समझा जाए तो चचा हुआ, भतीजी उस पर हराम है और अगर भतीजी को मर्द समझा जाए तो भतीजा हुआ, फुफी उस पर हराम है, हुरमत दोनों तरफ़ है. और अगर सिर्फ़ एक तरफ़ से हो तो जमा हराम न होगी जैसे कि औरत और उसके शौहर की लड़की को मर्द समझा जाए तो उसके लिये बाप की बीबी तो हराम रहती है मगर दूसरी तरफ़ से यह बात नहीं है यानी शौहर की बीबी कि अगर मर्द समझा जाए तो यह अजनबी होगा और कोई रिश्ता ही न रहेगा.

(10) गिरफ़्तार होकर बग़ैर अपने शौहरों के, वो तुम्हारे लिये इस्तबरा (छुटकारा हो जाने) के बाद हलाल हैं, अगरचें दारूल हर्ब में उनके शौहर मौजूद हों क्योंकि तबायने दारैन (अलग अलग सुकूनत) की वजह से उनकी शौहरों से फुर्क़त हो चुकी. हज़रत अबू सइर्द ख़ुदरी रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया हमने एक रोज़ बहुत सी क़ैदी औरतें पाई जिनके शौहर दारूल हर्ब में मौजूद थे, तो हमने उनसे क़ुर्बत में विलम्ब किया और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मसअला पूछा. इस पर यह आयत उतरी.

(11) वो मेहरम औरतें जिनका ऊपर बयान किया गया.

(12) निकाह से या मिल्के यमीन से. इस आयत से कई मसअले साबित हुए. निकाह में मेहर ज़रूरी है और मेहर निशिचत न किया हो, जब भी वाज़िब होता है. मेहर माल ही होता है न कि ख़िदमत और तालीम वग़ैरह जो चीज़ें माल नहीं हैं, इतना क़लील जिसको माल न कहा जाए, मेहर होने की सलाहियत नहीं रखता. हज़रत जाबिर और हज़रत अली मुरतज़ा रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि मेहर की कम मिक़दार दस दरहम है, इससे कम नहीं हो सकता.

(13) इससे हरामकारी मुराद है और यहाँ चेतावनी है कि ज़िना करने वाला सिर्फ़ अपनी वासना की पूर्ति करता है और मस्ती निकालता है और उसका काम सही लक्ष्य और अच्छे उदेश्य से ख़ाली होता है, न औलाद हासिल करना, न नस्ल, न नसब मेहफ़ूज़ रखना, न अपने नफ़्स को हराम से बचाना, इनमें से कोई बात उसके सामने नहीं होती, वह अपने नुत्फ़े और माल को नष्ट करके दीन और दुनिया के घाटे में गिरफ़्तार होता है.

(14) चाहे औरत निश्चित मेहर से कम कर दे या बिल्कुल बख़्श दे या मर्द मेहर की मात्रा और ज़्यादा कर दें.

(15) यानी मुसलमानों की ईमानदार दासियाँ, क्योंकि निकाह अपनी दासी से नहीं होता : वह निकाह के बिना ही मालिक के लिये हलाल है. मतलब यह है कि जो शख़्स ईमान वाली आज़ाद औरत से निकाह की क्षमता और ताक़त न रखता हो वह ईमानदार दासी से निकाह करे, यह बात शर्माने की नहीं. जो शख़्स आज़ाद औरत से निकाह की क्षमता रखता हो उसको भी मुसलमान बांदी से निकाह करना जायज़ है. यह मसअला इस आयत में तो नहीं है, मगर ऊपर की आयत ” व उहिल्ला लकुम मा वराआ ज़ालिकुम” से साबित है. ऐसे ही किताब वाली दासी से भी निकाह जायज़ है और मूमिना यानी ईमान वाली के साथ अफ़ज़ल व मुस्तहब है. जैसा कि इस आयत से साबित हुआ.

(16) यह कोई शर्म की बात नहीं. फ़ज़ीलत ईमान से है. इसी को काफ़ी समझो.

(17) इससे मालूम हुआ कि दासी को अपने मालिक की आज्ञा के बिना निकाह का हक़ नहीं, इसी तरह ग़ुलाम को.

(18) अगरचे मालिक उनके मेहर के मालिक हैं लेकिन दासियों को देना मालिक ही को देना है क्योंकि ख़ुद वो और जो कुछ उनके क़ब्ज़े में हो, सब मालिक का है. या ये मानी हैं कि उनके मालिकों की इजाज़त से उन्हें मेहर दो.

(19) यानी खुले छुपे किसी तरह बदकारी नहीं करतीं.

(20) और शौहर-दार हो जाएं.

(21) जो शौहरदार न हों, यानी पचास कोड़े, क्योंकि आज़ाद के लिये सौ कोड़े हैं और दासियों को संगसार नहीं किया जाता.

(22) दासी से निकाह करना.

(23) दासी के साथ निकाह करने से, क्योंकि इससे ग़ुलाम औलाद पैदा होगी.

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सूरए निसा – पाँचवा रूकू

सूरए निसा – पाँचवा रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला


अल्लाह चाहता है कि अपने आदेश तुम्हारे लिये बयान करदे और तुम्हें अगलों के तरीक़े बतादे (1)
और तुमपर अपनी रहमत से रूज़ू (तवज्जूह) फ़रमाए और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है (26) और अल्लाह तुमपर अपनी रहमत से रूजू फ़रमाना चाहता है और जो अपने मज़ों के पीछे पड़े है वो चाहते है कि तुम सीधी राह से बहुत अलग हो जाओ  (2)(27)
अल्लाह चाहता है कि तुमपर तख़फ़ीफ़ (कमी) करे(3)
और आदमी कमज़ोर बनाया गया(4)(28)
ऐ ईमान वालों, आपस में एक दूसरे के माल नाहक़ ना खाओ  (5)
मगर यह कि कोई सौदा तुम्हारी आपसी रज़ामन्दी का हो (6)
और अपनी जानें क़त्ल न करो (7)
बेशक अल्लाह तुम पर मेहरबान है (29) और जो ज़ुल्म व ज़्यादती से ऐसा करेगा तो जल्द ही हम उसे आग में दाख़िल करेंगे और यह अल्लाह को आसान है(30) अगर बचते रहो बड़े गुनाहों से जिनकी तुम्हें मनाई है (8)
तो तुम्हारे और गुनाह (9)
हम बख़्श देंगे और तुम्हें इज़्ज़त की जगह दाख़िल करेंगे (31)
और उसकी आरज़ू न करो जिससे अल्लाह ने तुम में एक को दूसरे पर बड़ाई दी(10)
मर्दों के लिये उनकी कमाई से हिस्सा है और औरतों के लिये उनकी कमाई से हिस्सा (11)
और अल्लाह से उसका फ़ज़्ल (कृपा) मांगो बेशक अल्लाह सब कुछ जानता है (32)
और हमने सबके लिये माल के मुस्तहक़ (हक़दार) बना दिये है जो कुछ छोड़ जाएं  मां बाप और क़रावत वाले (रिश्तेदार) और वो जिनसे तुम्हारा हलफ़ बंध चुका (12)
उन्हें उनका हिस्सा दो बेशक हर चीज़ अल्लाह के सामने है (33)

तफसीर 
सूरए निसा – पाँचवां रूकू

(1) नबियों और नेक बन्दों की.

(2) और हराम में लगकर उन्हीं की तरफ़ हो जाओ.

(3) और अपने फ़ज़्ल व मेहरबानी से अहकाम आसान करे.

(4) उसको औरतों से और वासना से सब्र दुशवार है. हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, औरतों में भलाई नहीं और उनकी तरफ़ से सब्र भी नहीं हो सकता. नेकों पर वो ग़ालिब आती हैं, बुरे उन पर ग़ालिब आ जाते हैं.

(5) चोरी, ग़बन, ख़ुर्द बुर्द और नाजायज़ तौर से क़ब्ज़ा कर लेना, जुआ, सूद जितने हराम तरीक़े हैं सब नाहक़ हैं, सब की मनाही है.

(6) वह तुम्हारे लिये हलाल है.

(7) ऐसे काम इख़्तियार करके जो दुनिया या आख़िरत में हलाकत का कारण हों, इसमें मुसलमानों का क़त्ल करना भी आ गया है और मूमिन का क़त्ल ख़ुद अपना ही क़त्ल है, क्योंकि तमाम ईमान वाले एक जान की तरह हैं. इस आयत से ख़ुदकुशी यानी आत्महत्या की अवैधता भी साबित हुई. और नफ़्स का अनुकरण करके हराम में पड़ जाना भी अपने आपको हलाक करना है.

(8) और जिन पर फटकार उतरी यानी अज़ाब का वादा दिया गया मिस्ल क़त्ल, ज़िना, चोरी वग़ैरह के.

(9) छोटे गुनाह. कुफ़्र और शिर्क तो न बख़्शा जाएगा अगर आदमी उसी पर मरा (अल्लाह की पनाह). बाक़ी सारे गुनाह, छोटे हों या बड़े, अल्लाह की मर्ज़ी में हैं, चाहे उन पर अज़ाब करे, चाहे माफ़ फ़रमाए.

(10) चाहे दुनिया के नाते से या दीन के, कि आपस में ईर्ष्या, हसद और दुश्मनी न पैदा हो. ईर्ष्या यानी हसद अत्यन्त बुरी चीज़ है. हसद वाला दूसरे को अच्छे हाल में देखता है तो अपने लिये उसकी इच्छा करता है और साथ में यह भी चाहता है कि उसका भाई उस नेअमत से मेहरूम हो जाए. यह मना है. बन्दे को चाहिये कि अल्लाह तआला की तरफ़ से उसे जो दिया गया है, उस पर राज़ी रहे. उसने जिस बन्दे को जो बुज़ुर्गी दी, चाहे दौलत और माल की, या दीन में ऊंचे दर्जे, यह उसकी हिकमत है. जब मीरास की आयत में ” लिज़्ज़करे मिस्लो हज़्ज़िल उनसयेन” उतरा और मरने वाले के तर्के में मर्द का हिस्सा औरत से दूना मुक़र्रर किया गया, तो मर्दों ने कहा कि हमें उम्मीद है कि आख़िरत में नेकियों का सवाब भी हमें औरतों से दुगना मिलेगा और औरतों ने कहा कि हमें उम्मीद है कि गुनाह का अज़ाब हमें मर्दों से आधा होगा. इस पर यह आयत उतरी और इसमें बताया गया कि अल्लाह तआला ने जिसको जो फ़ज़्ल दिया वह उसकी हिकमत है.

(11) हर एक को उसके कर्मों का बदला. उम्मुल मूमिनीन हज़रत उम्मे सलमा रदियल्लाहो अन्हा ने फ़रमाया कि हम भी अगर मर्द होते तो जिहाद करते और मर्दों की तरह जान क़ुर्बान करने का महान सवाब पाते. इस पर यह आयत उतरी और उन्हें तसल्ली दी गई कि मर्द जिहाद से सवाब हासिल कर सकते हैं तो औरतें शौहरों की फ़रमाँबरदारी और अपनी पवित्रता की हिफ़ाज़त करके सवाब हासिल कर सकती हैं.

(12) इससे अक़्दे मवालात मुराद है. इसकी सूरत यह है कि कोई मजहूलुन नसब शख़्स दूसरे से यह कहे कि तू मेरा मौला है, मैं मर जाऊं तो मेरा वारिस होगा और मैं कोई जिनायत करूँ तो तुझे दय्यत देनी होगी. दूसरा कहे मैंने क़ुबूल किया. उस सूरत में यह अक़्द सहीह हो जाता है और क़ुबूल करने वाला वारिस बन जाता है और दय्यत भी उस पर आ जाती है और दूसरा भी उसी की तरह से मजहूलुन नसब हो और ऐसा ही कहे और यह भी क़ुबूल कर ले तो उनमें से हर एक दूसरे का वारिस और उसकी दय्यत का ज़िम्मेदार होगा. यह अक़्द साबित है. सहाबा रदियल्लाहो अन्हुम इसके क़ायल हैं.

सूरए निसा – छटा रूकू

सूरए निसा – छटा रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
मर्द अफ़सर हैं औरतों पर (1)
इसलिये कि अल्लाह ने उनमें एक को दूसरे पर बड़ाई दी  (2)
और इसलिये कि मर्दों ने उनपर अपने माल ख़र्च किये (3)
तो नेकबख़्त (ख़ुशनसीब) औरतें अदब वालियां हैं ख़ाविन्द (शौहर) के पीछे हिफ़ाज़त रखती हैं (4)
जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त का हुक्म दिया और जिन औरतों की नाफ़रमानी का तुम्हें डर हो (5)
तो उन्हें समझाओ और उनसे अलग सोओ और उन्हें मारो(6)
फिर अगर वो तुम्हारे हुक्म में आजाएं तो उनपर ज़ियादती की कोई राह न चाहो बेशक अल्लाह बलन्द बड़ा है (7) (34)  
और अगर तुमको मियां बीबी के झगड़े का डर हो(8)
तो एक पंच मर्द वालों की तरफ़ से भेजो और एक पंच औरत वालों की तरफ़ से  (9)
ये दोनो अगर सुलह करना चाहे तो अल्लाह उनमें मेल कर देगा बेशक अल्लाह जानने वाला ख़बरदार है  (10) (35)
और अल्लाह की बन्दगी करो और उसका शरीक किसी को न ठहराओ (11)
और मां बाप से भलाई करो(12)
और रिश्तेदारों (13)
और यतीमों और मोहताजों (14)
और पास के पड़ोसी और दूर के पड़ोसी (15)
और करवट के साथी (16)
और राहगीर(17)
और अपनी बांदी (दासी) ग़ुलाम से(18)
बेशक अल्लाह को ख़ुश नहीं आता कोई इतराने वाला बड़ाई मारने वाला (19)(36)
जो आप कंजूसी करें और औरों से कंजूसी के लिये कहें (20)
और अल्लाह ने जो अपने फ़ज़्ल से दिया है उसे छुपाएं (21)
और काफ़िरों के लिये हमने ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है (37) और वो जो अपने माल लोगों के दिखावे को ख़र्च करते

हैं (22)
और ईमान नहीं लाते अल्लाह  और न क़यामत पर और जिसका साथी शैतान हुआ (23)
तो कितना बुरा साथी है (38) और उनका क्या नुक़सान था अगर ईमान लाते अल्लाह और क़यामत पर  और अल्लाह के दिये में से उसकी राह में ख़र्च करते (24)
और अल्लाह उनको जानता है (39) अल्लाह एक ज़र्रा भर ज़ुल्म नहीं फ़रमाता और अगर कोई नेकी हो तो उसे दूनी करता औरअपने पास से बड़ा सवाब देता है (40) तो कैसी होगी जब हम हर उम्मत से एक गवाह लाएं (25)
और ऐ मेहबूब, तुम्हें उनसब पर गवाह और निगहबान बनाकर लाएं (26)(41)
उस दिन तमन्ना करेंगे वो जिन्होने कुफ़्र किया और रसूल की नाफ़रमानी की काश उन्हें मिट्टी में दबाकर ज़मीन बराबर करदी जाए और कोई बात अल्लाह से न छुपा सकेंगे (27)(42)

तफसीर 
सूरए निसा – छटा रूकू

(1) तो औरतों को उनकी इताअत लाज़िम है और मर्दों को हक़ है कि वो औरतों पर रिआया की तरह हुक्मरानी करें. हज़रत सअद बिन रबीअ ने अपनी बीबी हबीबा को किसी ख़ता पर एक थप्पड़ मारा. उनके वालिद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में ले गए और उनके शौहर की शिकायत की. इस बारे में यह आयत उतरी.

(2) यानी मर्दों को औरतों पर अक़्ल और सूझबूझ और जिहाद व नबुव्वत, ख़िलाफ़त, इमामत, अज़ान, ख़ुत्बा, जमाअत, जुमुआ, तकबीर, तशरीक़ और हद व क़िसास की शहादत के, और विरासत में दूने हिस्से और निकाह व तलाक़ के मालिक होने और नसबों के उनकी तरफ़ जोड़े जाने और नमाज़ रोज़े के पूरे तौर पर क़ाबिल होने के साथ, कि उनके लिये कोई  ज़माना ऐसा नहीं है कि नमाज़ रोजे़ के क़ाबिल न हों, और दाढ़ियों और अमामों के साथ फ़ज़ीलत दी.

(3) इस आयत से मालूम हुआ कि औरतों की आजीविका मर्दों पर वाजिब है.

(4) अपनी पवित्रता और शौहरों के घर, माल और उनके राज़ों की.

(5) उन्हें शौहर की नाफ़रमानी और उसकी फ़रमाँबरदारी न करने और उसके अधिकारों का लिहाज़ न रखने के नतीजे समझओ, जो दुनिया और आख़िरत में पेश आते हैं और अल्लाह के अज़ाब का ख़ौफ़ दिलाओ और बताओ कि हमारा तुम पर शरई हक़ है. और हमारी आज्ञा का पालन तुम पर फ़र्ज़ है. अगर इस पर भी न मानें…..

(6) हल्की मार.

(7) और तुम गुनाह करते हो फिर भी वह तुम्हारी तौबह कुबूल फ़रमा लेता है. तो तुम्हारे हाथ के नीचे की औरतें अगर ग़लती करने के बाद माफ़ी चाहें तो तुम्हें ज़्यादा मेहरबानी से माफ़ करना चाहिये और अल्लाह की क़ुदरत और बरतरी का लिहाज़ रखकर ज़ुल्म से दूर रहना चाहिये.

(8) और तुम देखो कि समझाना, अलग सोना, मारना कुछ भी कारामद न हो और दोनों के मतभेद दूर न हुए.

(9) क्योंकि क़रीब के लोग अपने रिश्तेदारों के घरेलू हालात से परिचित होते हैं और मियाँ बीबी के बीच मिलाप की इच्छा भी रखते हैं और दोनों पक्षों को उनपर भरोसा और इत्मीनान भी होता है और उनसे अपने दिल की बात कहने में हिचकिचाहट भी नहीं होती है.

(10) जानता है कि मियाँ बीवी में ज़ालिम कौन है. पंचों को मियाँ बीवी में जुदाई कर देने का इख़्तियार नहीं.

(11) न जानदार को न बेजान को, न उसके रब होने में, न उसकी इबादत में.

(12) अदब और आदर के साथ और उनकी ख़िदमत में सदा चौकस रहना और उन पर ख़र्च करने में कमी न करना. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तीन बार फ़रमाया, उसकी नाक ख़ाक में लिपटे. हज़रत अबू हुरैरा ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह किसकी ? फ़रमाया, जिसने बूढ़े माँ बाप पाए या उनमें से एक को पाया और जन्नती न हो गया.

(13) हदीस शरीफ़ में है, रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक करने वालों की उम्र लम्बी और रिज़्क़ वसीअ होता है. (बुख़ारी व मुस्लिम)

(14) हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, मैं और यतीम की सरपरस्ती करने वाला ऐसे क़रीब होंगे जैसे कलिमे और बीच की उंगली (बुख़ारी शरीफ़). एक और हदीस में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, बेवा और मिस्कीन की इमदाद और ख़बरदारी करने वाला अल्लाह के रास्तें में जिहाद करने वाले की तरह है.

(15) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि जिब्रील मुझे हमेशा पड़ोसियों के साथ एहसान करने की ताकीद करते रहे, इस हद तक कि गुमान होता था कि उनको वारिस क़रार दे दें.

(16) यानी बीबी या जो सोहबत में रहे या सफ़र का साथी हो या साथ पढ़े या मजलिस और मस्जिद में बराबर बैठे.

(17) और मुसाफ़िर व मेहमान. हदीस में है, जो अल्लाह और क़यामत के दिन पर ईमान रखे उसे चाहिये कि मेहमान की इज़्ज़त करे. (बुख़ारी व मुस्लिम)

(18) कि उन्हें उनकी ताक़त से ज़्यादा तकलीफ़ न दो और बुरा भला न कहो और खाना कपड़ा उनकी ज़रूरत के अनुसार दो. हदीस में है, रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जन्नत में बुरा व्यवहार करने वाला दाख़िल न होगा. (तिरमिज़ी)

(19) अपनी बड़ाई चाहने वाला घमण्डी, जो रिश्तेदारों और पड़ोसियों को ज़लील समझे.

(20) बुख़्ल यानी कंजूसी यह है कि ख़ुद खाए, दूसरे को न दे. “शेह” यह है कि न खाए न खिलाए. “सख़ा” यह है कि ख़ुद भी खाए दूसरों को भी खिलाए. “जूद” यह है कि आप न खाए दूसरे को खिलाए. यह आयत यहूदियों के बारे में उतरी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ बयान करने में कंजूसी करते और आपके गुण छुपाते थे. इस से मालूम हुआ कि इल्म को छुपाना बुरी बात है.

(21) हदीस शरीफ़ में है कि अल्लाह को पसन्द है कि बन्दे पर उसकी नेअमत ज़ाहिर हो. अल्लाह की नेअमत का इज़हार ख़ूलूस के साथ हो तो यह भी शुक्र है और इसलिये आदमी को अपनी हैसियत के लायक़ जायज़ लिबासों में बेहतर लिबास पहनना मुस्तहब है.

(22) बुख़्ल यानी कंजूसी के बाद फ़ुज़ूल ख़र्ची की बुराई बयान फ़रमाई. कि जो लोग केवल दिखावे के लिये या नाम कमाने के लिये ख़र्च करते हैं और अल्लाह की ख़ुशी हासिल करना उनका लक्ष्य नहीं होता, जैसे कि मुश्रिक और मुनाफ़िक़, ये भी उन्हीं के हुक्म में हैं जिन का हुक्म ऊपर गुज़र गया.

(23) दुनिया और आख़िरत में, दुनिया में तो इस तरह कि वह शैतानी काम करके उसको ख़ुश करता रहा और आख़िरत में इस तरह कि हर काफ़िर एक शैतान के साथ आग की ज़ंजीर में जकड़ा होगा. (ख़ाज़िन)
(24) इसमें सरासर उनका नफ़ा ही था.

(25) उस नबी को, और वह अपनी उम्मत के ईमान और कुफ़्र पर गवाही दें क्योंकि नबी अपनी उम्मतों के कामों से बा-ख़बर होते हैं.

(26) कि तुम नबियों के सरदार हो और सारा जगत तुम्हारी उम्मत.

(27) क्योंकि जब वो अपनी ग़लती का इन्कार करेंगे और क़सम खाकर कहेंगे कि हम मुश्रिक न थे और हमने ख़ता न की थी तो उनके मुंहों पर मुहर लगा दी जाएगी और उनके शरीर के अंगों को ज़बान दी जाएगी, वो उनके ख़िलाफ़ गवाही देंगे.Filed under: 04. Al -Nisa | Leave a comment »

सूरए निसा – सातवाँ रूकू

सूरए निसा – सातवाँ रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ ईमान वालो, नशे की हालत में नमाज़ के पास न जाओ (1)
जब तक इतना होश न हो कि जो कहो उसे समझो और न नापाकी की हालत में बे नहाए मगर मुसाफ़िरी में (2)
और अगर तुम बीमार हो (3)
या सफ़र में या तुम में से कोई क़ज़ाए हाजत (पेशाब पख़ाना) से आया  (4)
या तुमने औरतों को छुआ(5)
और पानी न पाया(6)
तो पाक मिट्टी से तयम्मुम करो (7)
तो अपने मुंह और हाथों का मसह (हाथ फेरना)  करो(8)
बेशक अल्लाह माफ़ करने वाला बख़्शने वाला है (43)
क्या तुमने उन्हें न देखा जिनको किताब से एक हिस्सा मिला (9)
गुमराही मोल लेते है(10)
और चाहते है (11)
तुम भी राह से बहक जाओ (44) और अल्लाह ख़ूब जानता है तुम्हारे दुश्मनों को  (12)
और अल्लाह काफ़ी है वाली (मालिक) (13)
और अल्लाह काफ़ी है मददगार (45) कुछ यहूदी कलामों की उनकी जगह से फेरते हैं (14)
और (15)
कहते है हमने सुना और न माना और (16)
सुनिये आप सुनाए न जाएं (17)
और राना कहते हैं (18)
ज़बाने फेर कर (19)
और दीन में तअने (लांछन) के लिये (20)
और अगर वो  (21)
कहते है कि हमने सुना और माना और हुज़ूर हमारी बात सुनें और हुज़ूर हमपर नज़र फ़रमाएं तो उनके लिये भलाई और रास्ती में
ज़्यादा होता लेकिन उनपर तो अल्लाह ने लानत की उनके कुफ्र की वजह से तो यक़ीन नहीं रखते मगर थोड़ा (22) (46)
ऐ किताब वालो ईमान लाओ उसपर जो हमने उतारा तुम्हारे साथ वाली किताब (23)
की पुष्टि फ़रमाता इससे पहले कि हम बिगाड़ें कुछ मुंहों को (24)
तो उन्हें फेर दे उनकी पीठ की तरफ़ या उन्हें लानत करें जैसी लानत की हफ़्ते वालों पर (25)
और ख़ुदा का हुक्म होकर रहे  (47) बेशक अल्लाह इसे नहीं बख़्शता कि उसके साथ कुफ्र किया जाए  और कुफ्र से नीचे जो कुछ है जिसे चाहे माफ़ फ़रमा देता है (26)
और जिसने ख़ुदा का शरीक ठहराया उसने बड़ा गुनाह का तूफ़ान बांधा (48) क्या तुमने उन्हें न देखा जो ख़ुद अपनी सुथराई बयान करते हैं (27)
कि अल्लाह जिसे चाहे सुथरा करे और उनपर ज़ुल्म न होगा ख़ुर्में के दाने के डोरे बराबर (28)(49)
देखो कैसा अल्लाह पर झूठ बांध रहे हैं (29) और यह काफ़ी है खुल्लम खुल्ला गुनाह (50)

तफसीर 
सूरए निसा – सातवाँ रूकू

(1) हज़रत अब्दुर रहमान बिन औफ़ ने सहाबा की एक जमाअत की दावत की. उसमें खाने के बाद शराब पेश की गई. कुछ ने पी, क्योंकि उस वक़्त तक शराब हराम न हुई थी. फिर मग़रिब की नमाज़ पढ़ी. इमाम नशे में “क़ुल या अय्युहल काफ़िरूना अअबुदो मा तअबुदूना व अन्तुम आबिदूना मा अअबुद” पढ़ गए और दोनों जगह “ला” (नहीं) छोड़ गए और नशे में ख़बर न हुई. और आयत का मतलब ग़लत हो गया. इस पर यह आयत उतरी और नशे की हालत में नमाज़ पढ़ने से मना फ़रमा दिया गया. तो मुसलमानों ने नमाज़ के वक़्तों में शराब छोड़ दी. इसके बाद शराब बिल्कुल हराम कर दी गई. इस से साबित हुआ कि आदमी नशे की हालत में कुफ़्र का कलिमा ज़बान पर लाने से काफ़िर नहीं होता. इसलिये कि “क़ुल या अय्युहल काफ़िरूना” में दोनों जगह “ला” का छोड़ देना कुफ़्र है, लेकिन उस हालत में हुज़ूर ने उस पर कुफ़्र का हुक्म न फ़रमाया बल्कि क़ुरआने पाक में उनको “या अय्युहल लज़ीना आमनू” (ऐ ईमान वालों) से ख़िताब फ़रमाया गया.

(2) जबकि पानी न पाओ, तयम्मुम कर लो.

(3) और पानी का इस्तेमाल ज़रूर करता हो.

(4) यह किनाया है बे वुज़ू होने से.

(5) यानी हमबिस्तरी की.

(6) इसके इस्तेमाल पर क़ादिर न होने, चाहे पानी मौजूद न होने के कारण या दूर होने की वजह से या उसके हासिल करने का साधन न होने के कारण या साँप, ख़तरनाक जंगली जानवर, दुश्मन वग़ैरह कोई रूकावट होने के कारण.

(7) यह हुक्म मरीज़ों, मुसाफ़िरों, जनाबत और हदस वालों को शामिल है, जो पानी न पाएं या उसके इस्तेमाल से मजबूर हों (मदारिक). माहवारी, हैज़ व निफ़ास से पाकी के लिये भी पानी से मजबूर होने की सूरत में तयम्मुम जायज़ है, जैसा कि हदीस शरीफ़ में आया है.

(8) तयम्मुम का तरीक़ा :

 तयम्मुम करने वाला दिल से पाकी हासिल करने की नियत करे. तयम्मुम में नियत शर्त है क्योंकि अल्लाह का हुक्म आया है. जो चीज़ मिट्टी की जिन्स से हो जैसे धूल, रेत, पत्थर, उन सब पर तयम्मुम जायज़ है. चाहे पत्थर पर धूल भी न हो लेकिन पाक होना इन चीज़ों में शर्त है. तयम्मुम में दो ज़र्बें हैं, एक बार हाथ मार कर चेहरे पर फेर लें, दूसरी बार हाथों पर. पानी के साथ पाक अस्ल है और तयम्मुम पानी से मजबूर होने की हालत में उसकी जगह लेता
है. जिस तरह हदस पानी से ज़ायल होता है, उसी तरह तयम्मुम से. यहाँ तक कि एक तयम्मुम से बहुत से फ़र्ज़ और नफ़्ल पढ़े जा सकते हैं. तयम्मुम करने वाले के पीछे ग़ुस्ल और वुज़ू वाले की नमाज़ सही है. ग़ज़वए बनी मुस्तलक़ में जब इस्लामी लश्कर रात को एक वीराने में उतरा जहाँ पानी न था और सुबह वहाँ से कूच करने का इरादा था, वहाँ उम्मुल मूमिनीन हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा का हार खो गया. उसकी तलाश के लिये सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने वहाँ क़याम फ़रमाया. सुबह हुई तो पानी न था. अल्लाह तआला ने तयम्मुम की आयत उतारी. उसैद बिन हदीर रदियल्लाहो अन्हो ने कहा कि ऐ आले अबूबक्र, यह तुम्हारी पहली ही बरकत नहीं है, यानी तुम्हारी बरकत से मुसलमानों को बहुत आसानियाँ हुई और बहुत से फ़ायदे पहुंचे. फिर ऊंट उठाया गया तो उसके नीचे हार मिला. हार खो जाने और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के
न बताने में बहुत हिकमत हैं. हज़रत सिद्दीक़ा के हार की वजह से क़याम उनकी बुज़ुर्गी और महानता ज़ाहिर करता है. सहाबा का तलाश में लग जाना, इसमें हिदायत है कि हुज़ूर की बीबियों की ख़िदमत ईमान वालों की ख़ुशनसीबी है, और फिर तयम्मुम का हुक्म होना, मालूम होता है कि हुज़ूर की पाक बीबियों की ख़िदमत का ऐसा इनआम है, जिससे क़यामत तक मुसलमान फ़ायदा उठाते रहेंगे. सुब्हानल्लाह !

(9) वह यह कि तौरात से उन्होंने सिर्फ़ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की नबुव्वत को पहचाना और उसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का जो बयान था उस हिस्से से मेहरूम रहे और आपके नबी होने का इन्कार कर बैठै. यह आयत रिफ़ाआ बिन ज़ैद और मालिक बिन दख़्श्म यहूदियों के बारे में उतरी. ये दोनों जब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बात करते तो ज़बान टेढ़ी करके बोलते.

Hazrat ibrahim bin adham in hindi

(10) हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत का इन्कार करके.

(11) ऐ मुसलमानों !

(12) और उसने तुम्हें भी उनकी दुश्मनी पर ख़बरदार कर दिया तो चाहिये कि उनसे बचते रहो.

(13) और जिसके काम बनाने वाला अल्लाह हो उसे क्या डर.

(14) जो तौरात शरीफ़ में अल्लाह तआला ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नात में फ़रमाए.

(15) जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उन्हें कुछ हुक्म फ़रमाते हैं तो.

(16) कहते हैं.

(17) यह कलिमा दो पहलू रखता है. एक पहलू तो यह कि कोई नागवार बात आपको सुनने में न आए और दूसरा पहलू यह कि आपको सुनना नसीब न हो.
(18) इसके बावुजूद कि इस कलिमे के साथ सम्बोधन करने को मना किया गया है क्योंकि उनकी ज़बान में ख़राब मानी रखता है.

(19) हक़ यानी सच्चाई से बातिल यानी बुराई की तरफ़

(20) कि वो अपने दोस्तों से कहते थे कि हम हुज़ूर की बुराई करते हैं. अगर आप नबी होते तो आप इसको जान लेते. अल्लाह तआला ने उनके दिल में छुपी कटुता और ख़बासत को ज़ाहिर फ़रमा दिया.

(21) इन कलिमात की जगह अदब और आदर करने वालों के तरीक़े पर.

(22) इतना कि अल्लाह ने उन्हें पैदा किया और रोज़ी दी और इतना काफ़ी नहीं जब तक कि ईमान वाली बातों को न मानें और सब की तस्दीक़ न करें.

(23) तौरात.

(24) आँख नाक कान पलकें वग़ैरह नक़्शा मिटा कर.

(25) इन दोनों बातों में से एक ज़रूर लाज़िम है. और लानत तो उन पर ऐसी पड़ी कि दुनिया उन्हें बुरा कहती है. यहाँ मुफ़स्सिरों के कुछ अलग अलग क़ौल हैं. कुछ इस फटकार का पड़ना दुनिया में बताते हैं, कुछ आख़िरत में. कुछ कहते है कि लानत हो चुकी और फटकार पड़ गई. कुछ कहते हैं कि अभी इन्तिज़ार है. कुछ का क़ौल है कि यह फटकार उस सूरत में थी जबकि यहूदियों में से कोई ईमान न लाता और चूंकि बहुत से यहूदी ईमान ले आए, इसलिये शर्त नहीं पाई गई और फटकार उठ गई. हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम जो यहूदी आलिमों के बड़ों में से हैं, उन्होंने मुल्के शाम से वापस आते हुए रास्ते में यह आयत सुनी और अपने घर पहुंचने से पहले इसलाम लाकर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह मैं नहीं ख़याल करता था कि मैं अपना मुंह पीठ की तरफ़ फिर जाने से पहले और चेहरे का नक़्शा मिट जाने से पहले आपकी ख़िदमत में हाज़िर हो सकूंगा, यानी इस डर से उन्होंने ईमान लाने में जल्दी की क्योंकि तौरात शरीफ़ से उन्हें आपके सच्चे रसूल होने का यक़ीनी इल्म था, इसी डर से कअब अहबार जो यहूदियों में बड़ी बुज़ुर्गी रखते थे, हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो से यह आयत सुनकर मुसलमान हो गए.

(26) मानी यह हैं कि जो कुफ़्र पर मरे उसकी बख़्शिश नहीं. उसके लिये हमेशगी का अज़ाब है और जिसने कुफ़्र न किया हो, वह चाहे कितना ही बड़ा गुनाह करने वाला हो, और तौबह के बग़ैर मर जाए, तो उसका बदला अल्लाह की मर्ज़ी पर है, चाहे माफ़ फ़रमाए या उसके गुनाहों पर अज़ाब करे फिर अपनी रहमत से जन्नत में दाख़िल फ़रमाए. इस आयत में यहूदियों को ईमान की तरग़ीब है और इस पर भी प्रमाण है कि यहूदियों पर शरीअत के शब्दों में मुश्रिक शब्द लागू होना सही है.

(27) यह आयत यहूदियों और ईसाईयों के बारे में नाज़िल हुई जो अपने आपको अल्लाह का बेटा और उसका प्यारा बताते थे और कहते थे कि यहूदियों और ईसाईयों के सिवा कोई जन्नत में दाख़िल न होगा. इस आयत में बताया गया कि इन्सान का, दीनदारी, नेक काम, तक़वा और अल्लाह की बारगाह में क़ुर्ब और मक़बूलियत का दावेदार होना और मुंह से अपनी तारीफ़ करना काम नहीं आता.

(28) यानी बिल्कुल ज़ुल्म न होगा. वही सज़ा दी जाएगी जो उनका हक़ है.

(29) अपने आपको गुनाह और अल्लाह का प्यारा बताकर

सूरए निसा – बाईसवाँ रूकू

सूरए निसा – बाईसवाँ रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला 

ऐ मेहबूब, किताब वाले  (1)
तुमसे सवाल करते हैं कि उनपर आसमान से एक किताब उतार दो (2)
तो वो तो मूसा से इससे भी बड़ा सवाल कर चुके  (3)
कि बोले हमें अल्लाह को खुल्लमखुल्ला दिखा दो तो उन्हें कड़क ने आ लिया उनके गुनाहों पर फिर बछड़ा ले बैठे  (4)
बाद इसके कि रौशन आयतें (5)
उनके पास आ चुकीं तो हमने यह माफ़ फ़रमा दिया (6)
और हमने मूसा को रौशन (खुला) ग़लबा दिया (7)(153)
फिर हमने उनपर तूर को ऊचां किया उनसे एहद लेने को और उनसे फ़रमाया कि हफ़्ते में हद से न बढ़ो (8)
और हमने उनसे गाढ़ा एहद लिया  (9) (154)
तो उनकी कैसी बद एहदियों के सबब हमने उनपर लअनत की और इसलिये कि वो अल्लाह की निशानियों के इन्कारी हुए (10)
और नबियों को नाहक़ शहीद करते  (11)
और उनके इस कहने पर कि हमारे दिलों पर ग़लाफ़ हैं  (12)
बल्कि अल्लाह ने उनके कुफ़्र के सबब उनके दिलों पर मुहर लगा दी है तो ईमान नहीं लाते मगर थोड़े (155) और इसलिये कि उन्होंने कुफ़्र किया (13)
और मरयम पर बड़ा बोहतान  (आरोप) उठाया (156) और उनके इस कहने पर कि हमने मसीह ईसा मरयम के बेटे अल्लाह के रसूल को शहीद किया (14)
और है यह कि उन्होंने न उसे क़त्ल किया और न उसे सूली दी बल्कि उनके लिये उनकी शबीह का  (उनसे मिलता जुलता) एक बना दिया गया (15)
और वो जो उसके बारे में विरोध कर रहे हैं ज़रूर उसकी तरफ़ से शुबह में पड़े हुए हैं  (16)
उन्हें उसकी कुछ भी ख़बर नहीं (17)
मगर यह गुमान की पैरवी  (18)
और बेशक उन्होंने उसको क़त्ल नहीं किया  (19)  (157)
बल्कि अल्लाह ने उसे अपनी तरफ़ उठा लिया (20)
और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है  (158) कोई किताबी  ऐसा नहीं जो उसकी मौत से पहले उसपर ईमान न लाए (21)
और क़यामत के दिन वह उनपर गवाह होगा  (22)  (159)
तो यहूदियों के बड़े ज़ुल्म के (23)
सबब हमने वो कुछ सुथरी चीज़ें कि उनके लिये हलाल थीं (24)
उनपर हराम फ़रमा दीं और इसलिये कि उन्होंने बहुतों को अल्लाह की राह से रोका  (160) और इसलिये कि वो सूद लेते हालांकि वो इससे मना किये गए थे और लोगों का माल नाहक़ खा जाते  (25)
और उनमें जो काफ़िर हुए हमने उनके लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है  (161) हाँ जो उनमें इल्म में पक्के (26)
और ईमान वाले हैं वो ईमान लते हैं उसपर जो ऐ मेहबूब, तुम्हारी तरफ़ उतरा और जो तुमसे पहले उतरा (27)
और नमाज़ क़ायम रखने वाले और ज़कात देने वाले और अल्लाह और क़यामत पर ईमान लाने वाले ऐसों को जल्द ही हम बड़ा सवाब देंगे (162)

तफसीर 
सूरए निसा _ बाईसवाँ रूकू

(1) बग़ावत के अन्दाज़ में.

(2) एक साथ ही. यहूदियों में कअब बिन अशरफ़ फ़ख़्ख़ास बिन आज़ूरा ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा कि अगर आप नबी हैं तो हमारे पास आसमान से एक साथ एक बार में ही किताब लाइये जैसा हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तौरात लाए थे. यह सवाल उनका हिदायत और अनुकरण की तलब के लिये न था बल्कि सरकशी और बग़ावत से था. इसपर यह आयत उतरी.

Mot K Waqt Ki Kafiyat in Hindi

(3) यानी यह सवाल उनका भरपूर जिहालत से है और इस क़िस्म की जिहालतों मे उनके बाप दादा भी गिरफ़्तार थे. अगर सवाल हिदायत की तलब के लिये होता तो पूरा कर दिया जाता मगर वो तो किसी हाल में ईमान लाने वाले न थे.

(4) उसको पूजने लगे.

(5) तौरात और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार जो अल्लाह तआला के एक होने और हज़रत मूसा की सच्चाई पर खुली दलील थे, और  इसके बावुजूद कि तौरात हमने एक साथ ही उतारी थी. लेकिन “बुरी ख़सलत वाले को हज़ार बहाने”, अनुकरण के बजाय उन्होंने ख़ुदा के देखने का सवाल किया.

(6) जब उन्होंने तौबह की. इसमें हुज़ूर के जमाने के यहूदियों के लिये उम्मीद है कि वो भी तौबह करें तो अल्लाह तआला उन्हें भी अपने क़रम से माफ़ फ़रमाए.

(7) ऐसा क़ब्ज़ा अता फ़रमाया कि जब आपने बनी इस्राईल को तौबह के लिये ख़ुद उनके अपने क़त्ल का हुक्म दिया, वो इन्कार न कर सके और उन्होंने हुक्म माना.

(8) यानी मछली का शिकार वग़ैरह जो अमल उस दिन तुम्हारे लिये हलाल नहीं, न करो. सुरए बक़रह में इन तमाम आदेशों की तफ़सील गुज़र चुकी.

(9) कि जो उन्हें हुक्म दिया गया है, करें और  जिसे रोका गया है, उससे दूर रहे. फिर उन्होंने इस एहद को तोड़ा.

(10) जो नबियों की सच्चाई के प्रमाण थे, जैसे कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार.

(11) नबियों का क़त्ल करना तो नाहक़ है ही, किसी तरह हक़ हो ही नहीं सकता. लेकिन यहाँ मक़सूद यह है कि उनके घमण्ड में भी इसका कोई हक़ न था.

(12) लिहाज़ा कोई नसीहत और उपदेश कारगर नहीं हो सकता.

(13) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथ भी.

(14) यहूदियों ने दावा किया कि उन्होंने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को क़त्ल कर दिया और ईसाइयों ने उसकी तस्दीक़ की थी.अल्लाह तआला ने इन दोनो के दावे ग़लत कर दिये.

(15) जिसको उन्होंने क़त्ल किया और ख़्याल करते रहे कि यह हज़रत ईसा हैं, जबकि उनका यह ख़्याल ग़लत था.

(16) और यक़ीनी नहीं कह सकते कि वह क़त्ल होने वाला शख़्स कौन है. कुछ कहते हैं कि यह मक़तूल ईसा हैं, कुछ कहते हैं कि यह चेहरा तो ईसा का है और  जिस्म उनका नहीं, लिहाज़ा यह वह नहीं, इसी संदेह में हैं.

(17) जो वास्तवकिता और  हक़ीक़त है.

(18) और अटकलें दौड़ाना.

(19) उनका क़त्ल का दावा झूटा है.

(20) सही व सालिम आसमान की तरफ़. हदीसों में इसकी तफ़सील आई है. सूरए आले इमरान में इस घटना का ज़िक्र गुज़र चुका.

(21) इस आयत की तफ़सीर में कुछ क़ौल हैं, एक क़ौल यह है कि यहूदियों और ईसाइयों को अपनी मौत के वक़्त जब अज़ाब के फ़रिश्ते नज़र आते हैं तो वो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर ईमान ले आते हैं जिनके साथ उन्होंने कुफ़्र किया था और उस वक़्त का ईमान क़ुबूल और विश्वसनीय नहीं. दूसरा क़ौल यह है कि क़यामत के क़रीब जब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम आसमान से उतरेंगे उस वक़्त के सारे किताब वाले उनपर ईमान ले आएंगे. उस वक़्त हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम शरीअतें मुहम्मदी के मुताबिक हुक्म देंगे और उसी दीन के इमामों में से एक इमाम की हैसियत में होंगे, और  ईसाइयों ने उनकी निस्बत जो गुमान बांधे रखे हैं उनको झुटलाएंगे, दीने मुहम्मदी का प्रचार करेंगे, उस वक़्त यहूदियों और ईसाइयों को या तो इस्लाम क़ूबूल करना होगा या क़त्ल करदिये जाएंगे. जिज़िया क़ुबूल करने का हुक्म हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के उतरने के वक्त तक है. तीसरे क़ौल के अनुसार आयत के मानी यह है कि हर किताबी अपनी मौत से पहले सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान ले आएगा, लेकिन मौत के वक्त का ईमान मक़बूल नहीं, फ़ायदा न पहुंचाएगा.

हज़रते अबू हुरैरह रदियल्लाहू अन्हु की अक्ल का राज़

सूरए निसा -तेईसवाँ रूकू

सूरए निसा _ तेईसवाँ रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला 

बेशक ऐ मेहबूब, हमने तुम्हारी तरफ़ वही भेजी जैसी वही नूह और उसके बाद के पैग़म्बरों को भेजी (1)
और  हमने इब्राहीम और इस्माईल और इस्हाक़ और याक़ूब और उनके बेटों और ईसा और अय्यूब और यूनुस और  हारून और सुलैमान को वही की और हमने दाऊद को ज़ुबूर अता फ़रमाई (163) और रसूलों को जिनका ज़िक्र आगे हम तुमसे  (2)
फ़रमा चुके और उन रसूलों को जिनका ज़िक्र तुमसे न फ़रमाया (3)
और अल्लाह ने मूसा से हक़ीक़त में कलाम फ़रमाया (4) (164)
रसूल ख़ुशख़बरी देते (5)
और डर सुनाते (6)
कि रसूलों के बाद अल्लाह के यहाँ लोगों को कोई मजबूरी न रहे (7)
और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है (165) लेकिन ऐ मेहबूब अल्लाह उसका गवाह है जो उसने तुम्हारी तरफ़ उतारा वह उसने अपने इल्म से उतारा है और फ़रिश्तें गवाह हैं और अल्लाह की गवाही काफ़ी (166) वो जिन्होंने कुफ़्र किया (8)
और अल्लाह की राह से रोका (9)
बेशक वो दूर की गुमराही में पड़े (167) बेशक जिन्होंने कुफ़्र किया  (10)
और हद से बढ़े  (11)
अल्लाह कभी उन्हें न बख़्शेगा (12)
और न उन्हें कोई राह दिखाए  (168) मगर जहन्नम का रास्ता कि उसमें हमेशा हमेशा रहेंगे और यह अल्लाह को आसान है (169) ऐ लोगो तुम्हारे पास ये रसूल (13)
हक़ के साथ तुम्हारे रब की तरफ़ से तशरीफ़ लाए तो ईमान लाओ अपने भले को और अगर तुम कुफ़्र करो (14)
तो बेशक अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है (170) ऐ किताब वालो अपने दीन में ज़ियादती न करो (15)
और अल्लाह पर न कहो मगर सच (16)
मसीह ईसा मरयम का बेटा (17)
अल्लाह का रसूल ही है और उसका एक कलिमा (18)
कि मरयम की तरफ़ भेजा और उसके यहां की एक रूह, तो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाओ (19)
और तीन न कहो (20)
बाज़ रहो अपने भले को, अल्लाह तो एक ही ख़ुदा है (21)
पाकी उसे इससे कि उसके कोई बच्चा हो. उसी का माल है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में हैं (22)
और अल्लाह काफ़ी कारसाज़ है (171)

तफसीर 
सूरए निसा _ तेईसवाँ रूकू

(1) यहूदियों और ईसाईयों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से जो यह सवाल किया था कि उनके लिये आसमान से एक साथ ही किताब उतारी जाए तो वो नबुव्वत पर ईमान लाएं. इस पर यह आयत उतरी और उनपर तर्क क़ायम किया गया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के सिवा बहुत से नबी हैं. जिनमें से ग्यारह के नाम यहां आयत में बयान किये गए हैं. किताब वाले इन सबकी नबुव्वत को मानते हैं. इन सब हज़रात में से किसी पर एक साथ किताब न उतरी तो इस वजह से उनकी नबुव्वत तस्लीम करने में किताब वालों को कुछ ऐतिराज़ न हुआ तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत तस्लीम करने में क्या मजबुरी है. और रसूलों के भेजने का मक़सद लोगों की हिदायत और उनको अल्लाह तआला की तौहीद और पहचान का पाठ देना और ईमान को पुख़्ता करना और ईबादत के तरीक़े की सीख देना है. किताब के कई चरणों में उतरने से यह उद्देश्य भरपूर तरीक़े से हासिल होता है कि थोड़ा थोड़ा आसानी से दिल मे बैठता चला जाता है. इस हिकमत को न समझना और ऐतिराज़ करना हद दर्जे की मूर्खता है.

(2) क़ुरआन शरीफ़ में नाम बनाम फ़रमा चुके हैं.

(3) और अब तक उनके नामों की तफ़सील क़ुरआने पाक में ज़िक्र नहीं फ़रमाई गई.

(4) तो जिस तरह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से बेवास्ता कलाम फ़रमाना दूसरे नबियों की नबुव्वत के आड़े नहीं आता, जिनसे इस तरह कलाम नहीं फ़रमाया गया, ऐसे ही हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर किताब का एक साथ उतरना दूसरे नबियों की नबुव्वत में कुछ भी आड़े नहीं आता.

(5) सवाब की, ईमान लाने वालों को.

सूरतुल फ़ातिहा Al- Fatiha

(6) अज़ाब का, कुफ़्र करने वालों को.

(7) और यह कहने का मौक़ा न हो कि अगर हमारे पास रसूल आते तो हम ज़रूर उनका हुक्म मानते और अल्लाह के आज्ञाकारी और फ़रमाँबरदार होते. इस आयत से यह मसअला मालूम होता है कि अल्लाह तआला रसूलों की तशरीफ़ आवरी से पहले लोगों पर अज़ाब नहीं फ़रमाता जैसा दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया “वमा कुन्ना मुअज्ज़िबीना हत्ता नबअसा रसूलन” (और हम अज़ाब करने वाले नहीं जब तक रसूल न भेज लें. सूरए बनी इस्राईल, आयत 15) और यह मसअला भी साबित होता है कि अल्लाह की पहचान शरीअत के बयान और नबियों की ज़बान से ही हासिल होती है, सिर्फ अक़्ल से इस मंज़िल तक पहुंचना मयस्सर नहीं होता.

(8) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत का इन्कार करके.

(9) हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नअत और विशेषताएं छुपाकर और लोगो के दिलों में शुबह डाल कर. (यह हाल यहूदियो का है)

(10) अल्लाह के साथ.

(11) अल्लाह की किताब में हुज़ूर के गुण बदलकर और आपकी नबुव्वत का इन्कार करके.

(12) जब तक वो कुफ़्र पर क़ायम रहें या कुफ़्र पर मरें.

(13) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

(14) और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रिसालत का इन्कार करो तो इस मे उनका कुछ नुक़सान नहीं और अल्लाह तुम्हारे ईमान से बेनियाज़ है.

(15) यह आयत ईसाइयों के बारे में उतरी जिनके कई सम्प्रदाय हो गए थे और हर एक हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की निस्बत अलग अलग कुफ़्री अक़ीदा रखता था. नस्तूरी आपको ख़ुदा का बेटा कहते थे. मरक़ूसी कहते कि वो तीन में के तीसरे हैं और इस कलिमे की तौजीहात में भी मतभेद था. कुछ तीन ताक़तें मानते थे और कहते थे कि बाप, बेटा और रूहुलक़ुदुस, बाप से ज़ात, बेटे से ईसा, रूहुल क़ुदुस से उनमें डाली जानेवाली ज़िन्दगी मुराद लेते थे. तो उनके नज़दीक मअबूद तीन थे और इस तीन को एक बताते थे. “तीन में एक और एक तीन में” के चक्कर में गिरफ्तार थे, कुछ कहते थे कि ईसा नासूतियत और उलूहियत के संगम है, माँ की तरफ़ से उनमें नासूतियत आई और बाप की तरफ़ से उनमें उलूहियत आई.  यह फ़िरक़ाबन्दी ईसाइयों में एक यहूदी ने पैदा की जिसका नाम पोलूस था और उसी ने उन्हें गुमराह करने के लिये इस क़िस्म के अक़ीदों की तालीम दी. इस आयत में किताब वालों को हिदायत की गई कि वो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में इफ़रात व तफ़रीत (बहुत ज़्यादा, बहुत कम) से बाज़ रहे. ख़ुदा और ख़ुदा का बेटा भी न कहें और उनकी तौहीन भी न करें.

(16) अल्लाह का शरीक और बेटा भी किसी को न बनाओ और हुलूल व इत्तिहाद के ऐब भी मत लगाओ और इस सच्चे अक़ीदे पर रहो कि….

(17) है और उस मोहतरम के लिये इसके सिवा कोई नसब नहीं.

(18) कि “हो जा” फ़रमाया और वह बग़ैर बाप और बिना नुत्फ़े के केवल अल्लाह के हुक्म से पैदा हो गए.

(19) और तस्दीक़ करो कि अल्लाह एक है, बेटे और औलाद से पाक है, उसके रसूलों की तस्दीक़ करो और इसकी कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के रसूलों में से हैं.

(20) जैसा कि ईसाइयों का अक़ीदा है कि वह कुफ़्रे महज़ है.

(21) कोई उसका शरीक नहीं.

(22) और वह सब का मालिक है, और जो मालिक हो, वह बाप नहीं हो सकता.

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सूरए निसा – चौबीसवाँ रूकू

Posted on February 8, 2011 by Kanzul Iman in hindi (Kalamur Rahman)

सूरए निसा – चौबीसवाँ रूकू 

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

मसीह अल्लाह का बन्दा बनने से कुछ नफ़रत नहीं करता (1)
और न मुक़र्रब फ़रिश्ते और जो अल्लाह की बन्दगी से नफ़रत और तकब्बुर (घमण्ड) करे तो कोई दम जाता है कि वह सबको अपनी तरफ़ हांकेगा (2)(172)
तो लोग जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उनकी मज़दूरी उन्हें भरपूर देकर अपने फ़ज़्ल से उन्हें और ज़्यादा देगा और वो जिन्होंने (3)
नफ़रत और तकब्बुर किया था उन्हें दर्दनाक सज़ा देगा और अल्लाह के सिवा न अपना कोई हिमायती पाएंगे न मददगार (173) ऐ लोगो बेशक तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से खुली दलील आई (4)
और हमने तुमहारी तरफ़ रौशन नूर उतारा (5) (174)
तो वो जो अल्लाह पर ईमान लाए और उसकी रस्सी मज़बूत थामी तो जल्द ही अल्लाह उन्हें अपनी रहमत और अपने फ़ज़्ल में दाख़िल करेगा (6)
और उन्हें अपनी तरफ़ सीधी राह दिखाएगा (175) ऐ मेहबूब तुमसे फ़तह पूछते हैं तुम फ़रमा दो कि अल्लाह तुम्हें कलाला (7)
में फ़तवा देता है अगर किसी मर्द का देहान्त हो जो बेऔलाद है (8)
और उसकी एक बहन हो तो तर्के में उसकी बहन का आधा है (9)
मर्द अपनी बहन का वारिस होगा अगर बहन की औलाद न हो (10)
फिर अगर दो बहनें हों तर्के में उनका दो तिहाई और अगर भाई बहन हों मर्द भी और औरतें भी तो मर्द का हिस्सा दो औरतों के बराबर, अल्लाह तुम्हारे लिये साफ़ बयान फ़रमाता है कि कहीं बहक न जाओ और अल्लाह हर चीज़ जानता है (176)

तफसीर 
सूरए निसा _ चौबीसवाँ रूकू

(1) नजरान के ईसाइयों का एक प्रतिनिधि मण्डल सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुआ. उसने हुज़ूर से कहा कि आप हज़रत ईसा को ऐब लगाते हैं कि वह अल्लाह के बन्दे हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा के लिये यह आर या शर्म की बात नहीं. इसपर यह आयत उतरी.

(2) यानी आख़िरत में इस घमण्ड की सज़ा देगा.

(3) अल्लाह की इबादत बजा लाने से.

(4) “वाज़ेह दलील” या खुले प्रमाण से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की पाक ज़ात मुराद है, जिनकी सच्चाई पर उनके चमत्कार गवाह हैं, और इन्कार करने वालों को हैरत में डाल देते हैं.

(5) यानी क़ुरआने पाक.

(6) और जन्नत और ऊंचे दर्जे अता फ़रमाएगा.

(7) कलाला उसको कहते है जो अपने बाद न बाप छोड़े न औलाद.

(8) हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि वह बीमार थे तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत सिद्दीक़े अकबर रदियल्लाहो अन्हो के साथ तबियत पूछने तशरीफ़ लाए.हज़रत जाबिर बेहोश थे. हज़रत ने वुज़ू फ़रमाकर वुज़ू का पानी उनपर डाला. उन्हें फ़ायदा हुआ. आँख खोल कर देखा तो हुज़ूर तशरीफ़ फ़रमा हैं. अर्ज़ किया या रसूलल्लाह, मैं अपने माल का क्या इन्तज़ाम करूं. इस पर यह आयत उतरी. (बुख़ारी व मुस्लिम). अबू दाऊद की रिवायत में यह भी है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत जाबिर रदियल्लाहो अन्हो से फ़रमाया, ऐ जाबिर मेरे इल्म में तुम्हारी मौत इस बीमारी से नहीं है. इस हदीस से कुछ मसअले मालूम हुए. बुज़ुर्गों के वुज़ू का पानी तबर्रूक है और उसको शिफ़ा पाने के लिये इस्तेमाल करना सुन्नत है. मरीज़ों की मिज़ाज़पुर्सी और अयादत सुन्नत है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अल्लाह तआला ने ग़ैब के उलूम अता किये हैं, इसलिये हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मालूम था कि हज़रत जाबिर की मौत इस बीमारी से नहीं है.

(9) अगर वह बहन सगी या बाप शरीक हो.

(10) यानी अगर बहन बेऔलाद मरी और भाई रहा तो वह भाई उसके कुछ माल का वारिस होगा.

surah baqarah in hindi Tafseer k saath

आयतें: 286 रूकू 40.

सूरतुल बक़रह पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
अलिफ़ लाम मीम(2)
वह बुलन्द रूत्बा किताब कोई शक की जगह नहीं(3)
इसमें हिदायत है डर वालों को,(4)
वो जो बेदेखे ईमान लाएं,(5)
और नमाज़ क़ायम रखें,(6)
और हमारी दी हुई रोज़ी में से हमारी राह में उठाएं(7)
और वो कि ईमान लाएं उस पर जो ए मेहबूब तुम्हारी तरफ़ उतरा और जो तुम से पहले उतरा,(8)
और आख़िरत पर यक़ीन रख़े (9)
वही लोग अपने रब की तरफ़ से हिदायत पर हैं और वही मुराद को पहुंचने वाले
बेशक वो जिन की क़िसमत में कुफ्र है(10)
उन्हें बराबर है चाहे तुम उन्हें डराओ या न डराओ वो ईमान लाने के नहीं
अल्लाह ने उनके दिलों पर और कानों पर मुहर कर दी और आखों पर घटा टोप है(11)
और उनके लिये बड़ा अज़ाब

तफ़सीर : सूरए बक़रह _ पहला रूकू

1. सूरए बक़रह: यह सूरत मदीना में उतरी. हज़रत इब्ने अब्बास (अल्लाह तआला उनसे राज़ी रहे) ने फ़रमाया मदीनए तैय्यिबह में सबसे पहले यही सूरत उतरी, सिवाय आयत “वत्तक़ू यौमन तुर जऊन” के कि नबीये करीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के आख़िरी हज में मक्कए मुकर्रमा में उतरी. (ख़ाज़िन) इस सूरत में 286 आयतें, चालीस रूकू, छ: हज़ार एक सौ अक्कीस कलिमे (शब्द) 25500 अक्षर यानी हुरूफ़ हैं.(ख़ाज़िन)

पहले क़ुरआन शरीफ़ में सूरतों के नाम नहीं लिखे जाते थे. यही तरीक़ा हज्जाज बिन यूसुफे़ सक़फ़ी ने निकाला. इब्ने अरबी का कहना है कि सूरए बक़रह में एक हज़ार अम्र यानी आदेश, एक हज़ार नही यानी प्रतिबन्ध, एक हज़ार हुक्म और एक हज़ार ख़बरें हैं. इसे अपनाने में बरक़त और छोड़ देने में मेहरूमी है. बुराई वाले जादूगर इसकी तासीर बर्दाश्त करने की ताक़त नहीं रखते. जिस  घर में ये सूरत पढ़ी जाए, तीन दिन तक सरकश शैतान उस में दाख़िल नहीं हो सकता. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि शैतान उस घर से भागता है जिस में यह सूरत पढ़ी जाय. बेहक़ी और सईद बिन मन्सूर ने हज़रत मुग़ीरा से रिवायत की कि जो कोई सोते वक्त़ सूरए बक़रह की दस आयतें पढ़ेगा, वह क़ुरआन शरीफ़ को नहीं भूलेगा. वो आयतें ये है: चार आयतें शुरू की और आयतल कुर्सी और दो इसके बाद की और तीन सूरत के आख़िर की.

तिबरानी और बेहक़ी ने हज़रत इब्ने उमर (अल्लाह उन से राज़ी रहे) से रिवायत की कि हुज़ूर (अल्लाह के दूरूद और सलाम हों उनपर) ने फ़रमाया _मैयत को दफ्न करके क़ब्र के सिरहाने सूरए बक़रह की शुरू की आयतें और पांव की तरफ़ आख़िर की आयतें पढ़ो.

शाने नुज़ूल यानी किन हालात में उतरी:_ अल्लाह तआला ने अपने हबीब (अल्लाह के दूरूद और सलाम हों उनपर) से एक ऐसी किताब उतारने का वादा फ़रमाया था जो न पानी से धोकर मिटाई जा सके, न पुरानी हो. जब क़ुरआन शरीफ़ उतरा तो फ़रमाया “ज़ालिकल किताबु” कि वह किताब जिसका वादा था, यही है. एक कहना यह है कि अल्लाह तआला ने बनी इस्त्राईल से एक किताब उतारने का वादा फ़रमाया था, जब हुज़ूर ने मदीनए तैय्यिबह को हिज़रत फ़रमाई जहाँ यहूदी बड़ी तादाद में थे तो “अलिफ़, लाम मीम, ज़ालिकल किताबु” उतार कर उस वादे के पूरे होने की ख़बर दी. (ख़ाजिन)

2. अलिफ़ लाम मीम:_ सूरतों के शुरू में जो अलग से हुरूफ़ या अक्षर आते है उनके बारे में यही मानना है कि अल्लाह के राज़ों में से है और मुतशाबिहात यानी रहस्यमय भी. उनका मतलब अल्लाह और रसूल जानें. हम उसके सच्चे होने पर ईमान लाते

3. इसलिये कि शक उसमें होता है जिसका सूबूत या दलील या प्रमाण न हो. क़ुरआन शरीफ़ ऐसे खुले और  ताक़त वाले सुबूत या प्रमाण रखता है जो जानकार और इन्साफ वाले आदमी को इसके किताबे इलाही और सच होने के यक़ीन पर मज़बूत करते हैं. तो यह किताब किसी तरह शक के क़ाबिल नहीं, जिस तरह अन्धे के इन्कार से सूरज का वुजूद या अस्तित्व संदिग्ध या शुबह वाला नहीं होता, ऐसे ही दुश्मनी रखने वाले काले दिल के इन्कार से यह किताब शुबह वाली नहीं हो सकती.

4. “हुदल लिल मुत्तक़ीन” (यानि इसमें हिदायत है डर वालों को) हालांकि क़ुरआन शरीफ़ की हिदायत या मार्गदर्शन हर पढ़ने वाले के लिये आम है, चाहे वह मूमिन यानी ईमान वाला हो या काफ़िर, जैसा कि दूसरी आयत में फ़रमाया “हुदल लिन नासे” यानी “हिदायत सारे इन्सानों के लिये” लेकिन चूंकि इसका फ़ायदा अल्लाह से डरने वालों या एहले तक़वा को होता है इसीलिये फ़रमाया गया _ हिदायत डरवालों को. जैसे कहते हैं बारिश हरियाली के लिये है यानी फ़ायदा इससे हरियाली का ही होता है हालांकि यह बरसती  ऊसर और बंजर ज़मीन पर भी है.

“तक़वा” के कई मानी आते हैं, नफ्स या अन्त:करण को डर वाली चीज़ से बचाना तक़वा कहलाता है. शरीअत की भाषा में तक़वा कहते हैं अपने आपको गुनाहों और उन चीज़ों से बचाना जिन्हें अपनाने से अल्लाह तआला ने मना फ़रमाया हैं. हज़रत इब्ने अब्बास (अल्लाह उन से राज़ी रहे) ने फ़रमाया मुत्तक़ी या अल्लाह से डरने वाला वह है जो अल्लाह के अलावा किसी की इबादत और बड़े गुनाहों और बुरी बातों से बचा रहे. दूसरों ने कहा है मुत्तक़ी अपने आप को दूसरों से बेहतर न समझे. कुछ कहते हैं तक़वा हराम या वर्जित चीज़ों का छोड़ना और अल्लाह के आदेशों या एहकामात का अदा करना है. औरों के अनुसार आदेशों के पालन पर डटे रहना और ताअत पर ग़ुरूर से बचना तक़वा है. कुछ का कहना है कि तेरा रब तुझे वहाँ न पाए जहाँ उसने मना फ़रमाया है. एक कथन यह भी है कि तक़वा हुज़ूर (अल्लाह के दूरूद और सलाम हों उनपर) और उनके साथी सहाबा (अल्लाह उन से राज़ी रहे) के रास्ते पर चलने का नाम है.(ख़ाज़िन)
यह तमाम मानी एक दूसरे से जुड़े हैं.
तक़वा के दर्जें बहुत हैं_ आम आदमी का तक़वा ईमान लाकर कु्फ्र से बचना, उनसे ऊपर के दर्जें के आदिमयों का तक़वा उन बातों पर अमल करना जिनका अल्लाह ने हुक्म दिया है और उन बातों से दूर रहना जिनसे अल्लाह ने मना किया है. ख़वास यानी विशेष दर्जें के आदमियों का तक़वा एसी हर चीज़ का छोड़ना है जो अल्लाह तआला से दूर कर दे या उसे भुला दे.(जुमल) इमाम अहमद रज़ा खाँ, मुहद्सि _ए बरेलवी (अल्लाह की रहमत हो उनपर)ने फ़रमाया _ तक़वा सात तरह का है.

(1) कुफ्र से बचना, यह अल्लाह तआला की मेहरबानी से हर मुसलमान को हासिल है
(2) बद_मज़हबी या अधर्म से बचना _ यह हर सुन्नी को नसीब है,
(3) हर बड़े गुनाह से बचना
(4) छोटे गुनाह से भी दूर रहना
(5) जिन बातों की अच्छाई में शक या संदेह हो उनसे बचना
(6) शहवत यानी वासना से बचना
(7) गै़र की तरफ़ खिंचने से अपने आप को रोकना. यह बहुत ही विशेष आदमियों का दर्जा है. क़ुरआन शरीफ़ इन सातों मरतबों या श्रेणियों के लिये हिदायत है.

(5) “अल लज़ीना यूमिनूना बिल ग़ैब” (यानी वो जो बे देखे ईमान लाएं) से लेकर “मुफ़लिहून” (यानी वही मुराद को पहुंचने वाले ) तक की आयतें सच्चे दिल से ईमान लाने और उस ईमान को संभाल कर रखने वालों के बारे में हैं. यानी उन लोगों के हक़ में जो अन्दर बाहर दोनों से ईमानदार हैं. इसके बाद जो आयतें खुले काफ़िरों के बारे में हैं जो अन्दर बाहर दोनों तरह से काफ़िर हैं. इसके बाद “व मिनन नासे” (यानी और कुछ कहते हैं) से तेरह आयतें मुनाफ़िकों के बारे में हैं जो अन्दर से काफ़िर हैं और बाहर से अपने आपको मुसलमान ज़ाहिर करते हैं. (जुमल) “ग़ैब” वह है जो हवास यानी इन्दि्यों और अक्ल़ से मालूम न हो सके. इसकी दो क़िसमें हैं _ एक वो जिसपर कोई दलील या प्रमाण न हो, यह इल्मे ग़ैब यानी अज्ञात की जानकारी जा़ती या व्यक्तिगत है और यही मतलब निकलता है आयत “इन्दहू मफ़ातिहुल ग़ैबे ला यालमुहा इल्ला हू” (और अल्लाह के पास ही अज्ञात की कुंजी है), और अज्ञात की जानकारी उसके अलावा किसी को नहीं) में और उन सारी आयतों में जिनमें अल्लाह के सिवा किसी को भी अज्ञात की जानकारी न होने की बात कही गई है. इस क़िस्म का इल्में ग़ैब यानी ज़ाती जिस पर कोई दलील या प्रमाण न हो, अल्लाह तआला के साथ विशेष या ख़ास है.
गै़ब की दूसरी क़िस्म वह है जिस पर दलील या प्रमाण हो जैसे दुनिया और इसके अन्दर जो चीज़ें हैं उनको देखते हुए अल्लाह पर ईमान लाना, जिसने ये सब चीज़ें बनाई हैं, इसी क़िस्म के तहत आता है क़यामत या प्रलय के दिन का हाल, हिसाब वाले दिन अच्छे और बुरे कामों का बदला इत्यादि की जानकारी, जिस पर दलीलें या प्रमाण मौजूद हैं और जो जानकारी अल्लाह तआला के बताए से मिलती है. इस दूसरे क़िस्म के गै़ब, जिसका तअल्लुक़ ईमान से है, की जानकारी और यक़ीन हर ईमान वाले को हासिल है, अगर न हो तो वह आदमी मूमिन ही न हो.

अल्लाह तआला अपने क़रीबी चहीते बन्दों, नबियों और वलियों पर जो गै़ब के दरवाज़े खोलता है वह इसी क़िस्म का ग़ैब है. गै़ब की तफ़सीर या व्याख्या में एक कथन यह भी है कि ग़ैब से क़ल्ब यानी दिल मुराद है. उस सूरत में मानी ये होंगे कि वो दिल से ईमान लाएं.(जुमल)

ईमान : जिन चीज़ों के बारे में हिदायत और यक़ीन से मालूम है कि ये दीने मुहम्मदी से हैं, उन सबको मानने और दिल से तस्दीक़ या पुष्टि करने और ज़बान से इक़रार करने का नाम सही ईमान है. कर्म या अमल ईमान में दाख़िल नहीं इसीलिये “यूमिनूना बिल गै़बे” के बाद “युक़ीमूनस सलाता” (और नमाज़ क़ायम रखें) फ़रमाया गया.

(6) नमाज़ के क़ायम रखने से ये मुराद है कि इसपर सदा अमल करते हैं और ठीक वक्तों पर पूरी पाबन्दी के साथ सभी अरकान यानी संस्कारों के साथ नमाज़ की अदायगी करते हैं और फ़र्ज़, सुन्नत और मुस्तहब अरकान की हिफ़ाज़त करते है, किसी में कोई रूकावट नहीं आने देते. जो बातें नमाज़ को ख़राब करती हैं उन का पूरा पूरा ध्यान रखते हैं और जैसी नमाज़ पढ़ने का हुक्म हुआ है वैसी नमाज़ अदा करते हैं.

नमाज़ के संस्कार : नमाज़ के हुक़ूक़ या संस्कार दो तरह के हैं एक ज़ाहिरी, ये वो हैं जो अभी अभी उपर बताए गए. दूसरे बातिनी, यानी आंतरिक, पूरी यकसूई या एकाग्रता, दिल को हर तरफ़ से फेरकर सिर्फ अपने पैदा करने वाले की तरफ़ लगा देना और दिल की गहराईयों से अपने रब की तारीफ़ या स्तुति और उससे प्रार्थना करना.

(7) अल्लाह की राह में ख़र्च करने का मतलब या ज़कात है, जैसा दूसरी जगह फ़रमाया “युक़ीमूनस सलाता व यूतूनज़ ज़काता” (यानी नमाज़ क़ायम करते हैं और ज़कात अदा करते है), या हर तरह का दान पुण्य मुराद है चाहे फ़र्ज़ हो या वाजिब, जैसे ज़कात, भेंट, अपनी और अपने घर वालों की गुज़र बसर का प्रबन्ध. जो क़रीबी लोग इस दुनिया से जा चुके हैं उनकी आत्मा की शान्ति के लिये दान करना भी इसमें आ सकता है. बग़दाद वाले पीर हुज़ूर ग़ौसे आज़म की ग्यारहवीं की नियाज़, फ़ातिहा, तीजा चालीसवां वग़ैरह भी इसमें दाख़िल हैं कि ये सब अतिरिक्त दान हैं. क़ुरआन शरीफ़ का पढ़ना और कलिमा पढ़ना नेकी के साथ अतिरिक्त नेकी मिलाकर अज्र और सवाब बढ़ाता है.

क़ुरआन शरीफ़ में इस तरफ़ ज़रूर इशारा किया गया है कि अल्लाह की राह में ख़र्च करते वक्त़, चाहे अपने लिये हो या अपने क़रीबी लोगों के लिये, उसमें बीच का रास्ता अपनाया जाए, यानी न बहुत कम, न बहुत ज्यादा.

“रज़क़नाहुम” (और हमारी दी हुई रोज़ी में से) में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि माल तुम्हारा पैदा किया हुआ नहीं, बल्कि हमारा दिया हुआ है. इसको अगर हमारे हुक्म से हमारी राह में ख़र्च न करो तो तुम बहुत ही कंजूस हो और ये कंजूसी बहुत ही बुरी है.

(8) इस आयत में किताब वालों से वो ईमान वाले मुराद हैं जो अपनी किताब और सारी पिछली किताबों और नबियों (अल्लाह के दुरूद और सलाम हों उनपर) पर भेजे गए अल्लाह के आदेशों पर भी ईमान लाए और क़ुरआन शरीफ़ पर भी. और “मा उन्जिला इलैका” (जो तुम्हारी तरफ़ उतरा) से तमाम क़ुरआन शरीफ़ और सारी शरीअत मुराद है. (जुमल)
जिस तरह क़ुरआन शरीफ़ पर ईमान लाना हर मुसलमान के लिये ज़रूरी है उसी तरह पिछली आसमानी किताबों पर ईमान लाना भी अनिवार्य है जो अल्लाह तआला ने हुज़ूर (अल्लाह के दुरूद और सलाम हो उनपर) से पहले नबियों पर उतारीं. अलबत्ता उन किताबों के जो अहकाम या आदेश हमारी शरीअत में मन्सूख़ या स्थगित कर दिये गए उन पर अमल करना दुरूस्त नहीं, मगर ईमान रखना ज़रूरी है. जैसे पिछली शरीअतों में बैतुल मक़दिस क़िबला था, इसपर ईमान लाना तो हमारे लिये ज़रूरी है मगर अमल यानी नमाज़ में बैतुल मक़दिस की तरफ़ मुंह करना जायज़ नहीं, यह हुक्म उठा लिया गया.

क़ुरआन शरीफ़ से पहले जो कुछ अल्लाह तआला की तरफ़ से उसके नबियों पर उतरा उन सब पर सामूहिक रूप से ईमान लाना फ़र्ज़े एेन और क़ुरआन शरीफ़ में जो कुछ है उस पर ईमान लाना फ़र्ज़े किफ़ाया है, इसीलिये आम आदमी पर क़ुरआन शरीफ़ की तफसीलात की जानकारी फ़र्ज़ नहीं जबकि क़ुरआन शरीफ़ के जानकार मौजूद हों जिन्होंने क़ुरआन के ज्ञान को हासिल करने में पूरी मेहनत
की हो.

(9) यानी दूसरी दुनिया और जो कुछ उसमें है, अच्छाइयों और बुराइयों का हिसाब वग़ैरह सब पर एेसा यक़ीन और इत्मीनान रखते हैं कि ज़रा शक और शुबह नहीं, इसमें एहले किताब (ईसाई और यहूदी)और काफ़िरों वग़ैरह से बेज़ारी है जो आख़िरत यानी दूसरी दुनिया के बारे में ग़लत विचार रखते हैं.
(10) अल्लाह वालों के बाद, अल्लाह के दुश्मनों का बयान फ़रमाना हिदायत के लिये है कि इस मुक़ाबले से हर एक को अपने किरदार की हक़ीक़त और उसके नतीजों या परिणाम पर नज़र हो जाए.
यह आयत अबू जहल, अबू लहब वग़ैरह काफ़िरों के बारे में उतरी जो अल्लाह के इल्म के तहत ईमान से मेहरूम हैं, इसी लिये उनके बारे में अल्लाह तआला की मुख़ालिफ़त या दुश्मनी से डराना या न डराना दोनों बराबर हैं, उन्हें फ़ायदा न होगा. मगर हुज़ूर की कोशिश बेकार नहीं क्योंकि रसूल का काम सिर्फ़ सच्चाई का रास्ता दिखाना और अच्छाई की तरफ़ बुलाना है. कितने लोग सच्चाई को अपनाते है और कितने नहीं, यह रसूल की जवाबदारी नहीं है, अगर क़ौम हिदायत क़ुबूल न करे तब भी हिदायत देने वाले को हिदायत का पुण्य या सवाब मिलेगा ही.

इस आयत में हुज़ूर (अल्लाह के दुरूद व सलाम हो उनपर) की तसल्ली की बात है कि काफ़िरों के ईमान न लाने से आप दुखी न हों, आप की तबलीग़ या प्रचार की कोशिश पूरी है, इसका अच्छा बदला मिलेगा. मेहरूम तो ये बदनसीब है जिन्होंने आपकी बात न मानी.
कुफ़्र के मानी : अल्लाह तआला की ज़ात या उसके एक होने या किसी के नबी होने या दीन की ज़रूरतों में से किसी एक का इन्कार करना या कोई एेसा काम जो शरीअत से मुंह फेरने का सुबूत हो, कुफ्र है.

(11) इस सारे मज़मून का सार यह है कि काफ़िर गुमराही में एेसे डूबे हुए हैं कि सच्चाई के देखने, सुनने, समझने से इस तरह मेहरूम हो गए जैसे किसी के दिल और कानों पर मुहर लगी हो और आंखों पर पर्दा पड़ा हुआ हो.
इस आयत से मालूम हुआ कि बन्दों के कर्म भी अल्लाह की क़ुदरत के तहत हैं.

सूरए बक़रह _ दूसरा रूकू

सूरए बक़रह _ दूसरा रूकू

और कुछ लोग कहते हैं(1)
कि हम अल्लाह और पिछले दीन पर ईमान लाए और वो ईमान वाले नहीं धोखा देना चाहते हैं अल्लाह और ईमान वालों को(2)
और हक़ीक़त में धोखा नहीं देते मगर अपनी जानों को और उन्हें शउर (या आभास)
नहीं उनके दिलों में बीमारी है (3)
तो अल्लाह ने उनकी बीमारी और बढ़ाई और उनके लिये दर्दनाक अज़ाब है बदला उनके झूठ का(4)
और जो उनसे कहा जाए ज़मीन में फ़साद न करो (5)
तो कहते हैं हम तो संवारने वाले हैं, सुनता है। वही फ़सादी हैं मगर उन्हें शउर नहीं,
और जब उनसे कहा जाए ईमान लाऔ जैसे और लोग ईमान लाए हैं(6)
तो कहें क्या हम मूर्खों की तरह ईमान लाएं(7)
सुनता है । वही मूर्ख हैं मगर जानते नहीं (8)
और जब ईमान वालों से मिलें तो कहें हम ईमान लाए और जब अपने शैतानों के पास अकेले हों(9)
तो कहें हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो यूं ही हंसी करते हैं (10)
अल्लाह उनसे इस्तहज़ा फ़रमाता है (अपनी शान के मुताबिक़)(11)
और उन्हें ढील देता है कि अपनी सरकशी में भटकते रहें. ये वो लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही ख़रीदी(12)
तो उनका सौदा कुछ नफ़ा न लाया और वो सौदे की राह जानते ही न थे(13)
उनकी कहावत उसकी तरह है जिसने आग रौशन की तो जब उससे आसपास सब जगमगा उठा, अल्लाह उनका नूर ले गया और उन्हें अंधेरियों में छोड़ दिया कि कुछ नहीं सूझता (14)
बहरे, गूंगे, अन्धे, तो वो फिर आने वाले नहीं या जैसे आसमान से उतरता पानी कि उसमें अंधेरियां हैं और गरज और चमक(15)
अपने कानों में उंगलियां ठूंस रहे हैं,कड़क के कारण मौत के डर से(16)
और अल्लाह काफ़िरों को घेरे हुए है(17)
बिजली यूं ही मालूम होती है कि उनकी निगाहें उचक ले जाएगी(18)
जब कुछ चमक हुई उस में चलने लगे(19)
और जब अंधेरा हुआ, खड़े रह गए और अल्लाह चाहता तो उनके कान और
आंखें ले जाता(20)
बेशक अल्लाह सबकुछ कर सकता हैं(21)

तफ़सीर : सूरए बक़रह _ दूसरा रूकू

1. इससे मालूम हुआ कि हिदायत की राहें उनके लिए पहले ही बन्द न थीं कि बहाने की गुंजायश होती. बल्कि उनके कुफ़्र, दुश्मनी और सरकशी व बेदीनी, सत्य के विरोध और नबियों से दुश्मनी का यह अंजाम है जैसे कोई आदमी डाक्टर का विरोध करें और उसके लिये दवा से फ़ायदे की सूरत न रहे तो
वह ख़ुद ही अपनी दुर्दशा का ज़िम्मेदार ठहरेगा.

2. यहां से तैरह आयतें मुनाफ़िक़ों (दोग़ली प्रवृत्ति वालों) के लिये उतरीं जो अन्दर से काफिर थे और अपने आप को मुसलमान ज़ाहिर करते थे. अल्लाह तआला ने फ़रमाया “माहुम बिमूमिनीन” वो ईमान वाले नहीं यानी कलिमा पढ़ना, इस्लाम का दावा करना, नमाज़ रोज़े अदा करना मूमिन होने के लिये काफ़ी नहीं, जब तक दिलों में तस्दीक़ न हो. इससे मालूम हुआ कि जितने फ़िरक़े (समुदाय) ईमान का दावा करते हैं और कुफ़्र का अक़ीदा रखते हैं सब का यही हुक्म है कि काफ़िर इस्लाम से बाहर हैं.शरीअत में एसों को मुनाफ़िक़ कहते हैं. उनका नुक़सान खुले काफ़िरों से ज्य़ादा है. मिनन नास (कुछ लोग) फ़रमाने में यह इशारा है कि यह गिरोह बेहतर गुणों और इन्सानी कमाल से एसा ख़ाली है कि इसका ज़िक्र किसी वस्फ़ (प्रशंसा) और ख़ूबी के साथ नहीं किया जाता, यूं कहा जाता है कि वो भी आदमी हैं. इस से मालूम हुआ कि किसी को बशर कहने में उसके फ़जा़इल और कमालात (विशेष गुणों) के इन्कार का पहलू निकलता है. इसलिये कुरआन में जगह जगह नबियों को बशर कहने वालों को काफ़िर कहा गया और वास्तव में नबियों की शान में एसा शब्द अदब से दूर और काफ़िरों का तरीक़ा है. कुछ तफसीर करने वालों ने फरमाया कि मिनन नास (कुछ लोगों) में सुनने वालों को आश्चर्य दिलाने के लिये फ़रमाया धोख़ेबाज़, मक्कार और एसे महामूर्ख भी आदमियों में हैं.

3. अल्लाह तआला इससे पाक है कि उसको कोई धोख़ा दे सके. वह छुपे रहस्यों का जानने वाला है. मतलब यह कि मुनाफ़िक़ अपने गुमान में ख़ुदा को धोख़ा देना चाहते हैं या यह कि ख़ुदा को धोख़ा देना यही है कि रसूल अलैहिस्सलाम को धोख़ा देना चाहें क्योंकि वह उसके ख़लीफ़ा हैं, और अल्लाह तआला ने अपने हबीब को रहस्यों (छुपी बातों) का इल्म दिया है, वह उन दोग़लों यानि मुनाफ़िक़ों के छुपे कुफ़्र के जानकार हैं और मुसलमान उनके बताए से बाख़बर, तो उन अधर्मियों का धोख़ा न ख़ुदा पर चले न रसूल पर, न ईमान वालों पर, बल्कि हक़ीक़त में वो अपनी जानों को धोख़ा दे रह हैं. इस
आयत से मालूम हुआ कि तक़ैय्या (दिलों में कुछ और ज़ाहिर कुछ) बड़ा एब है. जिस धर्म की बुनियाद तक़ैय्या पर हो, वो झूठा है. तक़ैय्या वाले का हाल भरोसे के क़ाबिल नहीं होता, तौबह इत्मीनान के क़ाबिल नहीं होती, इसलिये पढ़े लिखों ने फ़रमाया है “ला तुक़बलो तौबतुज़ ज़िन्दीक़ यानी अधर्मी की
तौबह क़बुल किये जाने के क़ाबिल नहीं.

4. बुरे अक़ीदे को दिल की बीमारी बताया गया है. मालूम हुआ कि बुरा अक़ीदा रूहानी ज़िन्दग़ी के लिये हानिकारक है. इस आयत से साबित हुआ कि झूठ हराम है, उसपर भारी अजाब दिया जाता है.

5. काफ़िरों से मेल जोल, उनकी ख़ातिर दीन में कतर ब्यौंत और असत्य पर चलने वालों की ख़ुशामद और चापलूसी और उनकी ख़ुशी के लिये सुलह कुल्ली (यानी सब चलता है) बन जाना और सच्चाई से दूर रहना, मुनाफ़िक़ की पहचान और हराम है. इसी को मुनाफ़िकों का फ़साद फ़रमाया है कि जिस जल्से में गए, वैसे ही हो गए, इस्लाम में इससे मना फ़रमाया गया है. ज़ाहिर और बातिन (बाहर और अन्दर) का एकसा न होना बहुत बड़ी बुराई है.

6. यहां “अन्नासो”से या सहाबए किराम मुराद है या ईमान वाले, क्योंकि ख़ुदा के पहचानने, उसकी फ़रमाबरदारी और आगे की चिन्ता रखने की बदौलत वही इन्सान कहलाने के हक़दार हैं. “आमिनु कमा आमना” (ईमान लाओ जैसे और लोग ईमान लाए) से साबित हुआ कि अच्छे लोगों का इत्तिबाअ
(अनुकरण) अच्छा और पसन्दीदा है. यह भी साबित हुआ कि एहले सुन्नत का मज़हब सच्चा है क्योंकि इसमें अच्छे नेक लोगों का अनुकरण है. बाक़ी सारे समुदाय अच्छे लोगों से मुंह फेरे हैं इसलिये गुमराह हैं. कुछ विद्वानों ने इस आयत को जि़न्दीक़ (अधर्मी) की तौबह क़ुबूल होने की दलील क़रार दिया है. (बैज़ावी) ज़िन्दीक़ वह है जो नबुवत को माने, इस्लामी उसूलों को ज़ाहिर करे मगर दिल ही दिल में ऐसे अक़ीदे रखे जो आम राय में कुफ़्र हों, यह भी मुनाफ़िकों में दाखि़ल हैं.

7. इससे मालूम हुआ कि अच्छे नेक आदमियों को बुरा कहना अधर्मियों और असत्य को मानने वालों का पुराना तरीक़ा है. आजकल के बातिल फ़िर्के भी पिछले बुज़ुर्गों को बुरा कहते हैं. राफ़ज़ी समुदाय वाले ख़ुलफ़ाए राशिदीन और बहुत से सहाबा को, ख़ारिजी समुदाय वाले हज़रत अली और उनके साथियों को, ग़ैर मुक़ल्लिद अइम्मए मुज्तहिदीन (चार इमामों) विशेषकर इमामे अअज़म अबू हनीफ़ा को, वहाबी समुदाय के लोग अक्सर औलिया और अल्लाह के प्यारों को, मिर्जाई समुदाय के लोग पहले नबियों तक को, चकड़ालवी समुदाय के लोग सहाबा और मुहद्दिसीन को, नेचरी तमाम बुज़ुर्गाने दीन को बुरा कहते है और उनकी शान में गुस्ताख़ी करते हैं. इस आयत से मालूम हुआ कि ये सब सच्ची सीधी राह से हटे हुए हैं. इसमें दीनदार आलिमों के लिये तसल्ली है कि वो गुमराहों की बदज़बानियों से बहुत दुखी न हों, समझ लें कि ये अधर्मियों का पुराना तरीक़ा है. (मदारिक)

8. मुनाफ़िक़ो की ये बद _ ज़बानी मुसलमानों के सामने न थी. उनसे तो वो यही कहते थे कि हम सच्चे दिल से ईमान लाए है जैसा कि अगली आयत में है “इज़ा लक़ुल्लज़ीना आमनू क़ालू आमन्ना”(और जब इमान वालों से मिलें तो कहें हम ईमान लाए).ये तबर्राबाज़ियां (बुरा भला कहना) अपनी ख़ास मज्लिसों में करते थे. अल्लाह तआला ने उनका पर्दा खोल दिया. (ख़ाजिन)  उसी तरह आजकल के गुमराह फ़िर्कें (समुदाय) मुसलमानों से अपने झूटे ख्यालों को छुपाते हैं मगर अल्लाह तआला उनकी किताबों और उनकी लिखाईयों से उनके राज़ खोल देता है. इस आयत से मुसलमानों को ख़बरदार किया जाता है कि अधर्मियों की धोख़े बाज़ियों से होशियार रहें, उनके जाल में न आएं.

9. यहां शैतानों से काफ़िरों के वो सरदार मुराद है जो अग़वा (बहकावे) में मसरूफ़ रहते हैं. (ख़ाज़िन और बैज़ावी) ये मुनाफ़िक़ जब उनसे मिलते है तो कहते है हम तुम्हारे साथ हैं और मुसलमानों से मिलना सिर्फ़ धोख़ा और मज़ाक उड़ाने की ग़रज़ से इसलिये है कि उनके राज़ मालूम हों और उनमें फ़साद फैलाने के अवसर मिलें. (ख़ाजिन)

10.यानी ईमान का ज़ाहिर करना यानी मज़ाक उड़ाने के लिये किया, यह इस्लाम का इन्कार हुआ.नबियों और दीन के साथ मज़ाक करना और उनकी खिल्ली उड़ाना कुफ़्र है. यह आयत अब्दुल्लाह बिन उबई इत्यादि मुनाफ़िक़ के बारे़ में उतरी. एक रोज़ उन्होंने सहाबए किराम की एक जमाअत को आते देखा तो इब्ने उबई ने अपने यारों से कहा _ देखों तो मैं इन्हें कैसा बनाता हूं. जब वो हज़रात क़रीब पहुंचे तो इब्ने उबई ने पहले हज़रत सिद्दीके अकबर का हाथ अपने हाथ में लेकर आपकी तअरीफ़ की फिर इसी तरह हज़रत उमर और हज़रत अली की तअरीफ़ की. हज़रत अली मुर्तज़ा ने फ़रमाया _ ए इब्ने उबई, ख़ुदा से डर, दोग़लेपन से दूर रह, क्योंकि मुनाफ़िक़ लोग बदतरीन लोग हैं. इसपर वह कहने लगा कि ये बातें दोग़लेपन से नहीं की गई. खु़दा की क़सम, हम आपकी तरह सच्चे ईमान वाले हैं. जब ये हज़रात तशरीफ़ ले गए तो आप अपने यारों में अपनी चालबाज़ी पर फ़ख्र करने लगा. इसपर यह आयत उतरी कि मुनाफ़िक़ लोग ईमान वालों से मिलते वक्त ईमान और महब्बत जा़हिर करते हैं और उनसे अलग होकर अपनी ख़ास बैठकों में उनकी हंसी उड़ाते और खिल्ली करते हैं. इससे मालूम हुआ कि सहाबए किराम और दीन के पेशवाओ की खिल्ली उड़ाना कुफ़्र हैं.

11. अल्लाह तआला इस्तहज़ा (हंसी करने और खिल्ली उड़ाने) और तमाम ऐबों और बुराइयों से पाक है. यहां हंसी करने के जवाब को इस्तहज़ा फ़रमाया गया ताकि ख़ूब दिल में बैठ जाए कि यह सज़ा उस न करने वाले काम की है. ऐसे मौके़ पर हंसी करने के जवाब को अस्ल क्रिया की तरह बयान करना
फ़साहत का क़ानून है. जैसे बुराई का बदला बुराई. यानी जो बुराई करेगा उसे उसका बदला बुराई की सूरत में मिलेगा.

12. हिदायत के बदले गुमराही ख़रीदना यानी ईमान की जगह कुफ़्र अपनाना बहुत नुक़सान औरघाटे की बात है. यह आयत या उन लोगों के बारे में उतरी जो ईमान लाने के बाद काफ़िर हो गए, या यहूदियों के बारे में जो पहले से तो हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला अलैहे वसल्लम पर ईमान रखते थे मगर जब हुज़ूर तशरीफ़ ले आए तो इन्कार कर बैठे, या तमाम काफ़िरों के बारे में कि अल्लाह तआला ने उन्हें समझने वाली अक़्ल दी, सच्चाई के प्रमाण ज़ाहिर फ़रमाए, हिदायत की राहें खोलीं, मगर उन्होंने अक़्ल और इन्साफ़ से काम न लिया और गुमराही इख्तियार की. इस आयत से साबित हुआ कि ख़रीदों फ़रोख्त (क्रय विक्रय) के शब्द कहे बिना सिर्फ़ रज़ामन्दी से एक चीज़ के बदले दूसरी चीज़ लेना जायज़ है.

13. क्योंकि अगर तिजारत का तरीक़ा जानते तो मूल पूंजी (हिदायत) न खो बैठते.

14. यह उनकी मिसाल है जिन्हें अल्लाह तआला ने कुछ हिदायत दी या उसपर क़ुदरत बख्शी,फिर उन्होंने उसको ज़ाया कर दिया और हमेशा बाक़ी रहने वाली दौलत को हासिल न किया. उनका अंजाम हसरत, अफसोस, हैरत और ख़ौफ़ है. इसमें वो मुनाफ़िक़ भी दाखि़ल हैं जिन्होंने ईमान की नुमाइश की और दिल में कुफ़्र रखकर इक़रार की रौशनी को ज़ाया कर दिया, और वो भी जो ईमान  लाने के बाद दीन से निकल गए, और वो भी जिन्हें समझ दी गई और दलीलों की रौशनी ने सच्चाई को साफ़ कर दिया मगर उन्होंने उससे फ़ायदा न उठाया और गुमराही अपनाई और जब हक़ सुनने, मानने, कहने और सच्चाई की राह देखने से मेहरूम हुए तो कान, ज़बान, आंख, सब बेकार हैं.

15. हिदायत के बदले गुमराही ख़रीदने वालों की यह दूसरी मिसाल है कि जैसे बारिश ज़मीन की ज़िन्दग़ी का कारण होती है और उसके साथ खौफ़नाक अंधेरियां और ज़ोरदार गरज और चमक होती है, उसी तरह क़ुरआन और इस्लाम दिलों की ज़िन्दग़ी का सबब हैं और कुफ़्र, शिर्क, निफ़ाक़ दोगलेपन का
बयान तारीकी (अंधेरे) से मिलता जुलता है. जैसे अंधेरा राहगीर को मंज़िल तक पहुंचने से रोकता  है, एैसे ही कुफ़्र और निफ़ाक़ राह पाने से रोकते हैं.
और सज़ाओ का ज़िक्र गरज से और हुज्जतों का वर्णन चमक से मिलते जुलते हैं.
मुनाफ़िक़ों में से दो आदमी हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास से मुश्रिकों की तरफ भागे, राह में यही बारिश आई जिसका आयत में ज़िक्र है. इसमें ज़ोरदार गरज, कड़क और चमक थी. जब गरज होती तो कानों में उंगलियां ठूंस लेते कि यह कानों को फाड़ कर मार न डाले, जब चमक होती चलने
लगते, जब अंधेरी होती, अंधे रह जाते, आपस में कहने लगे _ ख़ुदा ख़ैर से सुबह करे तो हुज़ूर की ख़िदमत में हाज़िर होकर अपने हाथ हुज़ूर के मुबारक हाथों में दे दें. फिर उन्होंने एेसा ही किया और इस्लाम पर साबित क़दम रहे. उनके हाल को अल्लाह तआला ने मुनाफ़िक़ों के लिये कहावत बनाया जो हुज़ूर की पाक मज्लिस में हाज़िर होते तो कानों में उंगलियां ठूंस लेते कि कहीं हुज़ूर का कलाम उनपर असर न कर जाए जिससे मर ही जाएं और जब उनके माल व औलाद ज्यादा होते और फ़तह और ग़नीमत का माल मिलता तो बिजली की चमक वालों की तरह चलते और कहते कि अब तो मुहम्मद का दीन ही सच्चा है. और जब माल और औलाद का नुक़सान होता और बला आती तो बारिश की अंधेरियों में ठिठक रहने वालों की तरह कहते कि यह मुसीबतें इसी दीन की वजह से हैं और इस्लाम से हट जाते.

16. जैसे अंधेरी रात में काली घटा और बिजली की गरज _ चमक जंगल में मुसाफिरों को हैरान करती हो और वह कड़क की भयानक आवाज़ से मौत के डर से माने कानों में उंगलियां ठूंसते हों. ऐसे ही काफ़िर क़ुरआन पाक के सुनने से कान बन्द करते हैं और उन्हें ये अन्देशा या डर होता है कि कहीं इसकी दिल में घर कर जाने वाली बातें इस्लाम और ईमान की तरफ़ खींच कर बाप दादा का कुफ़्र वाला दीन न छुड़वा दें जो उनके नज्दीक मौत के बराबर है.

17. इसलियें ये बचना उन्हें कुछ फ़ायदा नहीं दे सकता क्योंकि वो कानों में उंगलियां ठूंस कर अल्लाह के प्रकोप से छुटकारा नहीं पा सकते.

18. जैसे बिजली की चमक, मालूम होता है कि दृष्टि को नष्ट कर देगी, ऐसे ही खुली साफ़ दलीलों की रोशनी उनकी आंखों और देखने की क़ुव्वत को चौंधिया देती है.

19. जिस तरह अंधेरी रात और बादल और बािरश की तारीकियों में मुसाफिर आश्चर्यचकित होता है, जब बिजली चमकती है तो कुछ चल लेता है, जब अंधेरा होता है तो खड़ा रह जाता है, उसी तरह इस्लाम के ग़लबे और मोजिज़ात की रोशनी और आराम के वक्त़ मुनाफ़िक़ इस्लाम की तरफ़ राग़िब होते (खिंचते) हैं और जब कोई मशक्कत पेश आती है तो कुफ़्र की तारीक़ी में खड़े रह जाते हैं और इस्लाम से हटने लगते हैं. इसी मज़मून (विषय) को दूसरी आयत में इस तरह इरशाद फ़रमाया “इज़ा दुउ इलल्लाहे व रसूलिही लियहकुमा बैनहुम इज़ा फ़रीक़ुम मिन्हुम मुअरिदुन.”(सूरए नूर, आयत 48) यानी जब बुलाए जाएं अल्लाह व रसूल की तरफ़ कि रसूल उनमें फ़रमाए तो जभी उनका एक पक्ष मुंह फेर जाता है. (ख़ाज़िन वग़ैरह)

20. यानी यद्दपि मुनाफ़िक़ों की हरकतें इसी की हक़दार थीं, मगर अल्लाह तआला ने उनके सुनने और देखने की ताक़त को नष्ट न किया. इससे मालूम हुआ कि असबाब की तासीर अल्लाह की मर्ज़ी के साथ जुड़ी हुई है कि अल्लाह की मर्ज़ी के बिना किसी चीज़ का कुछ असर नहीं हो सकता. यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह की मर्ज़ी असबाब की मोहताज़ नहीं, अल्लाह को कुछ करने के लिये किसी वजह की ज़रूरत नहीं.

21. “शै” उसी को कहते है जिसे अल्लाह चाहे और जो उसकी मर्ज़ी के तहत आ सके. जो कुछ भी है सब “शै” में दाख़िल हैं इसलिये वह अल्लाह की क़ुदरत के तहत है. और जो मुमकिन नहीं यानी उस जैसा दूसरा होना सम्भव नहीं अर्थात वाजिब, उससे क़ुदरत और इरादा सम्बन्धित नहीं होता जैसे
अल्लाह तआला की ज़ात और सिफ़ात वाजिब है, इस लिये मक़दूर (किस्मत) नहीं. अल्लाह तआला के लिये झूट बोलना और सारे ऐब मुहाल (असंभव) है इसीलिये क़ुदरत को उनसे कोई वास्ता नहीं.

सूरए बक़रह _ तीसरा रूकू

सूरए बक़रह _ तीसरा रूकू

ऐ लोगों(1)
अपने रब को पूजो जिसने तुम्हें और तुम से अगलों को पैदा किया ये उम्मीद करते हुए कि तुम्हें परहेज़गारी मिले (2)
और जिसने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना और आसमान को इमारत बनाया और आसमान से पानी उतारा (3)
तो उससे कुछ फल निकाले तुम्हारे खाने को तो अल्लाह के लिये जानबूझकर बराबर वाले न ठहराओ (4)
और अगर तुम्हें कुछ शक हो उसमें जो हमने अपने  (उन ख़ास) बन्दे(5)
पर उतारा तो उस जैसी सूरत तो ले आओ (6)
और अल्लाह के सिवा अपने सब हिमायतियों को बुला लो अगर तुम सच्चे हो, फिर अगर न ला सको और हम फ़रमाए देते है कि हरगिज़ न ला सकोगे तो डरो उस आग से जिसका ईंधन आदमी और पत्थर हैं (7)
तैयार रखी है काफ़िरों के लिये (8)
और ख़ुशख़बरी दे उन्हें जो ईमान लाए और अच्छे काम किये कि उनके लिये बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहें(9)
जब उन्हें उन बागों से कोई फल खाने को दिया जाएगा (सूरत देखकर) कहेंगे यह तो वही रिज्क़ (जीविका) है जो हमें पहले मिला था (10)
और वह (सूरत में) मिलता जुलता उन्हें दिया गया और उनके लिये उन बाग़ों में सुथरी बीबियां हैं (11)
और वो उनमें हमेशा रहेंगे (12)
बेशक अल्लाह इस से हया नहीं फ़रमाता कि मिसाल समझाने को कैसी ही चीज़ का जि़क्र या वर्णन फ़रमाए मच्छर हो या उससे बढ़कर(13)
तो वो जो ईमान लाए वो तो जानते हैं कि यह उनके रब की तरफ़ से हक़ (सत्य) है (14)
रहे काफ़िर वो कहते हैं एसी कहावत में अल्लाह का क्या मक़सूद है, अल्लाह बहुतेरों को इससे गुमराह करता है (15)
और बहुतेरों को हिदायत फ़रमाता है और उससे उन्हें गुमराह करता है जो बेहुक्म हैं (16)
वह जो अल्लाह के अहद (इक़रार) को तोड़ देते हैं (17)
पक्का होने के बाद और काटते हैं उस चीज़ को जिसके जोड़ने का ख़ुदा ने हुक्म दिया है और जमीन में फ़साद फैलाते हैं (18)
वही नुक़सान में हैं भला तुम कैसे ख़ुदा का इन्कार करोगे हालांकि तुम मुर्दा थे उसने तुम्हें जिलाया (जीवंत किया) फिर तुम्हें मारेगा फिर तुम्हें ज़िन्दा करेगा फिर उसी की तरफ़ पलटकर जाओगे (19)
वही है जिसने तुम्हारे लिये बनाया जो कुछ ज़मीन में है (20) फिर आसमान की तरफ़ इस्तिवा (क़सद, इरादा) फ़रमाया तो ठीक सात आसमान बनाए और वह सब कुछ जानता हैं (21)

तफ़सीर : सूरए बक़रह  तीसरा रूकू

(1) सूरत के शुरू में बताया गया कि यह किताब अल्लाह से डरने वालों की हिदायत के लिये उतारी गई है, फिर डरने वालों की विशेषताओ का ज़िक्र फरमाया, इसके बाद इससे मुंह फेरने वाले समुदायो का और उनके हालात का ज़िक्र फरमाया कि फ़रमांबरदार  और क़िस्मत वाले इन्सान हिदायत और तक़वा की तरफ़ राग़िब हों और नाफ़रमानी व बग़ावत से बचें. अब तक़वा हासिल करने का तरीक़ा बताया जा रहा है. “ऐ लोगो” का ख़िताब (सम्बोधन) अकसर मक्के वालों को और “ऐ ईमान वालों” का सम्बोधन मदीने वालों को होता है. मगर यहां यह सम्बोधन ईमान वालों और काफ़िर सब को आम है, इसमें इशारा है कि इन्सानी शराफ़त इसी में है कि आदमी अल्लाह से डरे यानी तक़वा हासिल करे और इबादत में लगा रहे. इबादत वह संस्कार (बंदगी) है जो बन्दा अपनी अब्दीयत और माबूद की उलूहियत (ख़ुदा होना) के एतिक़ाद और एतिराफ़ के साथ पूरे करे. यहां इबादत आम है अर्थात पूजा पाठ की सारी विधियों, तमाम उसूल और तरीको को समोए हुए है. काफ़िर इबादत के मामूर (हुक्म किये गए) हैं जिस तरह बेवुज़ू नमाज़ के  फर्ज़  होने को नहीं रोकता उसी तरह काफ़िर होना इबादत के वाजिब होने को मना नहीं करता और जैसे बेवुज़ू व्यक्ति पर नमाज़ की अनिवार्यता बदन की पाकी को ज़रूरी बनाती है ऐसे ही काफ़िर पर इबादत के वाजिब होने से कुफ़्र का छोड़ना अनिवार्य ठहरता है.

(2) इससे मालूम हुआ कि इ़बादत का फ़ायदा इबादत करने वाले ही को मिलता है, अल्लाह तआला इससे पाक है कि उसको इबादत या और किसी चीज़ से नफ़ा हासिल हो.

(3) पहली आयत में बयान फ़रमाया कि तुम्हें और तुम्हारे पूर्वजों को शून्य से अस्तित्व किया और दूसरी आयत में गुज़र बसर, जीने की सहूलतों, अन्न और पानी का बयान फ़रमाकर स्पष्ट कर दिया कि अल्लाह ही सारी नेअमतों का मालिक है. फिर अल्लाह को छोडकर दूसरे की पूजा सिर्फ बातिल है.

(4) अल्लाह तआला के एक होने के बयान के बाद हुज़ूर सैयदुल अंबिया सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत और क़ुरआने करीम के देववाणी और नबी का मोजिज़ा होने की वह ज़बरदस्त दलील बयान फरमाई जाती है जो सच्चे दिल वाले को इत्मीनान बख्शे  और इंकार करने वालों को लाजवाब कर दे.

(5) ख़ास बन्दे से हुज़ूर पुरनूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मुराद हैं.

(6) यानी ऐसी सूरत बनाकर लाओ   जो फ़साहत (अच्छा कलाम) व बलाग़त और शब्दों के सौंदर्य और प्रबंध और ग़ैब की ख़बरें देने में क़ुरआने पाक की तरह हो.

(7) पत्थर से वो बुत मुराद हैं जिन्हे काफ़िर पूजते हैं और उनकी महब्बत में क़ुरआने पाक और रसूले करीम का इन्कार दुश्मनी के तौर पर करते हैं.

(8) इस से मालूम हुआ कि दोज़ख पैदा हो चुकी है. यह भी इशारा है कि ईमान वालों के लिये अल्लाह के करम से हमेशा जहन्नम में रहना नहीं.

(9) अल्लाह तआला की सुन्नत है कि किताब में तरहीब (डराना) के साथ तरग़ीब ज़िक्र फ़रमाता है. इसीलिये काफ़िर और उनके कर्मों और अज़ाब के ज़िक्र के बाद ईमान वालों का बयान किया और उन्हे जन्नत की बशारत दी. “सालिहातुन” यानी नेकियां वो कर्म हैं जो शरीअत की रौशनी में अच्छे हों. इनमें फ़र्ज़ और नफ़्ल सब दाख़िल हैं. (जलालैन) नेक अमल का ईमान पर अत्फ़ इसकी दलील है कि अमल ईमान का अंग नहीं. यह बशारत ईमान वाले नेक काम करने वालों के लिये बिना क़ैद है और गुनाहगारों को जो बशारत दी गई है वह अल्लाह की मर्ज़ी की शर्त के साथ है कि अल्लाह चाहे तो अपनी कृपा से माफ़ फ़रमाए, चाहे गुनाहों की सज़ा देकर जन्नत प्रदान करें. (मदारकि)

(10) जन्नत के फल एक दूसरे से मिलते जुलते होंगे और उनके मज़े अलग अलग. इतलिये जन्नत वाले कहेंगे कि यही फल तो हमें पहले मिल चुका है, मगर खाने से नई लज़्ज़त पाएंगे तो उनका लुत्फ़ बहुत ज़्यादा हो जाएगा.

(11) जन्नती बीबियां चाहें हूरें हों या और, स्त्रियों की सारी जिस्मानी इल्लतों (दोषों)और तमाम नापाकियों और गंदगियों से पाक होंगी, न जिस्म पर मैल होगा, न पेशाब पख़ाना, इसके साथ ही वो बदमिज़ाजी और बदख़ल्क़ी (बुरे मिजाज़) से भी पाक होंगी.(मदारिक व ख़ाज़िन)

(12) यानी जन्नत में रहने वाले न कभी फ़ना होंगे, न जन्नत से निकाले जाएंगे, इससे मालूम हुआ कि जन्नत और इसमें रहने वालों के लिये फ़ना नही.

(13) जब अल्लाह तआला ने आयत मसलुहुम कमसलिल लज़िस्तौक़दा नारा (उनकी कहावत उसकी तरह है जिसने आग रौशन की) और आयत “कसैय्यिबिम मिनस समाए” (जैसे आसमान से उतरता पानी) में मुनाफ़िक़ो की दो मिसालें बयान फ़रमाई तो मुनाफ़िको ने एतिराज किया कि अल्लाह तआला इससे बालातर है कि ऐसी मिसालें बयान फ़रमाए. उसके रद में यह आयत उतरी.

(14) चूंकि मिसालों का बयान हिकमत (जानकारी, बोध ) देने और मज़मून को दिल में घर करने वाला बनाने के लिये होता है और अरब के अच्छी ज़बान वालों का तरीक़ा है, इसलिये मुनाफ़िक़ो का यह एतिराज ग़लत और बेजा है और मिसालों का बयान सच्चाई से भरपूर है.

(15) “युदिल्लो बिही” (इससे गुमराह करता है) काफ़िरों के उस कथन का जवाब है कि अल्लाह का इस कहावत से क्या मतलब है. “अम्मल लज़ीना आमनू” (वो जो ईमान लाए) और “अम्मल लज़ीना कफ़रू”(वो जो काफ़िर रहे), ये दो जुम्ले जो ऊपर इरशाद हुए, उनकी तफ़सीर है कि इस कहावत या मिसाल से बहुतो को गुमराह करता है जिनकी अक़्लो पर अज्ञानता या जिहालत ने ग़लबा किया है और जिनकी आदत बड़ाई छांटना और दुश्मनी पालना है और जो हक़ बात और खुली हिकमत के इन्कार और विरोध के आदी हैं और इसके बावजूद कि यह मिसाल बहुत मुनासिब है, फिर भी इन्कार करते हैं और इससे अल्लाह तआला बहुतों को हिदायत फ़रमाता है जो ग़ौर और तहक़ीक़ (अनुसंधान) के आदी हैं और इन्साफ के ख़िलाफ बात नही कहते कि हिकमत (बोध) यही है कि बड़े रूत्बे वाली चीज़ की मिसाल किसी क़द्र वाली चीज़ से और हक़ीर (तुच्छ) चीज़ की अदना चीज़ से दी जाए जैसा कि ऊपर की आयत में हक़ (सच्चाई) की नूर (प्रकाश) से और बातिल (असत्य) की ज़ुलमत (अंधेरे) से मिसाल दी गई.

(16) शरीअत में फ़ासिक़ उस नाफ़रमान को कहते हैं जो बड़े गुनाह करे. “फिस्क़” के तीन दर्जे हैं – एक तग़ाबी, वह यह कि आदमी इत्तिफ़ाक़िया किसी गुनाह का मुर्तकिब (करने वाला) हुआ और उसको बुरा ही जानता रहा, दूसरा इन्हिमाक कि बड़े गुनाहों का आदी हो गया और उनसे बचने की परवाह न रही, तीसरा जुहूद कि हराम को अच्छा जान कर इर्तिकाब करे. इस दर्जे वाला ईमान से मेहरूम हो जाता है, पहले दो दर्जो में जब तक बड़ो में बड़े गुनाह (शिर्क व कुफ़्र) का इर्तिकाब न करे, उस पर मूमिन का इतलाक़ (लागू होना) होता है, यहां “फ़ासिकीन” (बेहुक्म) से वही नाफ़रमान मुराद हैं जो ईमान से बाहर हो गए. क़ुरआने करीम में काफ़िरों पर भी फ़ासिक़ का इत्लाक़ हुआ है: इन्नल मुनाफ़िक़ीना हुमुल फ़ासिक़ून” (सूरए तौबह, आयत 67) यानी बेशक मुनाफिक़ वही पक्के बेहुक्म है. कुछ तफ़सीर करने वालों ने यहां फ़ासिक़ से काफ़िर मुराद लिये कुछ ने मुनाफिक़, कुछ ने यहूद.

(17) इससे वह एहद मुराद है जो अल्लाह तआला ने पिछली किताबो में हूजुर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाने की निस्बत फ़रमाया. एक क़ौल यह है कि एहद तीन हैं- पहला एहद वह जो अल्लाह तआला ने तमाम औलादे आदम से लिया कि उसके रब होने का इक़्रार करें. इसका बयान इस आयत में है “व इज़ अख़ज़ा रब्बुका मिम बनी आदमा….” (सूरए अअराफ, आयत 172) यानी और ऐ मेहबूब, याद करो जब तुम्हारे रब ने औलादे आदम की पुश्त से उनकी नस्ल निकाली और उन्हे ख़ुद उन पर गवाह किया, क्या मैं तुम्हारा रब नहीं, सब बोले- क्यों नहीं, हम गवाह हुए. दूसरा एहद नबियों के साथ विशेष है कि रिसालत की तबलीग़ फ़रमाएं और दीन क़ायम करें. इसका बयान आयत “व इज़ अख़ज़ना मिनन नबिय्यीना मीसाक़हुम” (सूरए अलअहज़ाब, आयत सात) में है, यानी और ऐ मेहबूब याद करो जब हमने नबियो से एहद लिया और तुम से और नूह और इब्राहीम और मूसा और ईसा मरयम के बेटे से और हम ने उनसे गाढ़ा एहद लिया. तीसरा एहद उलमा के साथ ख़ास है कि सच्चाई को न छुपाएं. इसका बयान“वइज़ अख़ज़ल्लाहो मीसाक़ल्लजीना उतुल किताब” में है, यानी और याद करो जब अल्लाह ने एहद लिया उनसे जिन्हे किताब अता हुई कि तुम ज़रूर उसे उन लोगो से बयान कर देना और न छुपाना. (सूरए आले इमरान, आयत 187)

(18) रिश्ते और क़राबत के तअल्लुक़ात (क़रीबी संबंध) मुसलबानों की दोस्ती और महब्बत, सारे नबियों को मानना, आसमानी किताबो की तस्दीक, हक़ पर जमा होना, ये वो चीज़े है जिनके मिलाने का हुकम फरमाया गया. उनमें फूट डालना, कुछ को कुछ से नाहक़ अलग करना, तफ़र्क़ो (अलगाव) की बिना डालना हराम करार दिया गया.

(19) तौहीद और नबुव्वत की दलीलों और कुफ़्र और ईमान के बदले के बाद अल्लाह तआला ने अपनी आम और ख़ास नेअमतो का, और क़ुदरत की निशानियों, अजीब बातों और हिकमतो का ज़िक्र फ़रमाया और कुफ़्र की ख़राबी दिल में बिठाने के लिये काफ़िरों को सम्बोधित किया कि तुम किस तरह ख़ुदा का इन्कार करते हो जबकि तुम्हारा अपना हाल उस पर ईमान लाने का तक़ाज़ा करता है कि तुम मुर्दा थे. मुर्दा से बेजान जिस्म मुराद है. हमारे मुहावरे में भी बोलते हैं- ज़मीन मुर्दा हो गई. मुहावरे में भी मौत इस अर्थ में आई. ख़ुद क़ुरआने पाक में इरशाद हुआ “युहयिल अरदा बअदा मौतिहा” (सूरए रूम, आयत 50) यानी हमने ज़मीन को ज़िन्दा किया उसके मरे पीछे. तो मतलब यह है कि तुम बेजान जिस्म थे, अन्सर (तत्व) की सुरत में, फिर ग़िजा की शक्ल में, फिर इख़लात (मिल जाना) की शान में, फिर नुत्फ़े (माद्दे) की हालत में. उसने तुमको जान दी, ज़िन्दा फ़रमाया. फिर उम्र् की मीआद पूरी होने पर तुम्हें मौत देगा. फिर तुम्हें ज़िन्दा करेगा. इससे या क़ब्र की ज़िन्दगी मुराद है जो सवाल के लिये होगी या हश्र की. फिर तुम हिसाब और जज़ा के लिये उसकी तरफ़ लौटाए जाओगे. अपने इस हाल को जानकर तुम्हारा कुफ़्र करना निहायत अजीब है. एक क़ौल मुफ़स्सिरीन का यह भी है कि “कैफ़ा तकफ़ुरूना” (भला तुम कैसे अल्लाह के इन्कारी हो गए) का ख़िताब मूमिनीन से है और मतलब यह है कि तुम किस तरह काफ़िर हो सकते हो इस हाल में कि तुम जिहालत की मौत से मुर्दा थे, अल्लाह तआला ने तुम्हें इल्म और ईमान की ज़िन्दगी अता फ़रमाई, इसके बाद तुम्हारे लिये वही मौत है जो उम्र गुज़रने के बाद सबको आया करती है. उसके बाद तुम्हें वह हक़ीक़ी हमेशगी की ज़िन्दगी अता फ़रमाएगा, फिर तुम उसकी तरफ़ लौटाए जाओगे और वह तुम्हें ऐसा सवाब देगा जो न किसी आंख ने देखा, न किसी कान ने सुना, न किसी दिल ने उसे मेहसूस किया.

(20) यानी खानें, सब्ज़े, जानवर, दरिया, पहाड जो कुछ ज़मीन में है सब अल्लाह तआला ने तुम्हारे दीनी और दुनियावी नफ़े के लिये बनाए. दीनी नफ़ा इस तरह कि ज़मीन के अजायबात देखकर तुम्हें अल्लाह तआला की हिकमत और कुदरत की पहचान हो और दुनियावी मुनाफ़ा यह कि खाओ पियो, आराम करो, अपने कामों में लाओ तो इन नेअमतो के बावुजूद तुम किस तरह कुफ़्र करोगे. कर्ख़ी और अबूबक्र राज़ी वग़ैरह ने “ख़लक़ा लकुम” (तुम्हारे लिये बनाया) को फ़ायदा पहुंचाने वाली चीज़ों की मूल वैघता (मुबाहुल अस्ल) की दलील ठहराया है.

(21) यानी यह सारी चीज़ें पैदा करना और बनाना अल्लाह तआला के उस असीम इल्म की दलील है जो सारी चीज़ों को घेरे हुए है, क्योंकि ऐसी सृष्टि का पैदा करना, उसकी एक-एक चीज़ की जानकारी के बिना मुमकिन नहीं. मरने के बाद ज़िन्दा होना काफ़िर लोग असम्भव मानते थे. इन आयतों में उनकी झूठी मान्यता पर मज़बूत दलील क़ायम फ़रमादी कि जब अल्लाह तआला क़ुदरत वाला (सक्षम) और जानकार है और शरीर के तत्व जमा होने और जीवन की योग्यता भी रखते हैं तो मौत के बाद ज़िन्दगी कैसे असंभव हो सकती है, आसमान और ज़मीन की पैदाइश के बाद अल्लाह तआला ने आसमान में फरिश्तों को और ज़मीन में जिन्नों को सुकूनत दी. जिन्नों ने फ़साद फैलाया तो फ़रिश्तो की एक जमाअत भेजी जिसने उन्हें पहाडों और जज़ीरों में निकाल भगाया.

सूरए बक़रह _ चौथा रूकू

सूरए बक़रह _ चौथा रूकू

और याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से फ़रमाया मैं ज़मीन में अपना नायब बनाने वाला हूं(1)
बोले क्या ऐसे को (नायब) करेगा जो उसमें फ़साद फैलाएगा और ख़ून बहाएगा (2)
और तुझे सराहते हुए तेरी तस्बीह (जाप) करते हैं और तेरी पाकी बोलते हैं फ़रमाया मुझे मालूम है जो तुम नहीं जानते (3)
और अल्लाह तआला ने आदम को सारी (चीज़ों के) नाम सिखाए(4)
फिर सब (चीज़ों) को फ़रिश्तों पर पेश करके फ़रमाया सच्चे हो तो उनके नाम तो बताओ (5)
बोले पाकी है तुझे हमें कुछ इल्म नहीं मगर जितना तूने हमें सिखाया बेशक तू ही इल्म और हिकमत वाला है(6)
फ़रमाया ऐ आदम बतादे उन्हें सब (चीज़ों) के नाम जब उसने (यानि आदम ने)उन्हें सब के नाम बता दिये(7)
फ़रमाया मैं न कहता था कि मैं जानता हूं जो कुछ तुम ज़ाहिर करते और जो कुछ तुम छुपाते हो (8)
और (याद करो) जब हमने फ़रिश्तों को हुक्म दिया कि आदम को सिजदा करो तो सबने सिजदा किया सिवाए इबलीस (शैतान) के कि इन्कारी हुआ और घमन्ड किया ओर काफ़िर हो गया(9)
और हमने फ़रमाया ऐ आदम तू और तेरी बीवी इस जन्नत में रहो और खाओ इसमें से बे रोक टोक जहां तुम्हारा जी चाहे मगर उस पेड़ के पास न जाना(10)
कि हद से बढ़ने वालों में हो जाओगे(11)
तो शैतान ने उससे (यानी जन्नत से) उन्हें लग़ज़िश (डगमगाहट) दी और जहां रहते थे वहां से उन्हें अलग कर दिया (12)
और हमने फ़रमाया नीचे उतरो(13)
आपस में एक तुम्हारा दूसरे का दुश्मन और तुम्हें एक वक्त़ तक ज़मीन में ठहरना और बरतना है(14)
फिर सीख लिये आदम ने अपने रब से कुछ कलिमे (शब्द) तो अल्लाह ने उसकी तौबा क़ुबूल की(15)
बेशक वही है बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान हमने फ़रमाया तुम सब जन्नत से उतर जाओ फिर अगर तुम्हारे पास मेरी तरफ़ से कोई हिदायत आए तो जो मेरी हिदायत का पालन करने वाला हुआ उसे न कोई अन्देशा न कुछ ग़म (16)
और वो जो कुफ्र और मेरी आयतें झुटलांएगे वो दोज़ख़ वाले है उनको हमेशा उस में रहना(39) –

तफ़सीर : सूरए बक़रह चौथा रूकू

(1) ख़लीफ़ा निर्देशो और आदेशों के जारी करने और दूसरे अधिकारों में अस्ल का नायब होता है. यहाँ ख़लीफ़ा से हज़रत आदम (अल्लाह की सलामती उनपर) मुराद है. अगरचे और सारे नबी भी अल्लाह तआला के ख़लीफ़ा हैं. हज़रत दाउद  अलैहिस्सलाम के बारे में फ़रमाया : “या दाउदो इन्ना जअलनाका ख़लीफ़तन फ़िलअर्दे” (सूरए सॉद, आयत 26) यानी ऐ दाऊद,  बेशक हमने तुझे ज़मीन में नायब किया, तो लोगो में सच्चा हुक्म कर.फ़रिश्तों को हज़रत आदम की ख़िलाफ़त की ख़बर इसलिये दी गई कि वो उनके ख़लीफ़ा बनाए जाने की हिकमत (रहस्य) पूछ कर मालूम करलें और उनपर ख़लीफ़ा की बुज़र्गी और शान ज़ाहिर हो कि उनको पैदाइश से पहले ही ख़लीफ़ा का लक़ब अता हुआ और आसमान वालों को उनकी पैदाइश की ख़ुशख़बरी दी गई. इसमें बन्दों को तालीम है कि वो काम से पहले मशवरा किया करें और अल्लाह तआला इससे पाक है कि उसको मशवरे की ज़रूरत हो.

(2) फ़रिश्तों को मक़सद एतिराज या हज़रत आदम पर लांछन नहीं, बल्कि ख़िलाफ़त का रहस्य मालूम करना है, और इंसानों की तरफ़ फ़साद फैलाने की बात जोड़ना इसकी जानकारी या तो उन्हें अल्लाह तआला की तरफ़ से दी गई हो या लौहे मेहफ़ूज से प्राप्त हुई हो या ख़ुद उन्होंने जिन्नात की तुलना में अन्दाज़ा लगाया हो.

(3) यानी मेरी हिकमतें (रहस्य) तुम पर ज़ाहिर नहीं. बात यह है कि इन्सानों में नबी भी होंगे, औलिया भी, उलमा भी, और वो इल्म और अमल दोनों एतिबार से फज़ीलतों (महानताओ) के पूरक होंगे.

(4) अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम पर तमाम चीज़ें और सारे नाम पेश फ़रमाकर उनके नाम, विशेषताएं, उपयोग, गुण इत्यादि सारी बातों की जानकारी उनके दिल में उतार दी.

(5) यानी अगर तुम अपने इस ख़याल में सच्चे हो कि मैं कोई मख़लूक़ (प्राणी जीव) तुमसे ज़्यादा जगत में पैदा न करूंगा और ख़िलाफ़त के तुम्हीं हक़दार हो तो इन चीज़ों के नाम बताओ क्योंकि ख़लीफ़ा का काम तसर्रूफ़ (इख़्तियार) और तदबीर, इन्साफ और अदल है और यह बग़ैर इसके सम्भव नहीं कि ख़लीफ़ा को उन तमाम चीज़ों की जानकारी हो जिनपर उसको पूरा अधिकार दिया गया और जिनका उसको फ़ैसला करना है. अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के फ़रिश्तों पर अफ़ज़ल (उच्चतर) होने का कारण ज़ाहिरी इल्म फ़रमाया. इससे साबित हुआ कि नामों का इल्म अकेलेपन और तनहाइयों की इबादत से बेहतर है. इस आयत से यह भी साबित हुआ कि नबी फ़रिश्तों से ऊंचे हैं.

(6) इसमें फ़रिश्तों की तरफ़ से अपने इज्ज़ (लाचारी) और ग़लती का ऐतिराफ और इस बात का इज़हार है कि उनका सवाल केवल जानकारी हासिल करने के लिये था, न कि ऐतिराज़ की नियत से. और अब उन्हें इन्सान की फ़ज़ीलत (बड़ाई) और उसकी पैदाइश का रहस्य मालूम हो गया जिसको वो पहले न जानते थे.

(7) यानी हज़रत आदम अहैहिस्सलाम ने हर चीज़ का नाम और उसकी पैदाइश का राज़ बता दिया.

(8) फ़रिश्तों ने जो बात ज़ाहिर की थी वह थी कि इन्सान फ़साद फैलाएगा, ख़ून ख़राबा करेगा और जो बात छुपाई थी वह यह थी कि ख़िलाफ़त के हक़दार वो ख़ुद हैं और अल्लाह तआला उनसें ऊंची और जानकार कोई मख़लूक़ पैदा न फ़रमाएगा. इस आयत से इन्सान की शराफ़त और इल्म की बड़ाई साबित होती है और यह भी कि अल्लाह तआला की तरफ तालीम की निस्बत करना सही हैं. अगरचे उसको मुअल्लिम (उस्ताद) न कहा जाएगा, क्योंकि उस्ताद पेशावर तालीम देने वाले को कहते हैं. इससे यह भी मालूम हुआ कि सारे शब्दकोष, सारी ज़बानें अल्लाह तआला की तरफ़ से हैं. यह भी साबित हुआ कि फ़रिश्तों के इल्म और कमालात में बढ़ौत्री होती है.

(9) अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को सारी सृष्टि का नमूना और रूहानी व जिस्मानी दुनिया का मजमूआ बनाया और फ़रिश्तों के लिये कमाल हासिल करने का साधन किया तो उन्हें हुक्म फ़रमाया कि हज़रत आदम को सज्दा करें क्योंकि इसमें शुक्रगुज़ारी (कृतज्ञता) और हज़रत आदम के बड़प्पन के एतिराफ़ और अपने कथन की माफ़ी की शान पाई जाती है. कुछ विद्वानो ने कहा है कि अल्लाह तआला ने हज़रत आदम को पैदा करने से पहले ही सज्दे का हुक्म दिया था, उसकी सनद (प्रमाण) यह आयत है : “फ़ इज़ा सव्वैतुहू व नफ़ख़्तो फ़ीहे मिर रूही फ़क़ऊ लहू साजिदीन” (सूरए अल-हिजर, आयत 29) यानी फिर जब मैं उसे ठीक बनालूं और उसमें अपनी तरफ़ की ख़ास इज़्ज़त वाली रूह फूंकूं तो तुम उसके लिये सज्दे में गिरना.(बैज़ावी). सज्दे का हुक्म सारे फ़रिश्तों को दिया गया था, यही सब से ज़्यादा सही है. (ख़ाज़िन) सज्दा दो तरह का होता है एक इबादत का सज्दा जो पूजा के इरादे से किया जाता है, दूसरा आदर का सज्दा जिससे किसी की ताज़ीम मंजूर होती है न कि इबादत. इबादत का सज्दा अल्लाह तआला के लिए ख़ास है, किसी और के लिये नहीं हो सकता न किसी शरीअत में कभी जायज़ हुआ. यहाँ जो मुफ़स्सिरीन इबादत का सज्दा मुराद लेते हैं वो फ़रमाते हैं कि सज्दा ख़ास अल्लाह तआला के लिए था और हज़रत आदम क़िबला बनाए गए थे. मगर यह तर्क कमज़ोर है क्योंकि इस सज्दे से हज़रत आदम का बड़प्पन, उनकी बुज़ुर्गी और महानता ज़ाहिर करना मक़सूद थी. जिसे सज्दा किया जाए उस का सज्दा करने वाले से उत्तम होना कोई ज़रूरी नहीं, जैसा कि काबा हूज़ुर सैयदुल अंबिया का क़िबला और मस्जूद इलैह (अर्थात जिसकी तरफ़ सज्दा हो) है, जब कि हुज़ूर उससे अफ़ज़ल (उत्तम) है. दूसरा कथन यह है कि यहां इबादत का सज्दा न था बल्कि आदर का सज्दा था और ख़ास हज़रत आदम के लिये था, ज़मीन पर पेशानी रखकर था न कि सिर्फ़ झुकना. यही कथन सही है, और इसी पर सर्वानुमति है. (मदारिक). आदर का सज्दा पहली शरीअत में जायज़ था, हमारी शरीअत में मना किया गया. अब किसी के लिये जायज़ नहीं क्योंकि जब हज़रत सलमान (अल्लाह उनसे राज़ी हो) ने हूज़ुर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को सज्दा करने का इरादा किया तो हूजु़र ने फ़रमाया मख़लूक़ को न चाहिये कि अल्लाह के सिवा किसी को सज्दा करें. (मदारिक). फ़रिश्तों में सबसे पहले सज्दा करने वाले हज़रत जिब्रील हैं, फिर मीकाईल, फिर इसराफ़ील, फिर इज़्राईल, फिर और क़रीबी फ़रिश्तें. यह सज्दा शुक्रवार के रोज़ ज़वाल के वक़्त से अस्त्र तक किया गया. एक कथन यह भी है कि क़रीबी फ़रिश्तें सौ बरस और एक कथन में पाँच सौ बरस सज्दे में रहे. शैतान ने सज्दा न किया और घमण्ड के तौर पर यह सोचता रहा कि वह हज़रत आदम से उच्चतर है, और उसके लिये सज्दे का हुक्म (मआज़ल्लाह) हिक़मत (समझदारी) के ख़िलाफ़ है. इस झूटे अक़ीदे से वह काफिर हो गया. आयत में साबित है कि हज़रत आदम फ़रिश्तों से ऊपर हैं कि उनसे उन्हें सज्दा कराया गया. घमण्ड बहुत बुरी चीज़ है. इससे कभी घमण्डी की नौबत कुफ़्र तक पहुंचती है. (बैज़ावी और जुमल)

(10) इससे गेहूँ या अंगूर वग़ैरह मुराद हैं. (जलालैन)

(11) ज़ुल्म के मानी हैं किसी चीज़ को बे-महल वज़अ यह मना है. और अंबियाए किराम मासूम हैं, उनसे गुनाह सरज़द नहीं होता. और अंबियाए किराम को ज़ालिम कहना उनकी तौहीन और कुफ़्र है, जो कहे वह काफ़िर हो जाएगा. अल्लाह तआला मालिक व मौला है जो चाहे फ़रमाए, इसमें उनकी इज़्ज़त है, दूसरे की क्या मजाल कि अदब के ख़िलाफ कोई बात ज़बान पर लाए और अल्लाह तआला के कहे को अपने लिये भी मुनासिब जाने. हमें अदब, इज़्ज़त, फ़रमाँबरदारी का हुक्म फ़रमाया, हम पर यही लाज़िम है.

(12) शैतान ने किसी तरह हज़रत आदम और हव्वा के पास पहुंचकर कहा, क्या मैं तुम्हें जन्नत का दरख़्त बता दूँ ? हज़रत आदम ने इन्कार किया. उसने क़सम खाई कि में तुम्हारा भला चाहने वाला हूँ. उन्हें ख़याल हुआ कि अल्लाह पाक की झूठी क़सम कौन खा सकता है. इस ख़याल से हज़रत हव्वा ने उसमें से कुछ खाया फिर हज़रत आदम को दिया, उन्होंने भी खाया. हज़रत आदम को ख़याल हुआ कि “ला तक़रबा” (इस पेड़ के पास न जाना) की मनाही तन्ज़ीही (हल्की ग़ल्ती) है, तहरीमी नहीं क्योंकि अगर वह हराम के अर्थ में समझते तो हरगिज ऐसा न करते कि अंबिया मासूम होते हैं, यहाँ हज़रत आदम से इज्तिहाद (फैसला) में ग़लती हुई और इज्तिहाद की ग़लती गुनाह नहीं होती.

(13) हज़रत आदम और हव्वा और उनकी औलाद को जो उनके सुल्ब (पुश्त) में थी जन्नत से ज़मीन पर जाने का हुक्म हुआ. हज़रत आदम हिन्द की धरती पर सरअन्दीप (मौजूदा श्रीलंका) के पहाड़ों पर और हज़रत हव्वा जिद्दा में उतारे गए (ख़ाज़िन). हज़रत आदम की बरकत से ज़मीन के पेड़ों में पाकीज़ा ख़ुश्बू पैदा हुई. (रूहुल बयान)

(14) इससे उम्र का अन्त यानी मौत मुराद है. और हज़रत आदम के लिए बशारत है कि वह दुनिया में सिर्फ़ उतनी मुद्दत के लिये हैं उसके बाद उन्हे जन्नत की तरफ़ लौटना है और आपकी औलाद के लिये मआद (आख़िरत) पर दलालत है कि दुनिया की ज़िन्दगी निश्चित समय तक है. उम्र पूरी होने के बाद उन्हें आख़िरत की तरफ़ पलटना है.

(15) आदम अलैहिस्सलाम ने ज़मीन पर आने के बाद तीन सौ बरस तक हया (लज्जा) से आसमान की तरफ़ सर न उठाया, अगरचे हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम बहुत रोने वाले थे, आपके आंसू तमाम ज़मीन वालों के आँसूओं से ज़्यादा हैं, मगर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम इतना रोए कि आप के आँसू हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम और तमाम ज़मीन वालों के आंसुओं के जोड़ से बढ़ गए (ख़ाज़िन). तिब्रानी, हाकिम, अबूनईम और बैहक़ी ने हज़रत अली मुर्तज़ा (अल्लाह उनसे राज़ी रहे) से मरफ़ूअन रिवायत की है कि जब हज़रत आदम पर इताब हुआ तो आप तौबह की फ़िक़्र में हैरान थे. इस परेशानी के आलम में याद आया कि पैदाइश के वक़्त मैं ने सर उठाकर देखा था कि अर्श पर लिखा है “ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” मैं समझा था कि अल्लाह की बारगाह में वह रूत्बा किसी को हासिल नहीं जो हज़रत मुहम्मद (अल्लाह के दुरूद हों उन पर और सलाम) को हासिल है कि अल्लाह तआला ने उनका नाम अपने पाक नाम के साथ अर्श पर लिखवाया. इसलिये आपने अपनी दुआ में “रब्बना ज़लमना अन्फुसना व इल्लम तग़फ़िर लना व तरहमना लनकूनन्ना मिनल ख़ासिरीन.” यानी ऐ रब हमारे हमने अपना आप बुरा किया तो अगर तू हमें न बख्शे और हम पर रहम न करे तो हम ज़रूर नुक़सान वालों में हुए. (सूरए अअराफ़, आयत 23) के साथ यह अर्ज़ किया “अस अलुका बिहक्क़े मुहम्मदिन अन तग़फ़िर ली” यानी ऐ अल्लाह मैं मुहम्मद के नाम पर तुझसे माफ़ी चाहता हूँ. इब्ने मुन्ज़र की रिवायत में ये कलिमे हैं “अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बिजाहे मुहम्मदिन अब्दुका व करामतुहू अलैका व अन तग़फ़िर ली ख़तीअती” यानी यारब मैं तुझ से तेरे ख़ास बन्दे मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की इज़्ज़त और मर्तबे के तुफ़ैल में, और उस बुज़ुर्गी के सदक़े में, जो उन्हें तेरे दरबार में हासिल है, मग़फ़िरत चाहता हूँ”. यह दुआ करनी थी कि हक़ तआला ने उनकी मग़फ़िरत फ़रमाई. इस रिवायत से साबित है कि अल्लाह के प्यारों के वसीले से दुआ उनके नाम पर, उनके वसीले से कहकर मांगना जायज़ है और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है. अल्लाह तआला पर किसी का हक़ (अधिकार) अनिवार्य नहीं होता लेकिन वह अपने प्यारों को अपने फ़ज़्ल और करम से हक़ देता है. इसी हक़ के वसीले से दुआ की जाती है. सही हदीसों से यह हक़ साबित है जैसे आया “मन आमना बिल्लाहे व रसूलिही व अक़ामस सलाता व सौमा रमदाना काना हक्क़न अलल्लाहे  अैयं यदख़ुलल जन्नता”. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबह दसवीं मुहर्रम को क़ुबुल हुई. जन्नत से निकाले जाने के वक़्त और नेअमतों के साथ अरबी ज़बान भी आप से सल्ब कर ली गई थी उसकी जगह ज़बाने मुबारक पर सुरियानी जारी कर दी गई थी, तौबह क़ुबुल होने के बाद फिर अरबी ज़बान अता हुई.  (फ़तहुल अज़ीज़) तौबह की अस्ल अल्लाह की तरफ़ पलटना है. इसके तीन भाग हैं- एक ऐतिराफ़ यानी अपना गुनाह तस्लीम करना, दूसरे निदामत यानी गुनाह की शर्म, तीसरे कभी गुनाह न करने का एहद. अगर गुनाह तलाफ़ी (प्रायश्चित) के क़ाबिल हो तो उसकी तलाफ़ी भी लाज़िम है. जैसे नमाज़ छोड़ने वाले की तौबह के लिये पिछली नमाज़ों का अदा करना अनिवार्य है. तौबह के बाद हज़रत जिब्रील ने ज़मीन के तमाम जानवरों में हज़रत अलैहिस्सलाम की ख़िलाफ़त का ऐलान किया और सब पर उनकी फ़रमाँबरदारी अनिवार्य होने का हुक्म सुनाया. सबने हुकम मानने का इज़हार किया. ( फ़त्हुल अज़ीज़)

(16) यह ईमान वाले नेक आदमियों के लिये ख़ुशख़बरी है कि न उन्हें बड़े हिसाब के वक़्त ख़ौफ़ हो और न आख़िरत में ग़म. वो बेग़म जन्नत में दाख़िल होंगे.

सूरए बक़रह _ पांचवा रूकू

सूरए बक़रह _ पांचवा रूकू

ऐ याक़ूब की सन्तान (1)
याद करो मेरा वह एहसान जो मैं ने तुम पर किया(2)
और मेरा अहद पूरा करो मैं तुम्हारा अहद पूरा करूंगा(3)
और ख़ास मेरा ही डर रखो(4)
और ईमान लाओ उस पर जो मैं ने उतारा उसकी तस्दीक़ (पुष्टि) करता हुआ जो तुम्हारे साथ है और सबसे पहले उसके मुनकिर यानी इन्कार करने वाले न बनो(5)
और मेरी आयतों के बदले थोड़े दाम न लो(6)
और मुझी से डरो और हक़ (सत्य) से बातिल (झूठ) को न मिलाओ और जान बूझकर हक़ न छुपाओ और नमाज़ क़ायम रखो और ज़कात दो और रूकू करने वालों (झुकने वालों) के साथ रूकू करो (7)
क्या लोगों को भलाई का हुक्म देते हो और अपनी जानों को भूलते हो हालांकि तुम किताब पढ़ते हो तो क्या तुम्हें अक्ल़ नहीं(8)
और सब्र और नमाज़ से मदद चाहो और बेशक नमाज़ ज़रूर भारी है मगर उनपर (नही) जो दिल से मेरी तरफ़ झुकते हैं (9)
जिन्हें यक़ीन है कि उन्हें अपने रब से मिलना है और उसी की तरफ़ फिरना(10) (46)

तफ़सीर : सूरए बक़रह – पाँचवा रूकू

(1) इस्त्राईल यानी अब्दुल्लाह, यह इब्रानी ज़बान का शब्द है. यह हज़रत यअक़ूब अलैहिस्सलाम का लक़ब है. (मदारिक). कल्बी मुफ़स्सिर ने कहा अल्लाह तआला ने “या अय्युहन्नासोअ बुदू” (ऐ लोगो इबादत करो) फ़रमाकर पहले सारे इन्सानों को आम दावत दी, फिर “इज़क़ाला रब्बुका” फ़रमाकर उनके मुब्दअ का ज़िक्र किया. इसके बाद ख़ुसूसियत के साथ बनी इस्त्राईल को दावत दी. ये लोग यहूदी हैं और यहाँ से “सयक़ूल” तक उनसे कलाम जारी है. कभी ईमान की याद दिलाकर दावत की जाती है, कभी डर दिलाया जाता है, कभी हुज्जत (तर्क) क़ायम की जाती है, कभी उनकी बदअमली पर फटकारा जाता है. कभी पिछली मुसीबतों का ज़िक्र किया जाता है.

(2) यह एहसान कि तुम्हारे पूर्वजों को फ़िरऔन से छुटकारा दिलाया, दरिया को फाड़ा, अब्र को सायबान किया. इनके अलावा और एहसानात, जो आगे आते हैं, उन सब को याद करो. और याद करना यह है कि अल्लाह तआला की बन्दगी और फ़रमाँबरदारी करके शुक्र बजा लाओ क्योंकि किसी नेअमत का शुक्र न करना ही उसका  भुलाना है.

(3) यानी तुम ईमान लाकर और फ़रमाँबरदारी करके मेरा एहद पूरा करो, मैं नेक बदला और सवाब देकर तुम्हारा एहद पूरा करूंगा. इस एहद का बयान आयत : “व लक़द अख़ज़ल्लाहो मीसाक़ा बनी इस्त्राईला”यानी और बेशक अल्लाह ने बनी इस्त्राईल से एहद लिया. (सूरए मायदा, आयत 12) में है.

(4) इस आयत में नेअमत का शुक्र करने और एहद पूरा करने के वाजिब होने का बयान है और यह भी कि मूमिन को चाहिये कि अल्लाह के सिवा किसी से न डरे.

(5) यानी क़ुरआने पाक और तौरात और इंजील पर, जो तुम्हारे साथ हैं, ईमान लाओ और किताब वालों में पहले काफ़िर न बनो कि जो तुम्हारे इत्तिबाअ (अनुकरण) में कुफ़्र करे उसका वबाल भी तुम पर हो.

(6) इन आयतों से तौरात व इंजील की वो आयतें मुराद है जिन में हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ और बड़ाई है. मक़सद यह है कि हुज़ूर की नअत या तारीफ़ दुनिया की दौलत के लिये मत छुपाओ कि दुनिया का माल छोटी पूंजी और आख़िरत की नेअमत के मुक़ाबले में बे हक़ीक़त है.
यह आयत कअब बिन अशरफ़ और यहूद के दूसरे रईसों और उलमा के बारे में नाज़िल हुई जो अपनी क़ौम के जाहिलों और कमीनों से टके वुसूल कर लेते और उन पर सालाने मुक़र्रर करते थे और उन्होने फलों और नक़्द माल में अपने हक़ ठहरा लिये थे. उन्हें डर हुआ कि तौरात में जो हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नअत और सिफ़त (प्रशंसा) है, अगर उसको ज़ाहिर करें तो क़ौम हुज़ूर पर ईमान ले जाएगी और उन्हें कोई पूछने वाला न होगा. ये तमाम फ़ायदे और मुनाफ़े जाते रहेंगे. इसलिये उन्होंने अपनी किताबों में बदलाव किया और हुजू़र की पहचान और तारीफ़ को बदल डाला. जब उनसे लोग पूछते कि तौरात में हुज़ूर की क्या विशेषताएं दर्ज हैं तो वो छुपा लेते और हरगिज़ न बताते. इस पर यह आयत उतरी. (ख़ाज़िन वग़ैरह)

(7) इस आयत में नमाज़ और ज़कात के फ़र्ज़ होने का बयान है और इस तरफ़ भी इशारा है कि नमाज़ों को उनके हुक़ूक़ (संस्कारों) के हिसाब से अदा करो. जमाअत (सामूहिक नमाज़) की तर्ग़ीब भी है. हदीस शरीफ़ में है जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ना अकेले पढ़ने से सत्ताईस दर्जे ज़्यादा फ़ज़ीलत (पुण्य) रखता है.

(8) यहूदी उलमा से उनके मुसलमान रिश्तेदारों ने इस्लाम के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा तुम इस दीन पर क़ायम रहो. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का दीन भी सच्चा और कलाम भी सच्चा. इस पर यह आयत उतरी. एक कथन यह है कि आयत उन यहूदियों के बारे में उतरी जिन्होंने अरब मुश्रिको को हुज़ूर के नबी होने की ख़बर दी थी और हुज़ूर का इत्तिबा (अनुकरण) करने की हिदायत की थी. फिर जब हुज़ूर की नबुव्वत ज़ाहिर हो गई तो ये हिदायत करने वाले हसद (ईर्ष्या) से ख़ुद काफ़िर हो गए. इस पर उन्हें फटकारा गया.(ख़ाज़िन व मदारिक)

(9) यानी अपनी ज़रूरतों में सब्र और नमाज़ से मदद चाहों. सुबहान अल्लाह, क्या पाकीज़ा तालीम है. सब्र मुसीबतों का अख़लाक़ी मुक़ाबला है. इन्सान इन्साफ़ और सत्यमार्ग के संकल्प पर इसके बिना क़ायम नहीं रह सकता. सब्र की तीन क़िस्में हैं- (1) तकलीफ़ और मुसीबत पर नफ़्स को रोकना, (2) ताअत (फरमाँबरदारी) और इबादत की मशक़्क़तों में मुस्तक़िल (अडिग) रहना, (3) गुनाहों की तरफ़ खिंचने से तबीअत को रोकना. कुछ मुफ़स्सिरों ने यहां सब्र से रोज़ा मुराद लिया है. वह भी सब्र का एक अन्दाज़ है. इस आयत में मुसीबत के वक़्त नमाज़ के साथ मदद की तालीम भी फ़रमाई क्योंकि वह बदन और नफ़्स की इबादत का संगम है और उसमें अल्लाह की नज़्दीकी हासिल होती है. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अहम कामों के पेश आने पर नमाज़ में मश़्गूल हो जाते थे. इस आयत में यह भी बताया गया कि सच्चे ईमान वालों के सिवा औरों पर नमाज़ भारी पड़ती है.

(10) इसमें ख़ुशख़बरी है कि आख़िरत में मूमिनों को अल्लाह के दीदार की नेअमत मिलेगी.

सूरए बक़रह _ छटा रूकू
ऐ याक़ूब की सन्तान, याद करो मेरा वह अहसान जो मैं ने तुमपर किया और यह कि इस सारे ज़माने पर तुम्हें बड़ाई दी (1)
और डरो उस दिन से जिस दिन कोई जान दूसरे का बदला न हो सकेगी(2)
और न क़ाफिर के लिये कोई सिफ़ारिश मानी जाए और न कुछ लेकर उसकी जान छोड़ी जाए और न उनकी मदद हो(3)
और (याद करो)जब हमने तुमको फ़िरऔन वालों से नजात बख्श़ी (छुटकारा दिलाया)(4)
कि तुमपर बुरा अजा़ब करते थे(5)
तुम्हारे बेटों को ज़िब्ह करते और तुम्हारी बेटियों को ज़िन्दा रखते(6)
और उसमें तुम्हारे रब की तरफ़ से बड़ी बला थी या बड़ा इनाम(7)
और जब हमने तुम्हारे लिये दरिया फ़ाड़ दिया तो तुम्हें बचा लिया. और फ़िरऔन वालों को तुम्हारी आंखों के सामने डुबो दिया(8) 
और जब हमने मूसा से चालीस रात का वादा फ़रमाया फिर उसके पीछे तुमने बछड़े की पूजा शुरू कर दी और तुम ज़ालिम थे (9)
फिर उसके बाद हमने तुम्हें माफ़ी दी(10)
कि कहीं तुम अहसान मानो (11)
और जब हमने मूसा को किताब दी और सत्य और असत्य में पहचान कर देना कि कहीं तुम राह पर आओ और जब मूसा ने अपनी कौ़म से कहा ऐ मेरी कौ़म तुमने बछड़ा बनाकर अपनी जानों पर ज़ुल्म किया तो अपने पैदा करने वाले की तरफ़ लौट आओ तो आपस में एक दूसरे को क़त्ल करो(12)
यह तुम्हारे पैदा करने वाले के नज्द़ीक तुम्हारे लिये बेहतर है तो उसने तुम्हारी तौबह क़ुबूल की, बेशक वही है बहुत तौबह क़ुबूल करने वाला मेहरबान(13)
और जब तुमने कहा ऐ मूसा हम हरगिज़ (कदाचित) तुम्हारा यक़ीन न लाएंगे जब तक खुले बन्दों ख़ुदा को न देख लें तो तुम्हें कड़क ने आ लिया और तुम देख रहे थे फिर मेरे पीछे हमने तुम्हें ज़िन्दा किया कि कहीं तुम एहसान मानो और हमने बादल को तुम्हारा सायबान किया(14)
और तुमपर मत्र और सलवा उतारा, खाओ हमारी दी हुई सुथरी चीज़ें(15)
ओर उन्होंने कुछ हमारा न बिगाड़ा, हां अपनी ही जानों का बिगाड़ करते थे और जब हमने फ़रमाया उस बस्ती में जाओ (16)
फिर उसमें जहां चाहो, बे रोक टोक खाओ और दरवाज़ें में सजदा करते दाख़िल हो(17)
और कहो हमारे गुनाह माफ़ हों हम तुम्हारी ख़ताएं बख्श़ देंगे और क़रीब है कि नेकी वालों को और ज्य़ादा दें(18)
तो ज़ालिमों ने और बात बदल दी जो फ़रमाई गई थी उसके सिवा(19)
तो हमने आसमान से उनपर अज़ाब उतारा(20)
बदला उनकी बे हुकमी का (59)

तफ़सीर : सूरए बक़रह – छटा रूकू

(1) अलआलमीन (सारे ज़माने पर) उसके वास्तविक या हक़ीक़ी मानी में नहीं. इससे मुराद यह है कि मैं ने तुम्हारे पूर्वजों को उनके ज़माने वालों पर बुज़ुर्गी दी. यह बुज़ुर्गी किसी विशेष क्षेत्र में हो सकती है, जो और किसी उम्मत की बुज़ुर्गी को कम नहीं कर सकती. इसलिये उम्मते मुहम्मदिया के बारे में इरशाद हुआ “कुन्तुम खै़रा उम्मतिन” यानी तुम बेहतर हो उन सब उम्मतों में जो लोगों में ज़ाहिर हुई (सूरए आले इमरान, आयत 110). (रूहुल बयान, जुमल वग़ैरह)

(2) वह क़यामत का दिन है. आयत में नफ़्स दो बार आया है, पहले से मूमिन का नफ़्स, दूसरे से काफ़िर मुराद है. (मदारिक)

(3) यहाँ से रूकू के आख़िर तक दस नेअमतों का बयान है जो इन बनी इस्त्राईल के बाप दादा को मिलीं.

(4) क़िब्त और अमालीक़ की क़ौम से जो मिस्त्र का बादशाह हुआ. उस को फ़िरऔन कहते है. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ज़माने के फ़िरऔन का नाम वलीद बिन मुसअब बिन रैयान है. यहां उसी का ज़िक्र है. उसकी उम्र चार सौ बरस से ज़्यादा हुई. आले फ़िरऔन से उसके मानने वाले मुराद है. (जुमल वग़ैरह)

(5) अज़ाब सब बुरे होते हैं “सूअल अज़ाब” वह कहलाएगा जो और अज़ाबों से ज़्यादा सख़्त हो. इसलिये आला हज़रत ने “बुरा अज़ाब” अनुवाद किया. फ़िरऔन ने बनी इस्त्राईल पर बड़ी बेदर्दी से मेहनत व मशक़्क़त के दुश्वार काम लाज़िम किये थे. पत्थरों की चट्टानें काटकर ढोते ढोते उनकी कमरें गर्दनें ज़ख़्मी हो गई थीं. ग़रीबों पर टैक्स मुक़र्रर किये थे जो सूरज डूबने से पहले ज़बरदस्ती वुसूल किये जाते थे. जो नादार किसी दिन टैकस अदा न कर सका, उसके हाथ गर्दन के साथ मिलाकर बांध दिये जाते थे, और महीना भर तक इसी मुसीबत में रखा जाता था, और तरह तरह की सख़्तियां निर्दयता के साथ की जाती थीं. ( ख़ाज़िन वग़ैरह)

(6) फ़िरऔन ने ख़्वाब देखा कि बैतुल मक़दिस की तरफ़ से आग आई उसने मिस्त्र को घेर कर तमाम क़िब्तियों को जला डाला, बनी इस्त्राईल को कुछ हानि न पहुंचाई. इससे उसको बहुत घबराहट हुई. काहिनों (तांत्रिकों) ने ख़्वाब की तअबीर (व्याख्या) में बताया कि बनी इस्त्राईल में एक लड़का पैदा होगा जो तेरी मौत और तेरी सल्तनत के पतन का कारण होगा. यह सुनकर फ़िरऔन ने हुक्म दिया कि बनी इस्त्राईल में जो लड़का पैदा हो. क़त्ल कर दिया जाए. दाइयां छान बीन के लिये मुक़र्रर हुई. बारह हजा़र और दूसरे कथन के अनुसार सत्तर हज़ार लड़के क़त्ल कर डाले गए और नव्वे हज़ार हमल (गर्भ) गिरा दिये गये. अल्लाह की मर्ज़ी से इस क़ौम के बूढ़े जल्द मरने लगे. क़िब्ती क़ौम के सरदारों ने घबराकर फ़िरऔन से शिकायत की कि बनी इस्त्राईल में मौत की गर्मबाज़ारी है इस पर उनके बच्चे भी क़त्ल किये जाते हैं, तो हमें सेवा करने वाले कहां से मिलेंगे. फ़िरऔन ने हुक्म दिया कि एक साल बच्चे क़त्ल किये जाएं और एक साल छोड़े जाएं. तो जो साल छोडने का था उसमें हज़रत हारून पैदा हुए, और क़त्ल के साल हज़रत मूसा की पैदाइशा हुई.

(7) बला इम्तिहान और आज़माइशा को कहते हैं. आज़माइश नेअमत से भी होती है और शिद्दत व मेहनत से भी. नेअमत से बन्दे की शुक्रगुज़ारी, और मेहनत से उसके सब्र (संयम और धैर्य) का हाल ज़ाहिर होता है. अगर “ज़ालिकुम.”(और इसमें) का इशारा फ़िरऔन के मज़ालिम (अत्याचारों) की तरफ़ हो तो बला से मेहनत और मुसीबत मुराद होगी, और अगर इन अत्याचारों से नजात देने की तरफ़ हो, तो नेअमत.

(8) यह दूसरी नेअमत का बयान है जो बनी इस्त्राईल पर फ़रमाई कि उन्हें फ़िरऔन वालों के ज़ुल्म और सितम से नजात दी और फ़िरऔन को उसकी क़ौम समेत उनके सामने डुबो दिया. यहां आले फ़िरऔन (फ़िरऔन वालों) से फ़िरऔन और उसकी क़ौम दोनों मुराद हैं. जैसे कि “कर्रमना बनी आदमा” यानी और बेशक हमने औलादे आदम को इज़्ज़त दी (सूरए इसरा, आयत 70) में हज़रत आदम और उनकी औलाद दोनों शामिल हैं. (जुमल). संक्षिप्त वाक़िआ यह है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के हुक्म से रात में बनी इस्त्राईल को मिस्त्र से लेकर रवाना हुए, सुब्ह को फ़िरऔन उनकी खोज में भारी लश्कर लेकर चला और उन्हें दरिया के किनारे जा लिया. बनी इस्त्राईल ने फ़िरऔन का लश्कर देख़कर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से फ़रियाद की. आपने अल्लाह के हुक्म से दरिया में अपनी लाठी मारी, उसकी बरकत से दरिया में बारह ख़ुश्क रास्ते पैदा हो गए. पानी दीवारों की तरह खड़ा हो गया. उन दीवारों में जाली की तरह रौशनदान बन गए. बनी इस्त्राईल की हर जमाअत इन रास्तों में एक दूसरे को देखती और आपस में बात करती गुज़र गई. फ़िरऔन दरियाई रास्ते देखकर उनमें चल पड़ा. जब उसका सारा लश्कर दरिया के अन्दर आ गया तो दरिया जैसा था वैसा हो गया और तमाम फ़िरऔनी उसमें डूब गए. दरिया की चौड़ाई चार फरसंग थी. ये घटना बेहरे कुलज़म की है जो बेहरे फ़ारस के किनारे पर है, या बेहरे मा-वराए मिस्त्र की, जिसको असाफ़ कहते है. बनी इस्त्राईल दरिया के उस पार फ़िरऔनी लश्कर के डूबने का दृश्य देख रहे थे. यह वाक़िआ दसवीं मुहर्रम को हुआ. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उस दिन शुक्र का रोज़ा रखा. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने तक भी यहूदी इस दिन का रोज़ा रखते थे. हुज़ूर ने भी इस दिन का रोज़ा रखा और फ़रमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की विजय की ख़ुशी मनाने और उसकी शुक्र गुज़ारी करने के हम यहूदियों से ज़्यादा हक़दार हैं. इस से मालूम हुआ कि दसवीं मुहर्रम यानी आशुरा का रोज़ा सुन्नत है. यह भी मालूम हुआ कि नबियों पर जो इनाम अल्लाह का हुआ उसकी यादगार क़ायम करना और शुक्र अदा करना अच्छी बात है. यह भी मालूम हुआ कि ऐसे कामों में दिन का निशिचत किया जाना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सुन्नत है. यह भी मालूम हुआ कि नबियों की यादगार अगर काफ़िर लोग भी क़ायम करते हों जब भी उसको छोड़ा न जाएगा.

(9) फ़िरऔन और उसकी क़ौम के हलाक हो जाने के बाद जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम बनी इस्त्राईल को लेकर मिस्त्र की तरफ़ लौटे और उनकी प्रार्थना पर अल्लाह तआला ने तौरात अता करने का वादा फ़रमाया और इसके लिये मीक़ात निशिचत किया जिसकी मुद्दत बढ़ौतरी समेत एक माह दस दिन थी यानी एक माह ज़िलक़ाद और दस दिन ज़िलहज के. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम क़ौम में अपने भाई हज़रत हारून अलैहिस्सलाम को अपना ख़लीफ़ा व जानशीन (उत्तराधिकारी) बनाकर, तौरात हासिल करने तूर पहाड़ पर तशरीफ़ ले गए, चालीस रात वहां ठहरे. इस अर्से में किसी से बात न की. अल्लाह तआला ने ज़बरजद की तख़्तियों में, आप पर तौरात उतारी. यहां सामरी ने सोने का जवाहरात जड़ा बछड़ा बनाकर क़ौम से कहा कि यह तुम्हारा माबूद है. वो लोग एक माह हज़रत का इन्तिज़ार करके सामरी के बहकाने पर बछड़ा पूजने लगे, सिवाए हज़रत हारून अलैहिस्सलाम और आपके बारह हज़ार साथियों के तमाम बनी इस्त्राईल ने बछड़े को पूजा. (ख़ाज़िन)

(10) माफ़ी की कैफ़ियत (विवरण) यह है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि तौबह की सूरत यह है कि जिन्होंने बछड़े की पूजा नहीं की है, वो पूजा करने वालों को क़त्ल करें और मुजरिम राज़ी ख़ुशी क़त्ल हो जाएं. वो इस पर राज़ी हो गए. सुबह से शाम तक सत्तर हज़ार क़त्ल हो गए तब हज़रत मूसा और हज़रत हारून ने गिड़गिड़ा कर अल्लाह से अर्ज़ की. वही (देववाणी) आई कि जो क़त्ल हो चुके वो शहीद हुए, बाक़ी माफ़ फ़रमाए गए. उनमें के क़ातिल और क़त्ल होने वाले सब जन्नत के हक़दार हैं. शिर्क से मुसलमान मुर्तद (अधर्मी) हो जाता है, मुर्तद की सज़ा क़त्ल है क्योंकि अल्लाह तआला से बग़ावत क़त्ल और रक्तपात से भी सख़्ततर जुर्म है. बछड़ा बनाकर पूजने में बनी इस्त्राईल के कई जुर्म थे. एक मूर्ति बनाना जो हराम है, दूसरे हज़रत हारून यानी एक नबी की नाफ़रमानी, तीसरे बछड़ा पूजकर मुश्रिक (मूर्ति पूजक) हो जाना. यह ज़ुल्म फ़िरऔन वालों के ज़ुल्मों से भी ज़्यादा बुरा है. क्योंकि ये काम उनसे ईमान के बाद सरज़द हुए, इसलिये हक़दार तो इसके थे कि अल्लाह का अज़ाब उन्हें मुहलत न दे, और फ़ौरन हलाकत से कुफ़्र पर उनका अन्त हो जाए लेकिन हज़रत मूसा और हज़रत हारून की बदौलत उन्हें तौबह का मौक़ा दिया गया. यह अल्लाह तआला की बड़ी कृपा है.

(11) इसमें इशारा है कि बनी इस्त्राईल की सलाहियत फ़िरऔन वालों की तरह बातिल नहीं हुई थी और उनकी नस्ल से अच्छे नेक लोग पैदा होने वाले थे. यही हुआ भी, बनी इस्त्राईल में हज़ारों नबी और नेक गुणवान लोग पैदा हुए.

(12) यह क़त्ल उनके कफ़्फ़ारे (प्रायश्चित) के लिये था.

(13) जब बनी इस्त्राईल ने तौबह की और प्रायश्चित में अपनी जानें दे दीं तो अल्लाह तआला ने हुक्म फ़रमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उन्हें बछड़े की पूजा की माफ़ी मांगने के लिये हाज़िर लाएं. हज़रत उनमें से सत्तर आदमी चुनकर तूर पहाड पर ले गए. वो कहने लगे- ऐ मूसा, हम आपका यक़ीन न करेंगे जब तक ख़ुदा को रूबरू न देख लें. इस पर आसमान से एक भयानक आवाज़ आई जिसकी हैबत से वो मर गए. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने गिड़गिड़ाकर अर्ज की कि ऐ मेरे रब, मै बनी इस्त्राईल को क्या जवाब दूंगा. इस पर अल्लाह तआला ने उन्हें एक के बाद एक ज़िन्दा फ़रमाया. इससे नबियों की शान मालूम होती है कि हज़रत मूसा से “लन नूमिना लका” (ऐ मूसा हम हरग़िज तुम्हारा यक़ीन न लाएंगे) कहने की सज़ा में बनी इस्त्राईल हलाक किये गए. हुज़ूर सैयदे आलाम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के एहद वालों को आगाह किया जाता है कि नबियों का निरादर करना अल्लाह के प्रकोप का कारण बनता है, इससे डरते रहें. यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह तआला अपने प्यारों की दुआ से मुर्दे ज़िन्दा फ़रमा देता है.

(14) जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम फ़ारिग़ होकर बनी इस्त्राईल के लश्कर में पहुंचे और आपने उन्हें अल्लाह का हुक्म सुनाया कि मुल्के शाम हज़रत इब्राहीम और उनकी औलाद का मदफ़न (अन्तिम आश्रय स्थल) है, उसी में बैतुल मक़दिस है. उसको अमालिक़ा से आज़ाद कराने के लिए जिहाद करो और मिस्त्र छोड़कर वहीं अपना वतन बनाओं मिस्त्र का छोड़ना बनी इस्त्राईल पर बड़ा भारी था. पहले तो वो काफ़ी आगे पीछे हुए और जब अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म से मजबूर होकर हज़रत हारून और हज़रत मूसा के साथ रवाना हुए तो रास्ते में जो कठिनाई पेश आती, हज़रत मूसा से शिकायत करते. जब उस सहरा (मरूस्थल) में पहुंचे जहां हरियाली थी न छाया, न ग़ल्ला साथ था. वहां धूप की तेज़ी और भूख की शिकायत की. अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा की दुआ से सफ़ेद बादल को उनके सरों पर छा दिया जो दिन भर उनके साथ चलता. रात को उनके लिए प्रकाश का एक सुतून (स्तम्भ) उतरता जिसकी रौशनी में काम करते. उनके कपड़े मैले और पुराने न होते, नाख़ुन और बाल न बढ़ते, उस सफ़र में जो बच्चा पैदा होता उसका लिबास उसके साथ पैदा होता, जितना वह बढ़ता, लिबास भी बढ़ता.

(15) मन्न, तरंजबीन (दलिया) की तरह एक मीठी चीज़ थी, रोज़ाना सुब्ह पौ फटे सूरज निकलने तक हर आदमी के लिये एक साअ के बराबर आसमान से उतरती. लोग उसको चादरों में लेकर दिन भर खाते रहते. सलवा एक छोटी चिड़िया होती है. उसको हवा लाती. ये शिकार करके खाते. दोनों चीज़ें शनिवार को बिल्कुल न आतीं, बाक़ी हर रोज़ पहुंचतीं. शुक्रवार को और दिनों से दुगुनी आतीं. हुक्म यह था कि शुक्रवार को शनिवार के लिये भी ज़रूरत के अनुसार जमा कर लो मगर एक दिन से ज़्यादा का न जमा करो. बनी इस्त्राईल ने इन नेअमतों की नाशुक्री की. भंडार जमा किये, वो सड़ गए और आसमान से उनका उतरना बंद हो गया. यह उन्होंने अपना ही नुक़सान किया कि दुनिया में नेअमत से मेहरूम और आख़िरत में अज़ाब के हक़दार हुए.

(16) “उस बस्ती” से बैतुल मक़दिस मुराद है या अरीहा जो बैतुल मक़दिस से क़रीब है, जिसमें अमालिक़ा आबाद थे और उसको ख़ाली कर गए. वहां ग़ल्ले मेवे की बहुतात थी.

(17) यह दर्वाज़ा उनके लिये काबे के दर्जे का था कि इसमें दाख़िल होना और इसकी तरफ़ सज्दा करना गुनाहों के प्रायश्चित का कारण क़रार दिया गया.

(18) इस आयत से मालूम हुआ कि ज़बान से माफ़ी मांगना और बदन की इबादत सज्दा वग़ैरह तौबह का पूरक है. यह भी मालूम हुआ कि मशहूर गुनाह की तौबह ऐलान के साथ होनी चाहिये. यह भी मालूम हुआ कि पवित्र स्थल जो अल्लाह की रहमत वाले हों, वहाँ तौबह करना और हुक्म बजा लाना नेक फलों और तौबह जल्द क़ुबूल होने का कारण बनता है. (फ़त्हुल अज़ीज़). इसी लिये बुज़ुर्गों का तरीका़ रहा है कि नबियों और वलियों की पैदाइश की जगहों और मज़ारात पर हाज़िर होकर तौबह और अल्लाह की बारगाह में सर झुकाते हैं. उर्स और दर्गाहों पर हाज़िरी में भी यही फ़ायदा समझा जाता है.

(19) बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि बनी इस्त्राईल को हुक्म हुआ था कि दर्वाज़े में सज्दा करते हुए दाख़िल हों और ज़बान से “हित्ततुन” यानी तौबह और माफ़ी का शब्द कहते जाएं. उन्होंने इन दोनों आदेशों के विरूद्ध  किया. दाख़िल तो हुए पर चूतड़ों के बल घिसरते और तौबह के शब्द की जगह मज़ाक के अंदाज़ में “हब्बतुन फ़ी शअरतिन” कहा जिसके मानी हैं बाल में दाना.

(20) यह अज़ाब ताऊन (प्लेग) था जिससे एक घण्टे में चौबीस हज़ार हलाक हो गए. यही हदीस की किताबों में है कि ताऊन पिछली उम्मतों के अज़ाब का शेष हिस्सा हैं. जब तुम्हारे शहर में फैले, वहां से न भागो. दूसरे शहर में हो तो ताऊन वाले शहर में न जाओ. सही हदीस में है कि जो लोग वबा के फैलने के वक़्त अल्लाह की मर्ज़ी पर सर झुकाए सब्र करें तो अगर वो वबा (महामारी) से बच जाएं तो भी उन्हें शहादत का सवाब मिलेगा.

सूरए बक़रह _ सातवां रूकू

सूरए बक़रह _ सातवां रूकू

और जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिये पानी मांगा तो हमने फ़रमाया इस पत्थर पर अपनी लाठी मारो फ़ौरन उस में से बारह चश्में बह निकले(1)
हर समूह ने अपना घाट पहचान लिया, खाओ और पियो ख़ुदा का दिया(2)
और ज़मीन में फ़साद उठाते न फिरो(3)
और जब तुमने कहा ऐ मूसा (4)
हम से तो एक खाने पर(5)
कभी सब्र न होगा तो आप अपने रब से दुआ कीजिये कि ज़मीन की उगाई हुई चीज़ें हमारे लिये निकाले कुछ साग और ककड़ी और गेंहूं और मसूर और प्याज़.

फ़रमाया क्या मामूली चीज़ को बेहतर के बदले मांगते हो(6)
अच्छा मिस्त्र(7)
या किसी शहर में उतरो वहां तुम्हें मिलेगा जो तुमने मांगा(8)
और उनपर मुक़र्रर कर दी गई ख्व़ारी (ज़िल्लत) और नादारी (9)
(या दरिद्रता)  और ख़ुदा के ग़ज़ब में लौटे(10)
ये बदला था उसका कि वो अल्लाह की आयतों का इन्कार करते और नबियों को नाहक़ शहीद करते (11)
ये बदला उनकी नाफ़रमानियों और हद से बढ़ने का (61)

तफ़सीर : सूरए बक़रह – सातवां रूकू

(1) जब बनी इस्त्राईल ने सफ़र में पानी न पाया तो प्यास की तेज़ी की शिकायत की. हज़रत मूसा को हुक्म हुआ कि अपनी लाठी पत्थर पर मारें.  आपके पास एक चौकोर पत्थर था. जब पानी की ज़रूरत होती, आप उस पर अपनी लाठी मारते, उससे बारह चश्मे जारी हो जाते, और सब प्यास बुझाते, यह बड़ा मोजिज़ा (चमत्कार) है. लेकिन नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मुबारक उंगलियों से चश्मे जारी फ़रमाकर एक बड़ी  जमाअत की प्यास और दूसरी ज़रूरतों को पूरा फ़रमाना इससे बहुत बड़ा और उत्तम चमत्कार है. क्योंकि मनुष्य के शरीर के किसी अंग से पानी की धार फूट निकलना पत्थर के मुक़ाबले में ज़्यादा आश्चर्य की बात है. (ख़ाज़िन व मदारिक)

(2) यानी आसमानी खाना मन्न व सलवा खाओ और पत्थर के चश्मों का पानी पियो जो तुम्हें अल्लाह की कृपा से बिना परिश्रम उपलब्ध है.

(3) नेअमतों के ज़िक्र के बाद बनी इस्त्राईल की अयोग्यता, कम हिम्मती और नाफ़रमानी की कुछ घटनाएं बयान की जाती हैं.

(4) बनी इस्त्राईल की यह अदा भी बहुत बेअदबी की थी कि बड़े दर्जे वाले एक नबी को नाम लेकर पुकारा. या नबी, या रसूलल्लाह या और आदर का शब्द न कहा. (फ़त्हुल अज़ीज़). जब नबियों का ख़ाली नाम लेना बेअदबी है तो उनको मामूली आदमी और एलची कहना किस तरह गुस्ताख़ी न होगा.
नबियों के ज़िक्र में ज़रा सी भी बेअदबी नाजायज़ है.

(5) “एक खाने” से एक क़िस्म का खाना मुराद है.

(6) जब वो इस पर भी न माने तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में दुआ की, हुक्म हुआ “इहबितू” (उतरो).

(7) मिस्त्र अरबी में शहर को भी कहते हैं, कोई शहर हो और ख़ास शहर यानी मिस्त्र मूसा अलैहिस्सलाम का नाम भी है. यहां दोनों में से एक मुराद हो सकता है. कुछ का ख़याल है कि यहां ख़ास शहर मुराद नहीं हो सकता. मगर यह ख़याल सही नही है.

(8) यानी साग, ककड़ी वग़ैरह, हालांकि इन चीज़ों की तलब गुनाह न थी लेकिन मन्न व सलवा जैसी बेमेहनत की नेअमत छोड़कर उनकी तरफ़ खिंचना तुच्छ विचार है. हमेशा उन लोगों की तबीयत तुच्छ चीज़ों और बातों की तरफ़ खिंची रही और हज़रत हारून और हज़रत मूसा वग़ैरह बुजुर्गी वाले बलन्द हिम्मत नबियों के बाद बनी इस्त्राईल की बदनसीबी और कमहिम्मती पूरी तरह ज़ाहिर हुई और जालूत के तसल्लुत (अधिपत्य) और बख़्ते नस्सर की घटना के बाद तो वो बहुत ही ज़लील व ख़्वार हो गए. इसका बयान “दुरेबत अलैहिमुज़ ज़िल्लतु” (और उन पर मुकर्रर कर दी गई ख़्वारी और नादारी) (सूरए आले ईमरान, आयत : 112) में है.

(9) यहूद की ज़िल्लत तो यह कि दुनिया में कहीं नाम को उनकी सल्तनत नहीं और नादारी यह कि माल मौजूद होते हुए भी लालच की वजह से मोहताज ही रहते हैं.

(10) नबियों और नेक लोगों की बदौलत जो रूत्बे उन्हें हासिल हुए थे उनसे मेहरूम हो गए. इस प्रकोप का कारण सिर्फ़ यही नहीं कि उन्होंने आसमानी ग़िज़ाओं के बदले ज़मीनी पैदावार की इच्छा की या उसी तरह और ख़ताएं हो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ज़माने में उनसे हुई, बल्कि नबुव्वत के एहद से दूर होने और लम्बा समय गुज़रने से उनकी क्षमताएं बातिल हुई और निहायत बुरे कर्म और बड़े पाप उनसे हुए. ये उनकी ज़िल्लत और ख़्वारी के कारण बने.

(11) जैसा कि उन्होने हज़रत ज़करिया और हज़रत यहया को शहीद किया और ये क़त्ल ऐसे नाहक़ थे जिनकी वजह ख़ुद ये क़ातिल भी नहीं बता सकते.

 

Quran in hindi कुरान इन हिंदी अनुवाद सूरह फातिहा

Quran in hindi कुरान इन हिंदी अनुवाद सूरह फातिहा

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
مَٰلِكِ يَوْمِ ٱلدِّينِ
إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ
ٱهْدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَ
صِرَٰطَ ٱلَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ ٱلْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا ٱلضَّآلِّينَ


बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम


सूरतुल फ़ातिहा
मक्का में उतरी : आयतें सात, रुकु एक, अल्लाह के नाम सेशुरु जो बहुत मेहरबान रहमतवाला
1. सब खू़बियाँ अल्लाह को जो मालिक सारे जहान वालों का
2. बहुत मेहरबान रहमत वाला
3. रोज़े जज़ा (इन्साफ के दिन) का मालिक
4. हम तुझी को पूजें और तुझी से मदद चाहें
5. हमको सीधा रास्ता चला
6. रास्ता उनका जिन पर तूने एहसान किया
7. न उन का जिन पर ग़ज़ब (प्रकोप) हुआ और न बहके हुओं का
तफसीर – सुरतुल फातिहा
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला, अल्लाह की तअरीफ़ और उसके हबीब पर दरुद.
सूरए फातिहा के नाम :
इस सूरत के कई नाम हैं – फा़तिहा, फा़तिहतुल किताब, उम्मुल कु़रआन, सूरतुल कन्ज़, काफि़या, वाफ़िया, शाफ़िया, शिफ़ा, सबए मसानी, नूर, रुकै़या, सूरतुल हम्द, सूरतुल दुआ़ तअलीमुल मसअला, सूरतुल मनाजात सूरतुल तफ़वीद, सूरतुल सवाल, उम्मुल किताब, फा़तिहतुल क़ुरआन, सूरतुस सलात.
इस सूरत में सात आयतें, सत्ताईस कलिमें, एक सौ चालीस अक्षर हैं. कोई आयत नासिख़ या मन्सूख़ नहीं.
शानें नज़ूल यानी किन हालात में उतरी :
ये सूरत मक्कए मुकर्रमा या मदीनए मुनव्वरा या दोनों जगह उतरी. अम्र बिन शर्जील का कहना है कि नबीये करीम (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम – उन पर अल्लाह तआला के दुरुद और सलाम हों) ने हज़रत ख़दीजा(रदियल्लाहो तआला अन्हा – उनसे अल्लाह राज़ी) से फ़रमाया – मैं एक पुकार सुना करता हूँ जिसमें इक़रा यानी ‘पढ़ों’ कहा जाता है. वरक़ा बिन नोफि़ल को खबर दी गई, उन्होंने अर्ज़ किया – जब यह पुकार आए, आप इत्मीनान से सुनें. इसके बाद हज़रत जिब्रील ने खि़दमत में हाजि़र होकर अर्ज़ किया-फरमाइये: बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम. अल्हम्दु लिल्लाहे रब्बिल आलमीन- यानी अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान, रहमत वाला, सब खूबियाँ अल्लाह को जो मालिक सारे जहान वालों का. इससे मालूम होता है कि उतरने के हिसाब से ये पहली सूरत है मगर दूसरी रिवायत से मालूम होता है कि पहले सूरए इक़रा उतरी. इस सूरत में सिखाने के तौर पर बन्दों की ज़बान में कलाम किया गया है.
नमाज़ में इस सूरत का पढ़ना वाजिब यानी ज़रुरी है. इमाम और अकेले नमाज़ी के लिये तो हक़ीक़त में अपनी ज़बान से, और मुक्तदी के लिये इमाम की ज़बान से. सही हदीस में है इमाम का पढ़ना ही उसके पीछे नमाज़ पढ़ने वाले का पढ़ना है. कुरआन शरीफ़ में इमाम के पीछे पढ़ने वाले को ख़ामोश रहने और इमाम जो पढ़े उसे सुनेने का हुक्म दिया गया है. अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे सुनो और खा़मोश रहो. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस है कि जब इमाम क़ुरआन पढ़े, तुम ख़ामोश रहो. और बहुत सी हदीसों में भी इसी तरह की बात कही गई है. जनाजे़ की नमाज़ में दुआ याद न हो तो दुआ की नियत से सूरए फ़ातिहा पढ़ने की इजाज़त है. क़ुरआन पढ़ने की नियत से यह सूरत नहीं पढ़ी जा सकती.Nabi ka ummati par karam
“कुरान इन हिंदी”
सूरतुल फ़ातिहा की खूबियाँ:
हदीस की किताबों में इस सूरत की बहुत सी ख़ूबियाँ बयान की गई है.
हुजू़र सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया तौरात व इंजील व जु़बूर में इस जैसी सूरत नहीं उतरी.(तिरमिज़ी).
एक फ़रिश्ते ने आसमान से उतरकर हुजू़र सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर सलाम अर्ज़ किया और दो ऐसे नूरों की ख़ूशख़बरी सुनाई जो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पहले किसी नबी को नहीं दिये गए. एक सूरए फ़ातिहा दूसरे सुरए बक्र की आख़िरी आयतें.(मुस्लिम शरीफ़)
सूरए फा़तिहा हर बीमारी के लिए दवा है. (दारमी).
सूरए फ़ातिहा सौ बार पढ़ने के बाद जो दुआ मांगी जाए, अल्लाह तआला उसे क़ुबूल फ़रमाता है. (दारमी)
इस्तिआजा: क़ुरआन शरीफ़ पढ़ने से पहले “अऊज़ो बिल्लाहे मिनश शैतानिर रजीम” (अल्लाह की पनाह मांगता हूँ भगाए हुए शैतान से) पढ़ना प्यारे नबी का तरीक़ा यानी सुन्नत है. (ख़ाज़िन) लेकिन शागिर्द अगर उस्ताद से पढ़ता हो तो उसके लिए सुन्नत नहीं है. (शामी) नमाज़ में इमाम और अकेले नमाज़ी के लिये सना यानी सुब्हानकल्लाहुम्मा पढ़ने के बाद आहिस्ता से “अऊज़ो बिल्लाहे मिनश शैतानिर रजीम” पढ़ना सुन्नत हैं.कुरान में अल्लाह के इंसानियत पर 99 सीधे हुक्म.
तस्मियह: बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम क़ुरआने पाक की आयत है मगर सूरए फ़ातिहा या किसी और सूरत का हिस्सा नहीं है, इसीलिये नमाज़ में ज़ोर के साथ् न पढ़ी जाए. बुखारी और मुस्लिम शरीफ़ में लिखा है कि प्यारे नबी हुजू़र सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हज़रत सिद्दीक़ और फ़ारूक़ (अल्लाह उनसे राज़ी) अपनी नमाज़ “अलहम्दोलिल्लाहेरब्बिलआलमीन “यानी सूरए फ़ातिहा की पहली आयत से शुरू करते थे. तरावीह (रमज़ान में रात की ख़ास नमाज़) में जो ख़त्म किया जाता है उसमें कहीं एक बार पूरी बिस्मिल्लाह ज़ोर से ज़रूर पढ़ी जाए ताकि एक आयत बाक़ी न रह जाए.
क़ुरआन शरीफ़ की हर सूरत बिस्मिल्लाह से शुरू की जाए, सिवाय सूरए बराअत या सूरए तौबह के. सूरए नम्ल में सज्दे की आयत के बाद जो बिस्मिल्लाह आई है वह मुस्तक़िल आयत नहीं है बल्कि आयत का टुकड़ा है. इस आयत के साथ ज़रूर पढ़ी जाएगी, आवाज़ से पढ़ी जाने वाली नमाज़ों में आवाज़ के साथ और खा़मोशी से पढ़ी जाने वाली नमाज़ों में ख़ामोशी से. हर अच्छे काम की शुरूआत बिस्मिल्लाह पढ़कर करना अच्छी बात है. बुरे काम पर बिस्मिल्लाह पढ़ना मना है.
“कुरान इन हिंदी”
सूरए फ़ातिहा में क्या क्या है?
इस सूरत में अल्लाह तआला की तारीफ़, उसकी बड़ाई, उसकी रहमत, उसका मालिक होना, उससे इबादत, अच्छाई, हिदायत, हर तरह की मदद तलब करना, दुआ मांगने का तरीक़ा, अच्छे लोगों की तरह रहने और बुरे लोगों से दूर रहने, दुनिया की ज़िन्दगी का ख़ातिमा, अच्छाई और बुराई के हिसाब के दिन का साफ़ साफ़ बयान है.Be namazi ki saza i
हम्द यानि अल्लाह की बड़ाई बयान करना….
हर काम की शुरूआत में बिस्मिल्लाह की तरह अल्लाह की बड़ाई का बयान भी ज़रूरी है. कभी अल्लाह की तारीफ़ और उसकी बड़ाई का बयान अनिवार्य या वाजिब होता है जैसे जुमुए के ख़त्बे में, कभी मुस्तहब यानी अच्छा होता है जैसे निकाह के ख़ुत्बे में या दुआ में या किसी अहम काम में और हर खाने पीने के बाद. कभी सुन्नते मुअक्कदा (यानि नबी का वह तरीक़ा जिसे अपनाने की ताकीद आई हो)जैसे छींक आने के बाद. (तहतावी)
“रब्बिल आलमीन“ (यानि मालकि सारे जहां वालों का)में इस बात की तरफ इशारा है कि सारी कायनात या समस्त सृष्टि अल्लाह की बनाई हुई है और इसमें जो कुछ है वह सब अल्लाह ही की मोहताज है. और अल्लाह तआला हमेशा से है और हमेशा के लिये है, ज़िन्दगी और मौत के जो पैमाने हमने बना रखे हैं, अल्लाह उन सबसे पाक है, वह क़ुदरत वाला है.”रब्बिल आलमीन” के दो शब्दों में अल्लाह से तअल्लुक़ रखने वाली हमारी जानकारी की सारी मन्ज़िलें तय हो गई.
“मालिके यौमिद्दीन” (यानि इन्साफ वाले दिन का मालिक) में यह बता दिया गया कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं है क्योंकि सब उसकी मिल्क में है और जो ममलूक यानी मिल्क में होता है उसे पूजा नहीं जा सकता. इसी से मालूम हुआ कि दुनिया कर्म की धरती है और इसके लिये एक आख़िर यानी अन्त है. दुनिया के खत्म होने के बाद एक दिन जज़ा यानी बदले या हिसाब का है. इससे पुनर्जन्म का सिद्धान्त या नज़रिया ग़लत साबित हो गया.
“इय्याका नअबुदु” (यानि हम तुझी को पूजें) अल्लाह की ज़ात और उसकी खूबियों के बयान के बाद यह फ़रमाना इशारा करता है कि आदमी का अक़ीदा उसके कर्म से उपर है और इबादत या पूजा पाठ का क़ुबूल किया जाना अक़ीदे की अच्छाई पर है. इस आयत में मूर्ति पूजा यानि शिर्क का भी रद है कि अल्लाह तआला के सिवा इबादत किसी के लिये नहीं हो सकती.
“वइय्याका नस्तईन” (यानि और तुझी से मदद चाहें)में यह सिखाया गया कि मदद चाहना, चाहे किसी माध्यम या वास्ते से हो, या फिर सीधे सीधे या डायरैक्ट, हर तरह अल्लाह तआला के साथ ख़ास है. सच्चा मदद करने वाला वही है. बाक़ि मदद के जो ज़रिये या माध्यम है वा सब अल्लाह ही की मदद के प्रतीक या निशान है. बन्दे को चाहिये कि अपने पैदा करने वाले पर नज़र रखे और हर चीज़ में उसी के दस्ते क़ुदरत को काम करता हुआ माने. इससे यह समझना कि अल्लाह के नबियों और वलियों से मदद चाहना शिर्क है, ऐसा समझना ग़लत है क्योंकि जो लोग अल्लाह के क़रीबी और ख़ास बन्दे है उनकी इमदाद दर अस्ल अल्लाह ही की मदद है. अगर इस आयत के वो मानी होते जो वहाबियों ने समझे तो क़ुरआन शरीफ़ में “अईनूनी बि क़ुव्वतिन” और “इस्तईनू बिस सब्रे वसल्लाह” क्यों आता, और हदीसों में अल्लाह वालों से मदद चाहने की तालीम क्यों दी जाती.
“इहदिनस सिरातल मुस्तक़ीम”(यानी हमको सीधा रास्ता चला) इसमें अल्लाह की ज़ात और उसकी ख़ूबियों की पहचान के बाद उसकी इबादत, उसके बाद दुआ की तालीम दी गई है. इससे यह मालूम हुआ कि बन्दे को इबादत के बाद दुआ में लगा रहना चाहिये. हदीस शरीफ़ में भी नमाज़ के बाद दुआ की तालीम दी गई है. (तिबरानी और बेहिक़ी) सिराते मुस्तक़ीम का मतलब इस्लाम या क़ुरआन नबीये करीम (अल्लाह के दुरूद और सलाम उनपर) का रहन सहन या हुज़ूर या हुज़ूर के घर वाले और साथी हैं. इससे साबित होता है कि सिराते मुस्तक़ीम यानी सीधा रास्ता एहले सुन्नत का तरीक़ा है जो नबीये करीम सल्लाहो अलैहे वसल्लम के घराने वालों, उनके साथी और सुन्नत व क़ुरआन और मुस्लिम जगत सबको मानते हैं.

“सिरातल लज़ीना अनअम्ता अलैहिम”(यानी रास्ता उनका जिनपर तुने एहसान किया) यह पहले वाले वाक्य या जुमले की तफ़सील यानी विवरण है कि सिराते मुस्तक़ीम से मुसलमानों का तरीक़ा मुराद है. इससे बहुत सी बातों का हल निकलता है कि जिन बातों पर बुज़ुर्गों ने अमल किया वही सीधा रास्ता की तारीफ़ में आता है.

“गै़रिल मग़दूबे अलैहिम वलद दॉल्लीन “(यानी न उनका जिनपर ग़ज़ब हुआ और न बहके हुओ का) इसमें हिदायत दी गई है कि सच्चाई की तलाश करने वालों को अल्लाह के दुश्मनों से दूर रहना चाहिये और उनके रास्ते, रश्मों और रहन सहन के तरीक़े से परहेज़ रखना ज़रूरी है. हदीस की किताब तिरमिजी़ में आया है कि “मग़दूबे अलैहिम” यहूदियों और “दॉल्लीन” इसाईयों के लिये आया है.

सूरए फ़ातिहा के ख़त्म पर “आमीन” कहना सुन्नत यानी नबी का तरीक़ा है, “आमीन” के मानी है “ऐसा ही कर” या “कु़बूल फ़रमा”. ये क़ुरआन का शब्द नहीं है. सूरए फ़ातिहा नमाज़ में पढ़ी जाने या नमाज़ के अलावा, इसके आख़िर में आमीन कहना सुन्नत है.
हज़रत इमामे अअज़म का मज़हब यह है कि नमाज़ में आमीन आहिस्ता या धीमी आवाज़ में कही जाए.

Eid e Milad Un Nabi 2018

Eid e Milad Un Nabi 2018 Should we rejoice Mawlid
(The Prophet’s “SallalahoAleheWasalam” birthday)?
Yes we need to have a good time it every 12 months
And every month and every week
And every hour and each second.
Dr. `Isa al-Mani` al-Humayri, Department of Awqaaf, Dubai (U.A.E)
Office of Religious Endowments and Islamic Affairs, Dubai Administration of Ifta’ and Research
We locate these days courses packed with lies and deception which lie to many Muslims into thinking negatively about the
honorable Mawlid of the Prophet. These guides claim that to have fun the Mawlid is an act of innovation that goes towards
Islam. This is a long way from the reality, and it is consequently vital for people who can speak really to help clarify and opposite the doubts
surrounding this maximum blessed day. It is with this humble goal that I gift the following proofs in assist of celebrating our
loved Prophet’s birthday.
The Prophet said, “He who innovates some thing on this be counted of ours that isn’t always of it will have it rejected.” He additionally stated, “Beware of
innovations, for each innovation (kul bida`) is misguidance.”
Those opposed to Mawlid cite this pronouncing and keep that the phrase each (kul) is a time period of generalization, which includes all kinds of
innovations, without a exception, and that consequently, celebrating Mawlid is misguidance. By bold to say that, they accuse the students
of Islam of innovation. At the pinnacle of the list of these they have got accused, then, is our Master `Umar (RadiAllahoAnho). Those in competition to Mawlid
quick respond to this, “But we did not mean the Companions of the Prophet Muhammad.”
It follows, then, that the meaning of each (kul) can not be taken in its popular feel. Therefore, even though the Prophet won’t have
said to rejoice his blessed birthday, it is nevertheless no longer innovation to do so. For, as the following examples display, there have been
many actions and practices instituted via his near followers after his time that aren’t deemed innovation.
Compiling the Qu’ran.
(From a Prophetic pronouncing associated through Zaid Ibn Thabit.(RadiAllahoAnho)) “The Prophet died and the Qu’ran had not been compiled anywhere. `Umar
(RadiAllahoAnho) advised to Abu Bakr (RadiAllahoAnho) to collect the Qu’ran in a single e book. When a big range of Companions had been killed within the battle of
Yamama, Abu Bakr wondered, “How could we do something that the Prophet did not do?’ `Umar said, “By Allah, it is ideal.’ `Umar
persisted in asking Abu Bakr till Allah increased his chest for it (Allah made him agree and be given these hints) and he despatched
for Zaid Ibn Thabit and assigned him to bring together the Qu’ran.” Zaid stated, “By Allah in the event that they had asked me to move a mountain, it would
now not were extra hard than to assemble the Qur’an.” He also said, “How may want to you do something that the Prophet did no longer do?”
Abu Bakr said, “It is good, and `Umar kept coming back to me until Allah expanded my chest for the problem.” The pronouncing is narrated
in Sahih Al Bukhari.A Regime for Sleep
The Maqam of Ibrahim (AlehiSalam) in relation to the Ka’ba.
(Al Bayhaqi narrated with a robust chain of narrators from Aisha.) “The Maqam throughout the time of the Prophet and Abu Bakr changed into
attached to the House, then `Umar moved it lower back.” Al Hafiz Ibn Hajar stated in Al Fath, “The Companions did now not oppose `Umar,
neither did folks who got here after them, thus it became unanimous agreement.” He was the first to construct the enclosure (maqsura) on
it, which nonetheless exists nowadays.
Adding the primary name to prayer on Friday.
(From Sahih Al Bukhari, from Al Sa’ib bin Yazid.) “During the time of the Prophet (SallalahoAleheWasalam), Abu Bakr (RadiAllahoAnho) and `Umar (RadiAllahoAnho), the call to Fridaywomen in islam 3 WOMEN AFTER THEARRIVAL OF RASOOLULLAH
prayer used to occur when the Imam sat on the pulpit. When it become Othman’s (RadiAllahoAnho) time, he delivered the 1/3 name (taken into consideration 1/3 in
relation to the first adhan and the iqama. But it is known as first because it proceeds the decision to the Friday prayer.)”
Salutations at the Prophet composed and taught through our Master `Ali (RadiAllahoAnho).
The salutations had been noted by way of Sa’id bin Mansoor and Ibn Jareer in Tahzeeb al Aathar, and by using Ibn Abi Assim and Ya’qoob
bin Shaiba in Akhbar `Ali and by Al Tabarani and others from Salamah Al Kindi.
The addition to the tashahhud by way of Ibn Mas’ud.
After “wa rahmatullahi wa barakatu,” and the Mercy of Allah and Blessings, he used to mention, “assalamu `alayna min Rabbina,” peace
upon us from our Lord. Narrated through Al Tabarani in Al Kabir, and the narrators are the ones of the sound transmitters, because it has been
referred to in Majma’ Al Zawa’id.
The addition to the tashahhud by way of Abdullah Ibn `Umar.
He added the basmalah at the start of the tashahhud. He also introduced to the talbia, “labbaika wa sa’daika wal khayru bi yadayka
wal raghba’u ilayika wal `amalu” This is mentioned in Bukhari, Muslim, et al.
These are a number of the trends instituted with the aid of the Prophet’s Companions, the students, and the honorable members of his
state, which did now not exist for the duration of the time of the Prophet, and which they deemed top. Are they, then, inaccurate and responsible of awful
innovation?
As for the declare that there’s no such issue in religion as appropriate innovation, right here are some sayings of the terrific scholars of Islam
belying this declare.Harut and marut The history and story of Harut Marut
Imam Nawawi said in Sahih Muslim (6-21)
“The Prophet’s saying each innovation is a fashionable-specific and it’s miles a reference to maximum innovations. The linguists say, “Innovation
is any act executed with out a preceding pattern, and it’s far of five specific sorts.’” Imam Nawawi additionally stated in Tahzeeb al Asma’ wal Sifaat,
“Innovation in spiritual regulation is to originate something which did now not exist all through the time of the Prophet, and it is divided into appropriate and
bad.” He also stated, “Al-muhdathat (pl. For muhdatha) is to originate some thing that has no roots in religious regulation. In the tradition of
spiritual law it is referred to as innovation, and if it has an beginning inside the spiritual law, then it isn’t innovation. Innovation in religious regulation
is unpleasant, in contrast to in the language where the whole thing that has been originated with out a previous pattern is called innovation
regardless of whether or not it is right or awful.”
Shaykh Ibn Hajar Al Asqalani, the commentator on Al Bukhari, stated,
“Anything that did not exist throughout the Prophet’s time is known as innovation, however some are right at the same time as others aren’t.”
Abu Na’eem, narrated from Ibrahim Al Junaid, stated, “I heard Ash-Shafi’i saying,
“Innovation is of two types; praiseworthy innovation and blameworthy innovation, and anything that disagrees with the Sunnah is
blameworthy.’”
Imam Albayhaqi narrated in Manaqib Ash-Shafi’i that Ash-Shafi’i stated,
“Innovations are of types: that which contradicts the Qu’ran, the Sunnah, or unanimous agreement of the Muslims is a innovation
of deception, at the same time as a very good innovation does no longer contradict any of these items.”
Al `Izz bin Abdussalam stated, on the cease of his e book, Al Qawa’id,
“Innovation is split into obligatory, forbidden, recommended, unpleasant and permissible, and the manner to know which is which is
to healthy it in opposition to the non secular regulation.”
Clearly we see from the evaluations of these righteous students, that to outline innovations in worship as absolutely bad without
exception is ignorant. For these pious knowers, amongst them Imam Nawawi and Ash-Shafi’i, declared that innovations might be
divided into appropriate and bad, primarily based on their compliance or deviance with non secular regulation.
Moreover, the subsequent Prophetic saying is understood even to not unusual Muslims, not to mention scholars: “He who inaugurates an awesome
exercise (sunnatun hasana) in Islam earns the reward of it, and of all who carry out it after him, without diminishing their personal rewards
in the least.” Therefore it is permissible for a Muslim to originate an excellent exercise, even supposing the Prophet didn’t do it, for the sake of doing
excellent and cultivating the reward. The meaning of inaugurate a good exercise (sanna sunnatun hasana) is to set up a practice
thru non-public reasoning (ijtihad) and derivation (istinbat) from the regulations of spiritual law or its trendy texts. The moves of the
Prophet’s Companions and the generation following them which we’ve got said above is the most powerful evidence.
The ones prejudiced against celebrating the Prophet’s birthday have paved the way for his or her falsehood by using deceiving the less-learned
among the Muslims. The prejudiced ones declare that Ibn Kathir writes in his Al Bidaya wal Nihaya (eleven-172) that the Fatimide-Obaidite
state, which descends from the Jew, Obaidillah Bin Maimoon Al Kaddah, ruler of Egypt from 357-567 A.H., innovated the birthday party
of a number of days, among them, the celebration of the Prophet’s birthday. This treacherous lie is a grave insult to the scholarship
of Ibn Kathir and the scholarship of all Islam. For in reality, Ibn Kathir writes about the Prophet’s birthday in Al bidaya wal nihaya [13136]
“The triumphant king Abu Sa’identification Kawkaburi, turned into one of the generous, distinguished masters, and the superb kings; he left precise
impressions and used to study the honorable Mawlid by using having a awesome birthday party. Moreover, he become chivalrous, courageous, clever, a
student, and just.” Ibn Kathir maintains, “And he used to spend 3 hundred thousand Dinars on the Mawlid.” In guide, Imam Al
Dhahabi writes of Abu Sa’identification Kawkaburi, in Siyar A’laam al nubala’ [22-336] “He became humble, righteous, and loved spiritual learned
guys and students of Prophetic announcing.”
Following are a few sayings of the rightly guided Imams regarding the Mawlid.
Imam Al Suyuti, from Alhawi lil fatawi, wrote a special bankruptcy entitled “The Good Intention in Commemorating the Mawlid,” on the
beginning of which he said,
“There is a question being asked approximately commemorating the Mawlid of the Prophet inside the month of Rabi’ Al Awal: what’s the non secular
prison ruling on this regard, is it excellent or terrible? Does the one who celebrates get rewarded or not?” The answer in step with me is as
follows: To commemorate the Mawlid, which is basically gathering human beings collectively, reciting components of the Qu’ran, narrating testimonies
approximately the Prophet’s start and the signs and symptoms that observed it, then serving food, and afterwards, departing, is one of the top
innovations; and the only who practices it receives rewarded, because it involves venerating the popularity of the Prophet and expressing joy
for his honorable start.
Ibn Taymiyya stated in his e-book Iqtida’ Al Sirat Al Mustaqeem (pg. 266)
“Likewise, what some human beings have innovated, in competition with the Christians in celebrating the birth of Jesus, or out of love and
veneration of the Prophet⦣128;榱uot; and he keeps “⦣128;æ´¨at the predecessors didn’t do, even though there is a motive
for it, and there may be not anything towards it.” This is a pronouncing of someone who set fanaticism apart and sought to thrill Allah and his
Prophet. As far as we are worried, we commemorate the Mawlid for no other cause but what Ibn Taymiya stated, “Out of love and
veneration of the Prophet.” May Allah praise us in step with this love and attempt, and can Allah bless the one who stated, “Let by myself
what the Christians declare approximately their Prophet, and you can reward Muhammad in any way you need and attribute to his essence all
honors and to his repute all greatness, for his merit has no limits that any expression with the aid of any speaker would possibly reach.”
In the equal source formerly noted, Al Suyuti stated,
“Someone asked Ibn Hajar about commemorating the Mawlid. Ibn Hajar responded, “Basically, commemorating the Mawlid is an
innovation that has not been transmitted by using the righteous Muslims of the first three centuries. However, it involves suitable matters and
their opposites, consequently, whoever appears for the coolest and avoids the opposites then it is a great innovation.’ It passed off to me (Al
Suyuti) to trace it to its installed origin, which has been showed in the actual books: Al Sahihain. When the Prophet
arrived in Medina he discovered that the Jews fast the day of Aashura; whilst he inquired about it they stated, “This is the day when Allah
drowned the Pharaoh and saved Moses, consequently we rapid it to expose our gratitude to Allah.’ From this we will finish that thanks
are being given to Allah on a selected day for sending bounty or preventing indignity or damage.” Al Suyuti then commented, “What
bounty is extra than the bounty of the approaching of this Prophet, the Prophet of Mercy, on that day?”
“This is concerning the basis of Mawlid. As for the activities, there ought to be best the things that explicit thankfulness to Allah, such
as what has been formerly referred to: reciting Qu’ran, consuming meals, giving charity, reciting poetry praising the Prophet or on piety
which movements hearts and drives them to do accurate and paintings for the Hereafter.”
These are the derivations that the ones opposed to Mawlid name fake conclusions and invalid analogies.
Imam Mohammed bin Abu Bakr Abdullah Al Qaisi Al Dimashqi.
Jami’ Al Athar fi Mawlid, AlNabiy Al Mukhtar, Al lafz al ra’iq fi Mawlid khayr al khala’iq, and Mawlid al sadi fi Mawlid Al Hadi,
Imam Al `Iraqi.
Al Mawlid al heni fi al Mawlid al sani.
Mulla `Ali Al Qari.
Al Mawlid Al rawi fil Mawlid al Nabawi.
Imam Ibn Dahiya.
Al Tanweer fi Mawlid Al basheer Al Nadheer.
Imam Shamsu Din bin Nasir Al Dimashqi.
Mawlid al Sadi fi Mawlid Al Hadi. He is the only who stated about the Prophet’s estranged uncle, Abu Lahab, “This unbeliever who has
been dispraised, “perish his palms” [111: 1], will live in Hell for all time. Yet, each Monday his torment is being reduced because of his
pleasure on the beginning of the Prophet.” How a whole lot mercy can a servant count on who spends all his existence joyous approximately the Prophet and dies
believing within the Oneness of Allah?
Imam Shamsu Din Ibn Al Jazri.
Al Nashr fil Qira’at Al `Ashr, `Urf Al Ta’reef bil Mawlid al shareef.
Imam Ibn Al Jawzi
Imam Ibn Al Jawzi said approximately the honorable Mawlid, “It is security throughout the year, and happy tidings that every one wishes and desires
can be fulfilled.”
Imam Abu Shama
Imam Abu Shama (Imam Nawawi’s shaykh) in his e-book Al ba’ith ala Inkar Al bida` wal hawadith (pg.23) said, “One of the high-quality
innovations in our time is what is being executed each yr on the Prophet’s birthday, which includes giving charity, doing properly deeds,
displaying ornaments, and expressing pleasure, for that expresses the feelings of love and veneration for him in the hearts of those who
are celebrating, and additionally, suggests thankfulness to Allah for His bounty with the aid of sending His Messenger, the only who has been despatched as a
Mercy to the worlds.”
Imam Al Shihab Al Qastalani
Imam Al Shihab Al Qastalani (Al Bukhari’s commentator) in his ebook Al mawahib Al Ladunniya (1-148) stated, “May Allah have mercy
on the one who turns the nights of the month of the Prophet’s birth into festivities with the intention to lower the struggling of those whose
hearts are filled with sickness and illness.”
There are others who wrote and spoke approximately Mawlid, including Imam Al Sakhawi, Imam Wajihu Din bin `Ali bin al Dayba’ al Shaybani
al Zubaidi, and many more, which we will no longer mention because of the constrained space to be had. From these many evidences, it have to be
clean by way of now that celebrating the Mawlid is incredibly commendable and allowed. Surely we can’t really shrug off as heretics the
students and dignitaries of this kingdom who accredited the commemoration of the Mawlid and wrote infinite books on the challenge.
Are most of these students, to whom the entire world is indebted for the beneficial books they have got written on Prophetic sayings,
jurisprudence, commentaries, and other varieties of information, a number of the indecent who devote sins and evil? Are they, as those
opposed to Mawlid declare, imitating the Christians in celebrating the delivery of Jesus? Are they claiming that the Prophet did no longer convey
to the nation what they ought to do? We depart solutions to those questions as much as you.
And but we should preserve to observe the mistakes which the ones against Mawlid utter. They say “If celebrating the Mawlid is from the
faith, then the Prophet would have made it clear to the kingdom, or could have accomplished it in his lifetime, or it would were done via
the Companions.” No it is easy to say that the Prophet did now not do it out of his humbleness, for this is speakme evil of him, in order that they can not
use this argument.
Furthermore, that the Prophet and his Companions did not do a sure thing does no longer imply they made that aspect prohibited. The
proof is in the Prophet’s saying, “Whoever establishes, in Islam, an amazing exercise…” mentioned earlier. This is the most powerful proof that
gives encouragement to innovate anything practices have foundations in spiritual law, even supposing the Prophet and his Companions did
not do them. Al Shafi’i said, “Anything that has a basis in spiritual law isn’t always an innovation even if the Companions did not do it,
due to the fact their refraining from doing it’d had been for a positive excuse that they had on the time, or they left it for something better, or
perhaps now not they all knew approximately it.” Therefore, whoever prohibits some thing primarily based on the idea that the Prophet did no longer do it, his
claim has no evidence and should be rejected.
Thus we are saying to the rejecters of Mawlid: based on the rule of thumb you have tried to located, that is, that whoever does something that the
Prophet or his Companions did no longer do is committing innovation, it would observe that the Prophet did no longer entire the faith for his
nation, and that the Prophet did not convey to the state what they must do. No one says this or believes this besides a heretic
defecting from the faith of Allah. To the doubters of Mawlid we declare, “Based on what you assert, we convict you.” For you’ve got
innovated in the fundamentals of worship a huge range of things that the Prophet did no longer do⦣128;⦣128; nor did his Companions,
the Generation after the Companions, or the Generation after them. For instance:
• Congregating people behind one Imam to hope Salat al Tahajjud after Salat Al Tarawih, inside the Holy Mosques and other
mosques.
• Reciting the Prayer of Completion of the Qu’ran in Salat al Tarawih and additionally in Salat al Tahajjud.
• Designating the 27th night of Ramadan to complete reading the entire Qu’ran inside the two Holy Mosques.
• A caller saying, after Salat al Tarawih, in the Qiyam prayer, “May Allah praise you.”
• Founding agencies which did no longer exist inside the time of the Prophet, inclusive of Islamic universities, societies for committing
the Qu’ran to memory, and places of work for missionary work, and committees for enjoining correct and forbidding evil. We aren’t
objecting to these things, because they may be forms of true innovation. We simply list these innovations to point out that the ones
who oppose Mawlid actually contradict their very own rule mentioning that some thing that neither the Prophet nor his Companions did
is innovation. And due to the fact they declare that all innovation is bad, they themselves are guilty.
Yet every other declare they make is to mention that folks that commemorate the Mawlid are broadly speaking indecent and immoral. This is a vulgar
declaration and it handiest reflects the character of the one pronouncing it. Are all of the distinguished scholars that we’ve got noted, from the
factor of view of these opposed to Mawlid, indecent and immoral? We won’t be amazed if that is what they agree with. This is a maximum
serious slander. We say, as the poet stated, “When Allah desires to unfold a virtue that has been hidden, He would permit a tongue of an
green with envy individual recognize about it.”
Those against Mawlid, might also Allah manual them, have harassed a few expressions, and claim that some religious scholars
companion companions with Allah. Take as an example the plea of Imam Al Busiery to Prophet Muhammad, “Oh, maximum beneficiant of advent,
I haven’t any one to inn to, shop You, while the prevailing event takes vicinity.” They ought to have a look at cautiously the saying of Imam Al
Busiery: inda hulul il amim, when the prevailing event takes area. What is al Amim? It approach that which prevails over the complete
universe, and all of introduction, in regarding the Day of Judgment. Imam Al Busiery is calling intercession from the Prophet at the Day
of Judgment because on that Day we are able to have no one to motel to, or appeal to. Imam Al Busiery seeks his intercession to Allah
thru the Prophet, for while all other Messengers and Prophets may be pronouncing, “Myself, myself,” the Prophet could be saying, “I am
the one for it, I am for it [the Intercession]” It turns into even more clear now that the doubts of those against Mawlid are
unfounded, just as their costs of associating companions with Allah are unfounded. This is due to their blindness, both bodily and
non secular.
Another comparable example can be located within the well-known announcing transmitted through the prominent Imam Al Kamal bin Al Hammam Al
Hanafi, author of Fath il Qadeer fi manasik al Farisi, and Sharh al Mukhtar min al sada al ahnaf. When Imam Abu Hanifa visited
Medina, he stood in front of the honorable grave of the Prophet and said, “O, maximum honorable of the Two Weighty Ones (humankind
and jinn)! O, treasure of mankind, bathe your generosity upon me and please me with your delight. I am aspiring for your
generosity, and there’s no one for Abu Hanifa inside the international but you.” Again, we need to now not misinterpret this entreaty, but comprehend its true
which means.
Yet some other misconception the ones against Mawlid preserve may be visible of their statements which includes those: “What takes place throughout
Mawlid is mixing among women and men, making a song and gambling musical gadgets, and drinking alcohol.” I myself know this to be
a lie, for I have attended many Mawlids and have not visible any blending, and in no way heard any musical devices. And as for
drunkenness, sure, I even have seen it, but now not that of worldly humans. We located human beings intoxicated with the love of the Prophet, a kingdom
surpassing even the discomfort of dying, which we realize overcame our master Bilal at the time of his demise. In the midst of this candy
stupor he changed into pronouncing, “Tomorrow I shall meet the loved ones, Muhammad and his Companions.”
To maintain, those opposed to Mawlid say, “The day of the Prophet’s birth is the equal day of the week as his death. Therefore, pleasure
on this day isn’t any more appropriate than sorrow, and if faith is consistent with one’s opinion, then nowadays should be a day of
mourning and sorrow.” This sort of lame eloquence, is responded by the Imam Jalal al Din al Suyuti, in Al hawi lil fatawi (pg.193),
“The Prophet’s delivery is the finest bounty, and his loss of life is the best calamity. Religious law urges us to explicit thankfulness for
bounties, and be patient and continue to be calm during calamities. Religious law has commanded us to sacrifice an animal at the delivery of a
child [and distribute the meat to the needy], which is an expression of gratitude and happiness with the new child, even as it did not
command us to sacrifice on the time of demise. Also, it prohibited wailing and showing grief. Therefore, the rules of Divine Law suggest
that it’s far encouraged to expose pleasure at some stage in the month of the Prophet’s beginning, and now not to show sorrow for his demise.”
Furthermore, Ibn Rajab, in his e book Al lata’if, dispraising the rejecters of Mawlid based totally at the above argument, stated, “Some
unique the day of Aashura as a funeral rite for the murder of Al Hussein. But neither Allah nor His Prophet commanded
that the days of the prophets’ first rate trials or deaths ought to be declared days of mourning, let alone people with lesser rank.”
We finish this article with a announcing of the Prophet, which has been narrated with the aid of Abu Ya’l. A., from Hudhaifa and about which Ibn
Kathir said, “It’s chain of transmission is right.” Abu Ya’la stated, “The Prophet has stated, “One of the things that worries me approximately my
kingdom is a man who studied the Qu’ran, and whilst its grace began to reveal on him and he had the advent of a Muslim, he
detached himself from it, and threw it at the back of his lower back, and went after his neighbor with a sword and accused him of associating
companions with Allah.’ I then asked, “Oh, Prophet of Allah, which one is more responsible of associating partners with Allah, the accused or
the accuser?’ The Prophet stated, “It is the accuser.’”
Completed, with all Praises to Allah and salutations and peace be upon our master Holy Prophet Muhammed, his blessed and
purified Family, Progeny and loyal Companions.istagfar dua in English with hadise nabawi

Arabic Books on the Justification of eide Milad

Arabic Books on the Justification of eide Miladالمؤلفات في المولد النبوي الشريف
1. الأحدب الطرابلسي: إبراهيم بن السيد علي الطرابلسي الحنفي نزيل بيروت توفي برجب سنة 1308 ثمان وثلاثمائة وألف. منظومة في مولد النبي صلى الله عليه وسلم.
2. الغرناطي: أحمد بن علي بن سعيد الغرناطي الأندلسي المالكي المتوفى سنة 673 ثلاث وسبعين وستمائة صنف تاريخ غرناطة. ظل الغمامة في مولد سيد تهامة.
3. ابن حجر الهيتمي: أحمد بن محمد بن محمد بن علي بن حجر الهيتمي شهاب الدين المكي الشافعي ولد سنة 899 وتوفي سنة 974 تحرير الكلام في القيام عن ذكر مولد سيد الأنام
four. السيواسي: أحمد بن محمد بن عارف شمس الدين أبو الثناء الزيلي الرومي السيواسي الحنفي الصوفي المتوفى سنة 1006 ست وألف مولد النبي صلى الله عليه وسلم.
Five. أحمد الآمدي: أحمد بن عثمان الديار بكري الآمدي الحنفي الشاعر المتخلص بأحمدي ولد سنة 1100 وتوفي سنة 1174 أربع وسبعين ومائة وألف له مولد النبي صلى الله عليه وسلم.
6. المرزوقي: السيد أحمد بن محمد بن رمضان أبو الفوز المدرس في الحرم المكي له بلوغ المرام لبيان ألفاظ مولد سيد الأنام في شرح مولد أحمد البخاري فرغ منها سنة 1281.
7. الحبيشي: أبو بكر بن محمد بن أبي بكر الحبيشي الأصل الحلبي المنشأ والوفاة تقي الدين الشافعي بسطامي الطريقة توفي سنة 930 الكواكب الدرية في مولد خير البرية.
Eight. البرزنجي: لسيد جعفر بن إسماعيل بن زين العابدين ابن محمد البرزنجي الحسيني مفتي الشافعية بالمدينة المنورة توفي بها سنة 1317 سبع عشرة وثلاثمائة وألف. من تصانيفه الكوكب الأنور على عقد الجوهر في مولد النبي الأزهر صلى الله عليه وسلم.
Nine. خليل بن كيكلدي بن عبد الله لاعلائي أبو سعيد الدمشقي الشافعي مدرس الصلاحية بالقدس ولد سنة 694 وتوفي سنة 761 إحدى وستين وسبعمائة له من التصانيف: الدرة السنية في مولد خير البرية.
10. الراوندي: أبو الحسن سعيد بن هبة الله بن الحسن الراوندي الشيعي قطب الدين المتوفى سنة 673 ثلاث وسبعين وخمسمائة. له من التصانيف: جني الحنتين في مولد العسكرين.
Eleven. البروسوي: سليمان بن عوض باشا بن محمود البرسوي الحنفي كان إماماً في دائرة السلطان بايزيد العثماني توفي في حدود سنة 780 ثمانين وسبعمائة. له مولد النبي صلى الله عليه وسلم.
12. سليمان بن عبد الرحمن بن صالح الرومي الكاتب أحد رجال الدولة المتخلص بنحيفي توفي سنة 1151 إحدى وخمسين ومائة وألف. من تصانيفه: مولد النبي صلى الله عليه وسلم منظومة تركية.
Thirteen. يوسف زاده الرومي: عبد الله حلمي بن محمد بن يوسف ابن عبد المنان الرومي الحنفي المقري المحدث المعروف بيوسف زاده شيخ القراء. ولد بأماسية سنة 1085 وتوفي سنة 1167. له منن التصانيف: الكلام السني المصفى في مولد المصطفى.
14. بدائي الكاشغري: عبد اله بن محمد الكاشغري المتخلص بندائي النقشبندي الزاهدي نزيل قسطنطينية يدرس بها ويعلم الطريقة النقشبندية توفي في صفر من سنة 1174 أربع وسبعين ومائة وألف. له مولد النبي صلى الله عليه وسلم.
15. سويدان: عبد الله بن علي بن عبد الرحمن الدمليجي الضرير المصري الشاذلي النحوي الشافعي المعروف بسويدان توفي سنة 1234 أربع وثلاثين ومائتين وألف صنف: مطالع الأنوار في مولد النبي المختار صلى الله عليه وسلم.
16. النحراوي: عبد الرحمن بن محمد النحراوي المصري الشهير بالمقري المتوفى سنة 1210 عشر ومائتين وألف. له حاشية على قصة المعراج للمدابغي. حاشية على مولد النبي للمدابغي.
17. لدمشقي: عبد الفتاح بن عبد القادر بن صالح الدمشقي أبو الفتح الخطيب الشافعي ولد سنة 1250 بدمشق وتوفي بها في محرم من سنة 1305 خمس وثلاثمائة وألف له من التصانيف: سرور الأبرار في مولد النبي المختار صلى الله عليه وسلم.
18. العيدروسي: محيي الدين عبد القادر بن شيخ ابن عبد الله بن شيخ بن عبد الله العيدروسي أبو بكر اليمني الحضرمي ثم الهندي ولد سنة 987 وتوفي سنة 1038. من تصانيفه: المنتخب المصفي في أخبار مولد المصطفى.
19. أشرف زاده البرسوي: عبد القادر نجيب الدين ابن الشيخ عز الدين أحمد المعروف بأشرف زاده البرسوي الحنفي المتخلص بسري شيخ زاوية القادرية بأزنيق المتوفى سنة 1202 من تصانيفه: مولد النبي صلى الله عليه وسلم منظومة تركية.
20. الأدرنةوي: الشيخ عبد الكريم الأدرنة وي الخلوتي المتوفى سنة 965. خمسو ستين وتسعمائة له مولد النبي صلى الله عليه وسلم منظوم تركي.
21. المرداوي: علي بن سليمان بن أحمد بن محمد المرداوي علاء الدين أبو الحسن المقدسي شيخ الحنابلة بدمشق المتوفى سنة 885 خمس وثمانين وثمانمائة له: المنهل العذب القرير في مولد الهادي البشير النذير صلى الله عليه وسلم.
22. النبتيني: علي بن عبد القادر النبتيني ثم المصري الحنفي الموقت بجامع الأزهر بالقاهرة المتوفى سنة 1061 إحدى وستين وألف من تصانيفه: شرح على مولد النجم الغيطي.
23. البرزنجي: السيد علي بن حسن البرزنجي المدني الشافعي. له: نظم مولد النبي صلى الله عليه وسلم لأخيه جعفر البرزنجي توفي في أواخر القرن الثاني عشر.
24. ابن صلاح الأمير: السيد علي بن إبراهيم بن محمد بن إسماعيل بن صلاح الأمير الصنعاني الأديب الزيدي ولد سنة 1171 وتوفي في حدود سنة 1236 ست وثلاثين ومائتين وألف. له تأنيس أرباب الصفا في مولد المصطفى .
25. باعلوي: عمر بن عبد الرحمن بن محمد بن علي بن محمد بن احمد باعلوي الحضرمي صاحب الحر؟ المتوفى سنة 889 تسع وثمانين وثمانمائة له: كتاب مولد النبي صلى الله عليه وسلم.
26. الجزائري: محمد بن عبد الله بن محمد بن محمد بن أحمد ابن أبي بكر العطار الجزائري المتوفى سنة 707 سبع وسبعمائة له المورد العذب المعين في مولد سيد الخلق أجمعين. نظم الدرر في مدح سيد البشر صلى الله عليه وسلم.
27. الكازروني: محمد بن مسعود بن محمد سعيد الدين الكازروني المتوفى سنة 758 ثمان وخمسين وسبعمائة من تصانيفه: مناسك الحجز المنتقى من سير مولد النبي المصطفى صلى الله عليه وسلم فارسي.Hazrat umar farooq History and biography
28. ابن عباد الرندي: محمد بن إبراهيم بن أبي بكر عبد الله بن مالك بن عباد التعزي نسبا والزندي بلدا أبو عبد الله المالكي الصوفي الشهير بابن عباد ولد سنة 733 وتوفي سنة 792 اثنتين وتسعين وسبعمائة له: مولد النبي صلى الله عليه وسلم.
29. لفيروز آبادي: محمد بن يعقوب بن محمد بن يعقوب بن إبراهيم الفيروز آبادي مجد الدين أبو طاهر الشيرازي ولد بكازرون سنة 729 وتوفي قاضيا بزبيد اليمن سنة 817 سبع عشرة وثمانمائة. صنف من الكتب: النفحة العنبرية في مولد خير البرية صلى الله عليه وسلم.
30. ابن ناصر الدين: محمد ن أبي بكر عبد الله بن محمد الحافظ شمس الدين القيس الشافعي الشهير بابن ناصر الدين الدمشقي ولد سنة 777 وتوفي سنة 842 اثنتين وأربعين وثمانمائة. له من التصانيف: جامع الآثار في مولد المختار، اللفظ الرائق في مولد خير الخلائق، المورد الصادي في مولد الهادي، الجامع المختار في مولد المختار في ثلاث مجلدات.
31. التبريزي: محمد بن السيد محمد بن عبد الله الحسيني التبريزي عفيف الدين الشافعي نزيل المدينة المنورة المتوفى بها سنة 855 خمس وخمسين ثمانمائة. له: مولد النبي صلى الله عليه وسلم.
32. اللؤلؤ ابن الفخر: محمد بن فخر الدين عثمان اللؤلؤي شمس الدين أبو القاسم الدمشقي الكتبي الحنبلي المتوفى سنة 867 سبع وثمانمائة. من تصانيفه: الدر المنظم في مولد النبي المعظم، اللفظ الجميل في مولد النبي الجليل.
33. السخاوي: محمد بن عبد الرحمن بن محمد بن أبي بكر بن عثمان الحافظ شمس الدين أبو الخير السخاوي المصري الشافعي ولد سنة 830 وتوفي مجاورا بالمدينة المنورة سنة 902 اثنتين وتسعمائة. له من التصانيف: الفرخ العلوي في المولد النبوي.
34. ملا عرب الواعظ: اصله من ما وراء النهر ولد بأنطاكية دار البلاد وأسطوطن في بروسة إلى أن مات بها سنة 938 ثمان وثلاثين وتسعمائة. له من التصانيف: مولد النبي صلى الله عليه وسلم .
35. ابن علان المكي: محمد علي بن محمد علان بن إبراهيم بن محمد بن علان بن عبد الملك بن علي بن مباركشاه البكري الصديقي المكي الشافعي ولد بمكة سنة 996 وتوفي بها سنة 1057مورد الصفا في مولد المصطفى صلى الله عليه وسلم .
36. نصوحي الرومي: الشيخ محمد بن نصوح الأسكداري الخلوتي من أحفاد الشيخ شعبان القسطموني الشهير بنصوحي المتوفى في رمضان من سنة 1130 ثلاثين ومائة وألف. له: الجمع الزاهر المنير في ذكر مولد البشير النذير.
37. ابن عقيلة: محمد بن أحمد بن سعيد بن مسعود جمال الدين أبو عبد الله المكي الشهير بابن عقيلة الملقب بالظاهر المتوفى 1150 خمسين ومائة وألف. من تصانيفه: مولد النبي صلى الله عليه وسلم .
38. الخياط: محمد بن محمد المنصوري الشافعي الشهير بالخياط صنف اقتناص الشوارد من موارد الموارد في شرح مولد ابن حجر الهيتمي. فرغ منها سنة 1166 ست وستين ومائة وألف.
39. السيد محمد بن حسين المدني الشريف العلوي الحنفي الشهير بالجفري ولد سنة 1149 وتوفي سنة 1186 ست وثمانين ومائة وألف. له من التصانيف: مولد النبي صلى الله عليه وسلم .
Forty. العدوي: محمد بن عبادة بن بري الصوفي المالكي المعروف بالعدوي نزيل مصر المتوفى سنة 1193 ثلاث وتسعين ومائة وألف. له: حاشية على مولد النبي صلى الله عليه وسلم لابن حجر والغيطي والهدهدي.
41. الشنواني: محمد بن علي المصري الأزهري الشافعي المعروف بالشنواني المتوفى سنة 1233 ثلاث وثلاثين ومائتين وألف. له الجواهر السنية في مولد خير البرية صلى الله عليه وسلم.
42. الشيخ العارف بالله محمد بن مصطفى بن أحمد الحسيني البرزنجي الشافعي القادري الشهير بمعروف ولد بقرية نوده من قرى السليمانية وتوفي بها سنة 1254 أربع وخمسين ومائتين وألف. قبره مشهور يزار ويتبرك. من تصانيفه: تنوير العقول في أحاديث مولد الرسول.
Forty three. أبو عبد الله محمد بن أحمد بن محمد بن عليش ” بضم العين المهملة فتح اللام وسكون الباء المثناة والشين المعجمة ” مغربي الأصل مصري المنشأ مفتي المالكية بها الشهير بعليش ولد بمصر سنة 1217 وتوفي سنة 1299 تسع وستعين ومائتين وألف من مصنفاته: القول المنجي على مولد البرزنجي.
44. أبو المحاسن السيد محمد بن خليل بن إبراهيم بن محمد بن علي بن محمد الطرابلسي ” طرابلس الشام ” الحنيف الفقيه الزاهد الشهير بالقاوقجي لأن أحد أجداده صنع قاؤقا وأهداه إلى السلطان مصطفى خان العثماني واشتهر أعقابه بهذه النسبة ولد سنة 1222 وتوفي في ذي الحجة سنة 1305 خمس وثلاثمائة وألف. صنف من الكتب: مولد النبي صلى الله عليه وسلم .
Forty five. محمد بن عبد القادر بن محمد صالح الخطيب أبو الفرح الدمشقي الشافعي المنعوت بهبة الله المقيم في مدرسة النورية ويدرس بها سنة 1244 وتوفي سنة 1311 إحدى عشرة وثلاثمائة وألف. من تأليفه: مولد النبي صلى الله عليه وسلم
46. محمد نوير بن عمر بن عربي بن علي النووي أبو عبد المعطي الجاوي الفقيه نزيل مصر ثم انتقل إلى مكة المكرمة وتوفي بها سنة 1315 خمس عشرة وثلاثمائة وألف من تصانيفه الإبريز الداني في مولد سيدنا محمد صلى الله عليع وسلم. بغية العوام في شرح مولد سيد الأنام عليه الصلاة والسلام لابن الجوزي.
47. محمد فوزي بن عبد الله الرومي الشهير بمفتي أدرنة من قضاة عسكر روم أيلي توفي سنة 1318 ثمان عشرة وثلاثمائة وألف. له من التأليف إثبات المحسنات في تلاوة مولد سيد السادات.
48. السيد محمود بن عبد المحسن الحسيني القادري الأشعري الشافعي مدني الأصل الدمشقي المعروف بابن الموقع مدرس البادرانية بالشام ولد سنة 1253 وتوفي سنة 1321 إحدى وعشرين وثلاثمائة وألف له من الكتب: حصول الفرج وحلول الفرح في مولد من أنزل عليه ألم نشرح.
Forty nine. سلامي الأزميري: مصطفى بن إسماعيل شرحي الأزميري المتخلص بسلامي نزيل قسطنطينية المتوفى بها سنة 1228 ثمان وعشرين ومائتين وألف. له منظومة في مولد النبي صلى الله عليه وسلم.
50. اقتناص الشوارد من موارد الموارد – في شرح مولد الهيتمى تأليف محمد بن محمد المنصوري الشافعي الشهير بالخياط فرغ منها سنة 1166 ست وستين ومائة وألف.
51. بغية العوام في شرح مولد سيد الأنام المنسوبة لابن الجرزى – تأليف محمد نوري ابن عمر بن عربي النووي الجاوى نزيل مصر صاحب الابريز الدانى.
Fifty two. بلوغ المرام لبيان الفاظ مولد سيد الأنام – للسيد احمد المرزوقى المدرس المكى فرغ منها سنة 1281.
Fifty three. تحفة البشر على مولد ابن حجر – للشيخ إبراهيم ابن محمد الباجورى الشافعي المصرى المتوفى سنة 1276 ست وسبعين ومائتين وألف.
Fifty four. تحفة العاشقين وهدية المعشوقين في شرح تحفة المؤمنين في مولد النبي الأمين – صلى الله عليه وسلم تأليف السيد محمد راسم بن على رضا بن سليمان الملاطيه وى الحنفي المولوي المتوفى سنة 1316 ست عشرة وثلاثمائة وألف.
Fifty five. الجمع الزاهر المنير في ذكر مولد البشير النذير – لزين العابدين محمد العباسي الخليفتى .
Fifty six. الدر المنظم شرح الكنز المطلسم في مولد النبي المعظم – لأبي شاكر عبد الله شلبي فرغ من كتابته سنة 1177 سبع وسبعين ومائة وألف.
57. الدر المنظم في مولد النبي الأعظم – لأبي العباس احمد ابن معد بن عيسى الاقليشى الأندلسي المتوفى سنة 550 خمسين وخمسمائة رتبه على عشرة فصول أولها الحمد لله المحمود بكل لسان الخ.
58. الدر النظيم في مولد النبي الكريم – للإمام سيف الدين أبى جعفر عمر بن أيوب بن عمر الحميرى التركماني الدمشقي الحنفي المحدث المعروف بابن طغرو بك .
Fifty nine. عنوان إحراز المزية في مولد النبي خير البرية صلى الله عليه وسلم لأبي هاشم محمد شريف النوري.
60. المنتخب المصفى في أخبار مولد المصطفى صلى الله عليه وسلم – للشيخ عبد القادر العيدروسي.
61. المنهل العذب القرير في مولد الهادى البشير النذير صلى الله عليه وسلم – لابي الحسن المرداوى على ابن سليمان بن احمد المقدسي الحنبلى المتوفى سنة 885 خمس وثمانين وثمانمائة.
Sixty two. مورد الصفا في مولد المصطفى صلى الله عليه وسلم – لابن علان محمد على الصديقى المكى.
Sixty three. مولد النبي صلى الله عليه وسلم – للسيد محمد بن خليل الطرابلسي المعروف بالقاوقجى.
64. مولد النبي صلى الله عليه وسلم – رسالة لمؤلف المعراج اولها الحمدلله الذى افاض من فيض فضله الممدود الخ في كراريس.
Sixty five. الورد العذب المبين في مولد سيد الخلق اجمعين – لابي عبدالله محمد بن احمد بن محمد العطار الجزائري ص.
Sixty six. هاشم القادري الحسني الفاسي، جده هو محمد بن عبد الحفيظ الراوي عن الحافظ مرتضى والعربي بن المعطي ” دلائل الخيرات ” وعنه عبد القادر الكوهن والطالب بن الحاج وإبراهيم بن محمد الصقلي، وحفيده المترجم كان من أعيان علماء فاس وأكثرهم تلماذا وإقبالا، كثير التنزل مع الطلبة لا يستنكف من مراجعتهم له وبحثهم معه، له مولد نبوي.
Sixty seven. يوسف بن إسماعيل النبهاني صاحب التصانيف الشهيرة المولود سنة 1266، له النظم البديع في مولد الشفيع.
Sixty eight. الحافظ أحمد بن حجر العسقلاني له: تحفة الأخبار في مولد المختار (مطبعة الدومانية بدمشق 1283هـ) .
Sixty nine. احمد النجاري (الشيخ) احمد بن احمد النجاري الدمياطي الحفناوي الشافعي الخلوتي المصيلحي العطية المحمدية في قصة خير البرية.
70. (الشيخ) ابراهيم بن محمد بن احمد الباجوري الشافعي (1198 – 1277)ولد في الباجور قرية بمديرية المنوفية (مصر) ونشأ في حجر والده وقرأ عليه القرآن المجيد وقدم الازهر لطلب العلم به سنة 1212هـ ومكث فيه إلى أن دخل الفرنسيون سنة 1213هـ فخرج إلى الجيزة وأقام بها مدة، ثم رجع إلى الازهر وأخذ بالاشتغال في العلم وقد أدرك الجهابذة الأفاضل كالشيخ محمد الأمير الكبير والشيخ عبد الله الشرقاوي وغيرهما، وفي مدة قريبة ظهرت عليه آية النجابة فدرس وألف التآليف العديدة وانتهت إليه الرئاسة في الجامع الازهر وتقلدها سنة 1263 وكان لسانه رطبا بتلاوة القرآن العظيم، من مصنفاته: حاشية على مولد الشيخ احمد الدردير المطبعة الخيرية 1304هـ .
71. جعفر بن اسماعيل بن زين العابدين بن محمد الهادي بن زين بن السيد جعفر مؤلف مولد النبي صلى الله عليه وسلم، له من التصانيف: الكوكب الأنور على عقد الجوهر في مولد النبي الأزهر وهو شرح على مولد النبي للسيد جعفر بن حسن البرزنجي بهامشه القبول المنجي وهو حاشية الشيخ عليش على مولد البرزنجي مطبعة الميمنية 1310هـ .
72. زين العابدين جعفر بن حسن بن عبد الكريم الشهير بالمظلوم ابن السيد محمد المدني بن عبد الرسول البرزنجي الشافعي الشيخ الفاضل العالم البارع مفتي السادة الشافعية بالمدينة النبوية، ولد ونشأ نشأة صالحة وبرع في الخطب والترسل وصار إماما وخطيبا ومدرساً بالمسجد النبوي، وألف مؤلفات نافعة وانشاآت رائعة منها: مولد النبي صلى الله عليه وسلم المعروف بمولد البرزنجي.
73. (الشيخ) فتح الله البناني المغربي الشاذلي له: فتح الله في مولد خير خلق الله .
Seventy four. بلوغ المرام لبيان ألفاظ مولد سيد الأنام للشيخ أبي الفوز احمد المرزوقي) .
75. (الشيخ) شهاب الدين احمد بن احمد اسمعيل الحلواني الخليجي (نسبة إلى رأس الخليخ قرب دمياط) الشافعي المتوفى ببلده يوم عرفة سنة 1308هـ العلم الأحمدي في المولد المحمدي أوله الحمد لله والصلاة والسلام على سيدنا رسول الله.
Seventy six. (الشيخ) رضوان العدل بيبرس من أبناء القرن الرابع عشر للهجرة ، خلاصة الكلام في مولد المصطفى عليه الصلاة والسلام طبع مطبعة بولاق 1313هـ يقع في 64 صفحة.
77. عطيه بن إبراهيم الشيباني له نظم أسماه مولد المصطفى العدناني مطبعة العلمية 1311هـ في 36صفحة .
Seventy eight. (الشيخ) مصطفى بن محمد العفيفي الشافعي (من أبناء أوائل القرن الثالث عشر للهجرة) له: فتح اللطيف شرح نظم المولد الشريف – وهو شرح على مولد البرزنجي ، طبع بولاق 1293هـ .
Seventy nine. المنظر البهي في مطلع مولد النبي للشيخ محمد الهجرسي .
Eighty. (الشيخ) أبو الفوز احمد المرزوقي المالكي ابن محمد رمضان الحسيني نزيل مكه ، له: بلوغ المرام لبيان الفاظ مولد سيد الانام – وهو شرح على مولد الشيخ احمد بن قاسم المالكي الشهير بالحريري طبع مطبعة بولاق 1286 و 1291 يقع في 200صفحة.
Eighty one. (الشيخ) عبد الله بن محمد المناوي الاحمدي الشاذلي مولد النبي (أو) المولد الجليل حسن الشكل الجميل طبع مطبعة بولاق 1300هـ 60 صفحة. (الشيخ) محمد بن حسن بن محمد بن احمد جمال الدين بن بدر الدين الشافعي الاحمدي ثم الخلوتي السمنودي الازهرى المعروف بالمنير ولد بسمنود وحفظ القرآن وبعض المتون وقدم الجامع الازهر وعمره عشرون سنة وأخذ على مشايخ عصره واجتمع بالسيد مصطفى البكري فلقنه طريقة الخلوتية وانضوى إلى الشيخ شمس الدين محمد الحفنى، ثم كف بصره وانقطع إلى الذكر والتدريس في منزله بالقرب من قنطرة الموسكي ولازم الصوم نحو ستين عاما ووفدت عليه الناس من كل جهة إلى أن وافاه الأجل المحتوم وجهز وكفن وصلى عليه بالأزهر في مشهد حافل وأعيد إلى الزاوية الملاصقة لمنزله ، له الدر الثمين في مولد سيد الأولين والآخرين.
Eighty two. (الشيخ) أبو عبد المعطي محمد بن عمر بن عربي بن علي نووي الجاوي البنتني اقليما التناوي بلدا (أحد علماء القرن الرابع عشر للهجرة) 1 – الابريز الداني في مولد سيدنا محمد السيد العدناني – طبع حجر مصر 1299هـ .
83. الأنوار ومفتاح السرور والأفكار في مولد النبي المختار لأبي الحسن : أحمد بن عبد الله البكري وهو : كتاب جامع مفيد في مجلد أوله : ( الحمد لله الذي خلق روح حبيبه . . . الخ ) جمعها : لتقرأ في شهر ربيع الأول وجعلها : سبعة أجزاء .
Eighty four. التنوير في مولد السراج المنير لأبي الخطاب : عمر بن الحسن المعروف : بابن دحية الكلبي المتوفى : سنة ، ثلاث وثلاثين وستمائة ألف بإربل سنة 604 ، أربع وستمائة وهو متوجه إلى خراسان بالتماس الملك المعظم الأيوبي وقد قرأه عليه بنفسه وأجازه بألف دينار غير ما أجرى عليه مدة إقامته.
85. الدر المنظم في مولد النبي المعظم لأبي القاسم : محمد بن عثمان اللؤلؤي الدمشقي المتوفى : سنة 867 هـ ثم اختصره وسماه : ( اللفظ الجميل بمولد النبي الجليل )
86. الدرة السنية في مولد خير البرية للحافظ صلاح الدين : خليل بن كيكلدي العلائي
87. طل الغمامة في مولد سيد تهامة لأحمد بن علي بن سعيد أوله : ( الحمد لله الذي أبرز من غرة عروس الحضرة . . . الخ )
88. حسن المقصد في عمل المولد للحافظ جلال الدين السيوطي رحمه الله
89. الكواكب الدرية في مولد خير البرية لأبي بكر بن محمد الحبشي البسطامي أوله : (الحمد لله الذي صور الآدمي).
90. المولد النبوي الشريف للشيخ محمد نجا مفتي بيروت سابقا.

how to perform ziyarat

how to perform ziyarat The significance of Ziyaraah (traveling Sufi Sanits / Shrines) The importance of travelling / spending time / staying with the Saints at the same time they are alive and once they are accepted into God (freed from the physique barriers
and into absolutely the) is easily since they’re teachers.

• non secular academics lengthen Inward transformation to these search aid from Them to be equipped to advance in the religious route.

• Their Teachings are certainly in Silence. It is a heart-to-heart ( core of existence – to – core of existence ) communique that bodily senses and the intellect fail to register. Therefore tricky to understand.

• Silent communications are real to those who have skilled IT. It is manifold more suitable, purer, extreme and is sure, each time one visits the bodily remains of a Saint resting in His tomb / Their tombs far and wide this planet at their distinct spots / areas.
• Some experience / see mild in Saint’s tomb / tombs. In Saint’s corporation, those sitting with Saint / Saints are enveloped in light.

A Saint’s tomb ( resting location of Saints’ physique after Their soul has left the physique in the back of ) is a Threshold to / between corporeal and God. In daily lifestyles, we are equipped to become aware of light coming out by way of the openings of a well-lit building at night. These touring a Saint’s tomb ( Threshold ) the sunshine will fall upon furnished they’re correct on the opening ( Threshold. )

• Saint’s Teachings and benefits continue to advantage these search in the course of Saint’s lifestyles on this world and Saint’s existence hereafter as the Teachings are multiplied to a seeker in silence / Absolute silence ( imperceptible to the corporeal. )
• Sitting with a Saint helps the inner colleges to harmonize, integrate, emerge as silent and inwardly peaceable to with. As soon as the rush, gush, wandering nature is calmed, doubts settle and confusions clear the photograph ( qualities both corporeal and religious ) of the Saint / truth / God is Imprinted / reflected into the inward truth of the seeker, in silence. Therefore become.

• A seeker to begin with is sort of a replicate reflecting the snapshot ( traits of the Saint / Saints ) followed through reflecting light like a diamond and in the end becomes the that means / truth i.E. The state of being Self-Luminous.
• Sitting in the manufacturer of a Saint during their physical presence and sitting in a Saint’s tomb is equal. In a Saint’s tomb it is some distance extra actual – real in manifolds.”

prophet muhammad The Handsome Eyes of Our Beloved Prophet

अमीरे तूगरल हिंदी तूगरल बादशाह एक मतॅबा लशकर रास्ते मे एक गांव मे पहुंचा।तो गांव वालो पर झ्याद त्यां शुरु कर दी।जीन से गांव
अमीरे तूगरल हिंदी तूगरल बादशाह एक मतॅबा लशकर रास्ते मे एक गांव मे पहुंचा।तो गांव वालो पर झ्याद त्यां शुरु कर दी।जीन से गांव

prophet muhammad The Handsome Eyes of Our Beloved Prophet

ان کی آنکھوں پہ وہ سایہ افگن مژہ ۔ ۔ ۔ ظلہ قصر رحمت پہ لاکھوں سلام
اشکباری مژگاں پہ برسے درود ۔ ۔ ۔ سلک در شفاعت پہ لاکھوں سلام
معنی قد رائ مقصد ما طغی ۔ ۔ ۔ نرگس باغ قدرت پہ لاکھوں سلام
جس طرح اٹھ گئی دم میں دم آگیا ۔ ۔ ۔ اس نگاہ عنایت پہ لاکھوں سلام
نیچی نظروں کی شرم وحیا پر درود ۔ ۔ ۔ اونچی بینی کی رفعت پہ لاکھوں سلام
In the following piece of work, We have given an in depth description of the appropriate eyes of our Noble Prophet Muhammad (May Allah deliver him peace & advantages) that have been described by using lots of his companions, and We have defined the Arabic terms utilized in Arabic to describe them:
1. The stunning eyes were “huge” and “huge” described as [1]”عظيمُ العَينَيْن” and [2]”كانتْ عَينَاهُ نَجْلَاوَين”.
2. The Iris was “extraordinarily black” described as [3]”أدْعَجُ العَين” and [4] “أسودُ الحَدَقًة” however the former extra precisely manner “a massive eye with a darkish black Iris having an exceedingly white sclera” “أدعج العين شديد سواد حدقتهما لكن قيد مع سعة العين وشدة بياضهما “.[5]
3. The sclera -white a part of the attention- had a touch of redness in it described as [6]”أشْكًلُ العَيْن”, [7]”مُشرّبُ العَينِ بِحُمْرَة” and “كانَ فِي عَينَيْهِ تَمَزُّجٌ من حُمْرَة”.
Shu`ba as soon as asked Simak about the which means of “أشْكًلُ العَيْن” to which he stated: “an eye fixed that has a long eyelashes”. Qadhi `Iyyadh commented: this is a misapprehension (wahm) by using Simak and the sound view is that the phrase “شَكلًة” in Arabic approach to have a complexion of redness in the eye as the entire students have agreed to and this is what the whole pupils of the technological know-how of unusual Arabic literary (al-Gharib) have concurred on. The word “شَهلَة” is used to describe a hint of redness inside the Iris. Redness in the attention is a praiseworthy characteristic and a handsome first-class consistent with the Arabs.[8]
Hafiz al-`Iraqi considered this redness one of the signs and symptoms of the Prophet hood. When the Noble Prophet travelled with Maysara to Basra, Rahib wondered him whether or not he had some redness in his eyes, upon understanding, he affirmed that he is the promised Messenger.[9]
4. The eyelashes had been “lengthy” and “complete” described as “أًَهْدَبُ الأَشفار” .[10]
5. The eyelashes were obviously darkish black as though kuhl were carried out to them described as “أكْحل العَينَين” [11]
6. The blessed eyebrows had been “lengthy” and fashioned like a “bow” defined as”أزَجّ الحَواجِب” [12]. Al-Qamus defines “azajj” as “bow formed and lengthy” and al-Sihah defines it as “thin and long”. [13] Al-Fa’q defines it as “first-class eyebrows that lead onto the end of the eye”.[14] Munawi provides “plenteous in hair and a long way stretched”.[15]
7. The eyebrows had been “first-class” and not “thick” defined as “دَقِيقَ الحَاجِبَين”.
Eight. The eyebrows had been “perfect” and “by no means met in the middle” above the nose, defined as “سَوابِغَ في غيرِ قَرَن”[16].
Sayyiduna `Ali, Umm Ma`bad and Suwayd bin Gafalah said that the Noble Prophet’s eyebrows (upon him be peace & blessings) did meet, giving the Arabic description “مقرُونَ الحاجِبَين”. However, the scholars have explained the sound view is they “did now not” meet and reconciled among the 2 reports by way of announcing that if one was to “attentively” observe the eyebrows, he might comprehend that there was a “skinny white gap” among them, otherwise it regarded as if they met.[17] The word that describes the non-assembly of the eyebrows in Arabic is “بَلج” and as a result “أبلَج الحواجب”.[18]
9. In the affairs of Allah, the cherished’s anger might seem as such that a vane might honestly seem crammed with the aid of blood in between his eyebrows rising over his forehead, described as “بَينهما عِرقٌ يُدِرُّه الغَضَب”.
Our Beloved Prophet’s eyes (upon him be peace & blessing) were stated by way of many poets in Persian, Arabic and Urdu. Among the high-quality Gnostics who regularly made point out of the perfect details of the eyes have been Pir Sayyid Mehr `Ali Shah in his Punjabi odes which he penned after seeing the Noble Mustafa in just out of doors Madina in Wadiy Hamra, and the super Mujaddid Imam Ahmad Ridha particularly in his Qasida Salamiya, in which he described the complete hilya. The human beings of the subcontinent are always beaten by these odes as a good deal that my non-public experience is that hair lifts up on my pores and skin and tears fill my eyes whilst passionately sang.
Pir Sayyid Mehr Ali Shah says;
“The Beloved’s bow-fashioned eyebrows seemed before me
And it regarded although the lashes have been firing arrows”
Footnotes:The Power of Dua
[1] Narrated Bayhaqi at the authority of Sayyiduna `Ali ibn Abi Taalib & stated via `Ali Qari in Jam` al-Wasa’il (1:fifty five)
[2] Qadhi Yusuf Nabhani stated this wording in Wasa’il al-Wusul p63
[3] As in a narration of `Umar bin Khattab and `Ali ibn Abi Talib
[4] As in a narration of Sayyiduna `Ali ibn Abi Talib
[5] Mulla `Ali Qari, Jam` al-Wasa’il (1: 31)
[6] Narrated via Tirmidhi in his Shama’il on the authority of Jabir ibn Samura. Ibn al-Athir additionally affirmed that Ashkal way “a hint of redness” in al-Nihaya.
[7] Narrated with the aid of Bayhaqi at the authority of Sayyiduna `Ali ibn Abi Taalib & mentioned with the aid of `Ali Qari in Jam` al-Wasa’il (1:fifty five)
[8] `Ali Qari in Jam` al-Wasa’il and Munawi in Sharh al-Shama’il (1: fifty five)
[9] Munawi’s Sharh al-Shama’il, 1:fifty five
[10] This explanation to the phrase “أهدَب” was given by `Ali Qari in Jam` al-Wasa’il (1: 32) and is also understood by means of the following narration referred to via Yusuf al-Nabhani in Wasa’il al-Wusul p63: “وكان أهدب الأشفار حتي تكاد تلتبس من كثرتها”. This description became given through Sayyiduna `Ali in the popular narration of the Hilya narrated by means of Tirmidhi.
[11] In a narration of Abu Hurayrah, and narration of Jabir bin Samurah stated by Tirmidhi
[12] In the famous Hilya narration via Hind bin Abi Haala mentioned by using Tirmidhi.
[13] `Ali Qari in Jam` al-Wasa’il (1:43)
[14] Munawi in Sharh al-Shama’il (1:forty three)
[15] Ibid
[16] In the popular Hilya narration of Hind bin Abi Haala mentioned by Tirmidhi.
[17] Ibn al-Athir in al-Nihaya, Yusuf al-Nabhani in Wasa’il al-Wusul p 73, `Ali Qari in Jam` al-Wasa’il (1:44)
[18] `Ali Qari, Jam` al-Wasa’il (1:44)

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جشنِ عید میلاد النبی ﷺ پر کئے جانے والے اعتراضات کے جوابات
سوال: کیا علمائے امت کے اقوال و افعال سے جشن عیدمیلاد النبیﷺ کا ثبوت ملتا ہے؟
جواب: اس امت کے بڑے بڑے مفتیان کرام، علماء کرام، مفسرین، محدثین، شارحین اور فقہاء نے اپنی اپنی کتابوں میں جشن عید میلاد النبیﷺ منانے کو باعث اجر وثواب لکھا ہے، چنانچہ علمائے امت کے اقوال ملاحظہ ہوں۔


1۔ حضرت امام اعظم علیہ الرحمہ (المتوفی 150ھ) آپ رحمتہ اﷲ علیہ کا نام تعارف کا محتاج نہیں۔ آپ کی دینی خدمات اس قدر ہیں کہ ساری دنیا کے مسلمان ان شاء اﷲ عزوجل تا قیامت کے علم سے مستفید رہیں گے۔ آپ رحمتہ اﷲ تعالیٰ علیہ اپنے ’’قصیدہ نعمانیہ‘‘ میں حضور نبی اکرمﷺ کا میلاد شریف یوں بیان کرتے ہیں
:
یعنی! ’’آپ ﷺ ہی وہ ہیں کہ اگر آپ ﷺ نہ ہوتے تو کچھ نہ ہوتا اور آپ پیدا نہ ہوتے تو کچھ بھی نہ پیدا کیا جاتا۔ وہ ہیں جن کے نور سے چودھویں کا چاند منور ہے اور آپ ﷺ ہی کے نور سے یہ سورج روشن ہے اور حضرت عیسٰی علیہ السلام آپ کی خوش خبری سنانے آئے اور آپ ﷺ کے حسن صفات کی خبر لے کر آئے‘‘ (قصیدۂ نعمانیہ، صفحہ 196، 195ء)
2۔ حضرت امام شافعی علیہ الرحمہ (المتوفی 204ھ) آپ علیہ الرحمہ ارشاد فرماتے ہیں کہ ’’میلاد شریف منانے والا صدیقین، شہداء اور صالحین کے ساتھ ہوگا‘‘ (النعمتہ الکبریٰ بحوالہ ’’برکات میلاد شریف‘‘ ص 6)
3۔ حضرت امام احمد بن حنبل علیہ الرحمہ (المتوفی 241ھ) آپ علیہ الرحمہ ارشاد فرماتے ہیں ’’شب جمعہ، شب قدر سے افضل ہے کیونکہ جمعہ کی رات سرکار علیہ السلام کا وہ نور پاک اپنی والدہ سیدہ آمنہ رضی اﷲ عنہا کے مبارک رحم میں منتقل ہوا جو دنیا و آخرت میں ایسی برکات و خیرات کا سبب ہے جوکسی گنتی و شمار میں نہیں آسکتا‘‘ (اشعتہ اللمعات)
4۔ امام فخر الدین رازی علیہ الرحمہ (المتوفی 606ھ) فرماتے ہیں کہ ’’جس شخص نے میلاد شریف کا انعقاد کیا۔ اگرچہ عدم گنجائش کے باعث صرف نمک یا گندم یا ایسی ہی کسی چیز سے زیادہ تبرک کا اہتمام نہ کرسکا تو ایسا شخص برکت نبوی سے محتاج نہ ہوگا اور نہ ہی اس کا ہاتھ خالی رہے گا‘‘ (النعمتہ الکبری، بحوالہ برکات میلاد شریف ص 5)
5۔ حضرت امام سبکی رحمتہ اﷲ علیہ (المتوفی 756ھ) آپ رحمتہ اﷲ علیہ نے اپنے ’’قصیدہ تائیہ‘‘ کے آخر میں حضور نبی کریمﷺ کو خطاب کرتے ہوئے کہا ہے۔
ترجمہ ’’میں قسم اٹھاتا ہوں کہ اگر تمام دریا و سمندر میری سیاہی ہوتے اور درخت میرا قلم ہوتے اور میں آپ ﷺ کی عمر بھر نشانیاں لکھتا تو ان کا دسواں حصہ بھی نہ لکھ پاتا کیونکہ آپ کی آیات و صفات ان چمکتے ستاروں سے بھی کہیں زیادہ ہیں‘‘ (نثرالدرر علی مولد ابن حجر، ص 75)
6۔ حافظ ابن کثیر (المتوفی 774ھ) فرماتے ہیں ’’
رسول اﷲﷺ کی ولادت کی شب اہل ایمان کے لئے بڑی شرافت، عظمت، برکت اور سعادت کی شب ہے۔ یہ رات پاکی ونظافت رکھنے والی، انوار کو ظاہر کرنے والی، جلیل القدر رات ہے۔ اﷲ تعالیٰ نے اس رات میں وہ محفوظ پوشیدہ جوہر ظاہر فرمایا جس کے انوار کبھی ختم ہونے والے نہیں‘‘
مولد رسول ﷺ، صفحہ 262)
7۔ امام حافظ بن حجر رحمتہ اﷲ علیہ (المتوفی 852ھ) نے ایک سوال کے جواب میں لکھا ’’میرے لئے اس (محفل میلاد) کی تخریج ایک اصل ثابت سے ظاہر ہوئی، دراصل وہ ہے جو بخاری و مسلم میں موجود ہے:
ترجمہ ’’حضور نبی کریمﷺ جب مدینہ منورہ تشریف لائے تو آپ نے یہودیوں کو دسویں محرم کا روزہ رکھتے دیکھا۔ ان سے دریافت کیا تو انہوں نے بتایا کہ یہ وہ دن ہے، جس دن اﷲ تعالیٰ نے فرعون کو غرق کیا تھا اور حضرت موسیٰ علیہ السلام کو نجات دی تھی، ہم اس دن کا روزہ شکرانے کے طور پر رکھتے تھے‘‘
(صحیح البخاری، کتاب الصوم، باب صوم یوم عاشوراء ، رقم الحدیث 2004،
ص 321)
(صحیح المسلم، کتاب الصیام، باب صوم یوم عاشوراء رقم الحدیث 2656، ص 462)
علامہ ابن حجر فرماتے ہیں: اس روایت سے ثابت ہوتا ہے کہ اﷲ تعالیٰ کے کسی معین دن میں احسان فرمانے پر عملی طور پر شکر ادا کرنا چاہئے۔ پھر فرماتے ہیں حضور سرور کائنات نبی رحمت ﷺ کی تشریف آوری سے بڑی نعمت اور کیا ہوسکتی ہے (نثرالدر علی مولد ابن حجر، ص 47)
8۔ امام جلال الدین سیوطی علیہ الرحمہ (المتوفی 911ھ) آپ فرماتے ہیں کہ میلاد النبی ﷺ کے سلسلہ میں منعقد کی جانے والی یہ تقریب سعید (مروجہ محافل میلاد) بدعت حسنہ ہے جس کا اہتمام کرنے والے کو ثواب ملے گا۔ اس لئے کہ اس میں حضور نبی کریم ﷺ کی تعظیم، شان اور آپ کی ولادت باسعادت پر فرحت و مسرت کا اظہار پایا جاتا ہے (حسن المقصد فی عمل المولد، ص 173)
9۔ امام ملا علی قاری علیہ رحمتہ الباری (المتوفی 1014ھ) آپ علیہ الرحمہ فرماتے ہیں ’’جب میں ظاہری دعوت وضیافت سے عاجز ہوا تو یہ اوراق میں نے لکھ دیئے تاکہ یہ معنوی ضیافت ہوجائے اور زمانہ کے صفحات پر ہمیشہ رہے، سال کے کسی مہینے سے مختص نہ ہو اور میں نے اس کا نام ’’الموردالروی فی مولد النبیﷺ‘‘ رکھا ہے (المورد الروی ص 34)
10۔ حضرت علامہ یوسف بن اسماعیل نبہانی رحمتہ اﷲ علیہ فرماتے ہیں ’’ہمیشہ مسلمان ولادت پاک کے مہینے میں محفل میلاد منعقد کرتے آئے ہیں اور دعوتیں کرتے ہیں اور اس ماہ کی راتوں میں ہر قسم کا صدقہ کرتے ہیں، خوشی مناتے ہیں، نیکی زیادہ کرتے ہیں اور میلاد شریف پڑھنے کا بہت اہتمام کرتے ہیں‘‘ (انوار محمدیہ ص 29)
11۔ مفتی مکہ مکرمہ حضرت سید احمد زینی شافعی رحمتہ اﷲ علیہ فرماتے ہیں ’’میلاد شریف کرنا اور لوگوں کا اس میں جمع ہونا بہت اچھا ہے‘‘ (سیرۃ نبوی ص 45)
ایک اور جگہ حضور مفتی مکہ مکرمہ فرماتے ہیں ’’محافل میلاد اور افکار اور اذکار جو ہمارے ہاں کئے جاتے ہیں ان میں سے اکثر بھلائی پر مشتمل ہیں جیسے صدقہ ذکر، صلوٰۃ و سلام، رسول خداﷺ پر اور آپ کی مدح پر‘‘ (فتاویٰ حدیثیہ ص 129)
12۔ محدث کبیر علامہ ابن جوزی رحمتہ اﷲ علیہ فرماتے ہیں ’’یہ عمل حسن (محفل میلاد) ہمیشہ سے حرمین شریفین یعنی مکہ و مدینہ، مصر، یمن و شام تمام بلاد عرب اور مشرق و مغرب کے رہنے والے مسلمانوں میں جاری ہے اور وہ میلاد النبیﷺ کی محفلیں قائم کرتے اور لوگ جمع ہوتے ہیں‘‘ (المیلاد النبوی ص 35-34)
13۔ استاد مسجد حرام مکہ مکرمہ شیخ محمد بن علوی المالکی الحسنی رحمتہ اﷲ علیہ فرماتے ہیں ’’حضورﷺ اپنی میلاد شریف کے دن کی اہمیت اور ضرورت کے پیش نظر اسے بہت بڑا اور عظیم واقعہ قرار دیتے ہیں اور اﷲ تبارک و تعالیٰ کا شکر ادا فرماتے کہ یہ آپ کے لئے بہت بڑا انعام و اکرام و نعمت ہے۔ نیز اس لئے کہ تمام کائنات پر آپ کے وجود مسعود کو فضیلت حاصل ہے‘‘ (حوال الامتفال بالمولد النبوی شریف ص 9,8)
14۔ علامہ شہاب الدین احمد بن محمد المعروف امام قسطلانی فرماتے ہیں ’’حضورﷺ کے پیدائش کے مہینے میں اہل اسلام ہمیشہ سے محفلیں منعقد کرتے آئے ہیں اور خوشی کے ساتھ کھانے پکاتے رہے اور دعوت طعام کرتے رہے ہیں۔ اور ان راتوں میں انواع و اقسام کی خیرات کرتے رہے اور سرور ظاہر کرتے چلے آئے ہیں‘‘ (مواہب لدنیہ جلد 1ص 27)
15۔ حضرت امام ابن جوزی رحمتہ اﷲ علیہ کے پوتے فرماتے ہیں ’’مجھے لوگوں نے بتایا کہ جو ملک مظفر (بادشاہ وقت) کے دسترخوان پر میلاد شریف کے موقع پر حاضر ہوئے کہ اس کے دسترخوان پر پانچ ہزار بکریوں کے بھنے ہوئے سر، دس ہزار مرغ، ایک لاکھ پیالی مکھن کی اور تیس طباق حلوے کئے تھے اور میلاد میں اس کے ہاں مشاہیر علماء اور صوفی حضرات حاضر تھے۔ ان سب کو خلعتیں عطا کرتا تھا۔ اور خوشبودار چیزیں سنگھاتا تھا اور میلاد پاک پر تین لاکھ دینار خرچ کرتا تھا (سیرۃ النبوی 45)
16۔ حضرت شاہ احمد سعید مجددی رحمتہ اﷲ علیہ فرماتے ہیں ’’جس طرح آپ خود اپنی ذات پر درود وسلام بھیجا کرتے تھے، ہمیں چاہئے کہ ہم آپ کے میلاد کی خوشی میں جلسہ کریں، کھانا کھلائیں اور دیگر عبادات اور خوشی کے جو طریقے ہیں (ان کے) ذریعے شکر بجالائیں‘‘ (اثبات المولد والقیام ص 24)
17۔ پیران پیر حضرت سیدنا شیخ عبدالقادر جیلانی رضی اﷲ عنہ ہر اسلامی مہینے کی گیارہ تاریخ کو سرکار دوعالمﷺ کے حضور نذرونیاز پیش فرماتے تھے (قرۃ الناظر ص 11)
18۔ حضرت شاہ ولی اﷲ محدث دہلوی رحمتہ اﷲ علیہ اپنے والد شاہ عبدالرحیم رحمتہ اﷲ علیہ کا واقعہ بیان فرماتے ہیں ’’میرے والد نے مجھے خبر دی کہ میں عید میلاد النبی ﷺ کے روز کھانا پکوایا کرتا تھا۔ ایک سال تنگدست تھا کہ میرے پاس کچھ نہ تھا مگر صرف بھنے ہوئے چنے تھے۔ میں نے وہی چنے تقسیم کردیئے۔ رات کو سرکار دوعالم ﷺ کی زیارت سے مشرف ہوا اور کیا دیکھتا ہوں کہ حضورﷺ کے سامنے وہی چنے رکھے ہیں اور آپ خوش ہیں‘‘ (درثمین ص 8)
19۔ حضرت شاہ ولی اﷲ محدث دہلوی رحمتہ اﷲ علیہ اور ان کے صاحبزادے شاہ عبدالعزیز محدث دہلوی رحمتہ اﷲ علیہ کا معمول تھا کہ 12 ربیع الاول کو ان کے ہاں لوگ جمع ہوتے، آپ ذکر ولادت فرماتے پھر کھانا اور مٹھائی تقسیم کرتے (الدرالمنظم ص 89)
20۔ مفتی اعظم شاہ محمد مظہر اﷲ دہلوی رحمتہ اﷲ علیہ 12 ربیع الاول کو ہر سال بڑے تزک احتشام سے محفل میلاد منعقد کراتے، جو نماز عشاء سے نماز فجر تک جاری رہتی پھر کھڑے ہوکر صلوٰۃ و سلام پیش کیا جاتا اور مٹھائی تقسیم ہوتی، کھانا کھلایا جاتا (تذکرہ مظہر مسعود ص 176)
علامہ ابن جوزی مولد العروس کے ص 9 پر فرماتے ہیں:
وجعل لمن فرح بمولدہ حجابا من النار و سترا، ومن انفق فی مولدہ درہما کان المصطفی صلی اﷲ علیہ وسلم لہ شافعا ومشفعا
(اور جو پیارے مصطفی ﷺ کے میلاد شریف کی خوشی کرے، وہ خوشی، دوزخ کی آگ کے لئے پردہ بن جائے اور جو میلاد رسول اﷲﷺ میں ایک درہم بھی خرچ کرے، حضورﷺ اس کی شفاعت فرمائیں گے اور ان کی شفاعت مقبول ہوگی)
اور ص 28پر محدث ابن جوزی یہ اشعار لکھتے ہیں
یا مولد المختار کم لک من ثنا۔۔۔ ومدائح تعلو وذکر یحمد
یالیت طول الدھر عندی ذکرہ۔۔۔ یالیت طول الدھر عندی مولد
(اے میلاد رسول ﷺ تیرے لئے بہت ہی تعریف ہے اور تعریف بھی ایسی جو بہت اعلیٰ اور ذکر ایسا جو بہت ہی اچھا ہے۔ اے کاش طویل عرصے تک میرے پاس نبی پاک ﷺ کا تذکرہ ہوتا، اے کاش طویل عرصے تک میرے پاس ان کا میلاد شریف بیان ہوتا)
اور ص 6 پر یہ شعر لکھتے ہیں
فلوانا عملنا کل یوم۔۔۔ لاحمد مولدا فدکان واجب
(اگر ہم رسول کریم ﷺ کا روزانہ میلاد شریف منائیں تو بلاشبہ یہ ہمارے لئے واجب ہے)
23۔محدث ابن جوزی اپنے رسالہ المولد کے آخر میں لکھتے ہیں
اہل حرمین شریفین اور مصرویمن اور شام اور عرب کے مشرق ومغربی شہروں کے لوگ نبی ﷺ کے میلاد کی محفلیں کرتے ہیں، ربیع الاول کا چاند دیکھ کر خوشیاں مناتے ہیں، غسل کرکے اچھے کپڑے پہنتے ہیں طرح طرح کی زینت کرتے ہیں اور خوشبو لگاتے ہیں اور نہایت خوشی سے فقراء پر صدقہ خیرات کرتے ہیں اور نبی ﷺ کے میلاد شریف کا ذکر سننے کے لئے اہتمام بلیغ کرتے ہیں اور یہ سب کچھ کرنے سے بے پناہ اجر اور عظیم کامیابی پہنچتی ہے جیسا کہ تجربہ ہوچکا کہ نبی ﷺ کے میلاد شریف منانے کی برکت سے اس سال میں خیروبرکت کی کثرت، سلامتی و عافیت، رزق میں کشادگی، اولاد میں مال میں زیادتی اور شہروں میں امن اور گھروں میں سکون و قرار پایا جاتا ہے (الدرالمنظم ص 101-100)
24۔ حضرت شاہ ولی اﷲ دہلوی رحمتہ اﷲ علیہ فرماتے ہیں:
’’حضرت ایشاں فرموند کہ دوازدہم ربیع الاول‘‘ بہ حسب دستور قدیم ’’قرآن واندم و چیزے نیاز آں حضرت ﷺ قسمت کردم وزیارت موئے شریف نمودم، در اثنائے تلاوت ملاء اعلیٰ حاضر شدند وروح پرفتوح آن حضرت ﷺ بہ جانب ایں فقیر و دست واران ایں فقیر بہ غایت التفات فرموداراں ساعت کہ ملاء اعلیٰ و جماعت مسلمین کہ بافقیر بود بہ ناز ونیائش صعودی کنندہ برکات ونفحات ازاں حال نزول می فرماید‘‘ (ص 74، القول الجلی)
(حضرت شاہ ولی اﷲ نے فرمایا کہ قدیم طریقہ کے موافق بارہ ربیع الاول (یوم میلاد مصطفی ﷺ) کو میں نے قرآن مجید کی تلاوت کی اور آن حضرت ﷺ کی نیاز کی چیز کھانا وغیرہ) تقسیم کی اور آپ ﷺ کے بال مبارک کی زیارت کروائی۔ تلاوت کے دوران (مقرب فرشتے) ملاء اعلیٰ (محفل میلاد میں) آئے اور رسول اﷲﷺ کی روح مبارک نے اس فقیر (شاہ ولی اﷲ) اور میرے دوستوں پر نہایت التفات فرمائی۔ اس وقت میں نے دیکھا کہ ملاء اعلیٰ (مقرب فرشتے) اور ان کے ساتھ مسلمانوں کی جماعت (التفات نبوی ﷺ کی برکت سے) ناز ونیائش کے ساتھ بلند ہورہی ہے اور (محفل میلاد میں) اس کیفیت کی برکات نازل ہورہی ہیں)
فیوض الحرمین میں حضرت شاہ ولی اﷲ نے مکہ مکرمہ میں مولد رسول ﷺ میں اہل مکہ کا میلاد شریف منانا اور انوار وبرکات منانے کی برکتیں پانے کا تذکرہ حضرت شاہ ولی اﷲ دہلوی کی اپنی زبان سے ملاحظہ کرنے کے بعد خود کو ولی اللہی افکار و نظریات کے پیروکار کہلانے والے مزید ملاحظہ فرمائیں۔
شیخ الدلائل مولانا شیخ عبدالحق محدث الہ آبادی نے میلاد و قیام کے موضوع پر ایک تحقیقی کتاب لکھی جس کا نام ’’الدرالمنظم فی بیان حکم مولد النبی الاعظم‘‘ﷺ ہے۔ اس کتاب کے بارے میں علمائے دیوبند کے پیرحضرت حاجی امداد اﷲ مہاجر مکی فرماتے ہیں:
’’مولف علامہ جامع الشریعہ والطریقہ نے جو کچھ رسالہ الدر المنظم فی بیان حکم مولد النبی الاعظم میں تحریر کیا، وہ عین صواب ہے، فقیر کا بھی یہی اعتقاد ہے اور اکثر مشائخ عظام کو اسی طریقہ پر پایا، خداوند تعالیٰ مولف کے علم و عمل میں برکت زیادہ عطا فرماوے‘‘ (الدرالمنظم ص 146)
یہ کتاب ’’الدرالمنظم‘‘ علمائے دیوبند کی مصدقہ ہے۔ جناب محمد رحمت اﷲ مہاجر مکی، جناب سید حمزہ شاگرد جناب رشید احمد گنگوہی، جناب عبداﷲ انصاری داماد جناب محمد قاسم نانوتوی، جناب محمد جمیل الرحمن خان ابن جناب عبدالرحیم خان علمائے دیوبند کی تعریف وتقاریظ اس کتاب میں شامل ہیں۔ جناب محمد قاسم نانوتوی کے داماد نے اپنی تحریر میں جناب احمد علی محدث، جناب عنایت احمد، جناب عبدالحئی، جناب محمد لطف اﷲ، جناب ارشاد حسین، جناب محمد ملا نواب، جناب محمد یعقوب مدرس، اکابر علمائے دیوبند کا محافل میلاد میں شریف ہونا، سلام وقیام اور مہتمم مدرسہ دیوبند حاجی سید محمد عابد کا اپنے گھر میں محفل میلاد کروانے کا تذکرہ کیا اور جناب محمد قاسم نانوتوی کے لئے اپنی اور پیر جی واجد علی صاحب کی گواہی دی ہے کہ نانوتوی صاحب محفل میلاد میں شریک ہوتے تھے۔
الدر المنظم کتاب کا ساتواں باب ان اعتراضات کے جواب میں ہے جو میلاد شریف کے مخالفین کرتے ہیں یا کرسکتے ہیں۔ جی تو میرا یہی چاہتا ہے کہ یہ باب پورا ہی نقل کردوں تاہم مولانا عبدالحق محدث الہ آبادی نے اپنی کتاب کے ساتویں باب میں جن اہل علم ہستیوں کی تحریروں سے میلاد شریف کا جواز (جائز ہونا)پیش کیا ہے، ان تمام کے نام اور ان کی کتابوں کے نام اسی ترتیب سے نقل کررہا ہوں جس ترتیب سے مولانا عبدالحق نے نقل کئے ہیں۔ ملاحظہ ہوں:
1۔ مولانا محمد سلامت اﷲ مصنف اشباع الکلام فی اثبات المولد والقیام
2۔ امام ابو محمد عبدالرحمن بن اسمٰعیل المعروف ابی شامہ، المصنف الباعث علی انکار البدع والحوادث
3۔ علامہ محمد بن یوسف شامی، سبل الہدیٰ والرشاد فی سیرۃ خیر العباد (سیرۃ شامی)
4۔ علامہ امام جلال الدین سیوطی، مصباح الزجاجہ علی سنن ابن ماجہ، الرسالہ حسن المقصد فی عمل المولد
5۔ امام حافظ ابو الخیر شمس الدین الجزری، عرف التعریف بالمولد الشریف
6۔ شیخ ابوالخطاب بن عمر بن حسن کلبی المعروف ابن وجیہ اندلسی، سماہ التنویر فی مولد البشیر النذیر
7۔ امام ناصر الدین المبارک المعروف ابن بطاح، فی فتویٰ
8۔ امام جمال الدین بن عبدالرحمن بن عبدالملک
9۔ امام ظہیر الدین بن جعفر
10۔ علامہ شیخ نصیر الدین طیالسی
11۔ امام صدر الدین موہوب بن عمر الشافعی
12۔ امام محدث ابن جوزی، المولد العروس، المیلاد النبوی
13۔ امام ملا علی قاری حنفی، المورد الروی فی موالد النبوی
14۔ امام شمس الدین سخاوی
15۔ علامہ شیخ شاہ عبدالحق محدث دہلوی، ماثبت من السنہ ومدارج النبوۃ
16۔ شاہ ولی اﷲ محدث دہلوی، الدر الثمین، فیوض الحرمین، الانبتاہ
17۔ شاہ اسماعیل دہلوی فی فتویٰ
18۔ علامہ شاہ محمد اسحق، فی فتویٰ
19۔ علامہ جمال الدین مرزا احسن علی لکھنؤی فی فتویٰ
20۔ مفتی محمد سعد اﷲ فی فتویٰ
21۔ علامہ شیخ جمال الفتنی حفنی، مفتی مکہ فی فتویٰ
22۔ علامہ شہاب الدین خفاجی، رسالہ عمل المولد
23۔ علامہ عبدالرحمن سراج بن عبداﷲ حنفی، مفتی مکہ فی فتویٰ
24۔ علامہ ابوبکر حجی بسیونی مالکی، مکہ فی فتویٰ
25۔ علامہ محمد رحمتہ اﷲ مفتی مکہ فی فتویٰ
26۔ علامہ محمد سعید بن محمد باصیل شافعی، مفتی مکہ فی فتویٰ
27۔ علامہ خلف بن ابراہیم حنبلی، مفتی مکہ فی فتویٰ
28۔ شاہ عبدالغنی نقشبندی فی فتویٰ
29۔ علامہ حافظ شمس الدین ابن ناصر الدین الد مشقی، مورد الصاوی فی مولد الہادی، جامع الاسرار فی مولد النبی المختار، اللفظ الرائق
30۔ علامہ ابو عبداﷲ محمد زرقانی، شرح مواہب لدنیہ
31۔ شاہ عبدالعزیز دہلوی، فی فتویٰ
32۔ شاہ رفیع الدین دہلوی، فی فتویٰ
33۔ امام ربانی مجدد الف ثانی شیخ احمد فاروقی سرہندی،مکتوبات
34۔ مولانا محمد مظہر، مقامات سعیدیہ
35۔ مولانا کرامت علی جون پوری، رسالتہ الفیصلہ
36۔ امام بدرالدین عینی، عمدۃ القاری شرح بخاری
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The Chishti Order used to be centered through (Khawaja) Abu Ishaq Shami (“the Syrian”) (d. 941) who brought Sufism to the town of Chisht, some ninety five miles east of Herat in present-day Afghanistan. Earlier than returning to the Levant, Shami initiated, trained and deputized the son of the local Amir, (Khwaja) Abu Ahmad Abdal (d. 966). Below the leadership of Abu Ahmad’s descendants, the Chishtiyya as they are also identified, flourished as a regional mystical order.

Essentially the most famous of the Chishti saints is Moinuddin Chishti (also known as Khawaja Baba) who settled in Ajmer, India. He oversaw the development of the order in the 13th century as religious laws had been canonized. He saw the Islamic prophet Muhammad (Peace and benefits be Upon him) in a dream and then set off on a experience of discovery.

Different famous saints of the Chishti Order are Nizamuddin Auliya of Delhi, Fariduddin Ganjshakar of Pak Pattan, Qutubuddin Bakhtiar Kaki and Hazrat Makhdoom Ashraf Semnani of Kichocha Shareef

The Chishti Order is noted for its emphasis on love, tolerance, openness and ecstasy. The Order traces its origins through various saints all the strategy to Ali and Muhammad (Peace and blessings be Upon him) himself.
Sema or Qawwali is a style of devotional song to enhance the remembrance of Allah and isn’t part of worship or prayer.
Followers of Inayat Khan claim he was once the first to bring the Chishti Order to North the us.

Followers of Sikh Saint Kabir feel he was additionally a part of the Chishti order.
Contents

1 The 9 standards
2 common Chistiya Chain in South Asia three The golden chain (Shijrah) Chistiya-Mujarradiya
4 The golden chain (Shijrah) Chistiya al-Ashrafiya Saintly Order
The nine principles
The Chishti Order can also be identified for the next standards:
Obedience to shaykh or pir
Renunciation of the fabric world
Distance from worldly powers
Sama (or musical assemblies)
severe prayers and fasting
Dependence on voluntary offerings
Disapproval of incredible feats
service to humanity
admire for different devotional traditions
normal Chistiya Chain in South Asia

Hasan al-Basri
Abdul Waahid Bin Zaid Abul Fadhl
Fudhail Bin Iyadh Bin Mas’ud Bin Bishr Tameeemi
Ibrahim Bin Adham Bin Mansur
Huzaifah Al-Mar’ashi
Abu Hubairah Basri
Ilw Mumshad Dinwari
Abu Ishaq Shami
Abu Ahmad Abdal
Abu Muhammad Bin Abi Ahmad
Sayyid Abu Yusuf Bin Sam’aan Al-Husaini
Maudood Chishti
Shareef Zandani
Usman Harooni
Moinuddin Chishti Ajmeri
Qutbuddin Bakhtiar Kaki
Fareeduddin Masood
Nizamuddin Auliya
Alaaud Deen Ali Ahmad Saabir Kalyari
Makhdoom Ashraf Jahangir Semnani
The golden chain (Shijrah) Chistiya-Mujarradiya…
Prophet Mohammad
Hazrat Ali ibn Abu Talib
Hazrat Hasan al-Basri
Hazrat Abdul Waahid Bin Zaid
Hazrat Fudhail Bin Iyaadh
Hazrat Ibrahim Bin Adham of Balkh
Hazrat Khawaja Sadiyuddin Muraishi
Hazrat Khawaja Aminuddin Basri
Hazrat Khawaja Karimuddin Mumshaad
Hazrat Khawaja Abul Ishak Shami
Hazrat Khawaja Abu Ahmed Abdaal
Hazrat Khawaja Mohammad Abi Ahmed
Hazrat Khawaja Nasihuddin Abu Mohammad
Hazrat Khawaja Abu Yusuf Jamal
Hazrat Khawaja Nasiruddin Moudud Chisti
Hazrat Khawaja Haji Sharif Zindana
Hazrat Khawaja Usman Harooni
Hazrat Khawaja Moinuddin Chishti
Hazrat Khawaja Qutbuddin Bakhtiar Kaki
Hazrat Khawaja Kalimuddin Chisti
Hazrat Khawaja Sirajuddin
Hazrat Khawaja Alimuddin
Hazrat Khawaja Mehmood Chisti
Hazrat Khawaja Jamaluddin Chisti
Hazrat Khawaja Mohammad Hassan
Hazrat Khawaja Mohammad Sani
Hazrat Khawaja Yuhaiya Madni
Hazrat Khawaja Kalimullah
Hazrat Khawaja Nizamuddin Auliya
Hazrat Khawaja Fakruddin
Hazrat Khawaja Noor Mohammad
Hazrat Khawaja Suleiman Bande Nawaz
Hazrat Khawaja Allah Baksh
Hazrat Khawaja Shah Khairuddin Mujjarrad
Hazrat Khawaja Al-Haaj Abdul Rehman Sailani
Hazrat Mohammad Masoom Armaan
Hazrat Shah Sharfuddin Abdul Gafoor Abdaal
Hazrat Mohammed Aainuddin Arif Ali
Hazrat Mohammad Sadique Armani
Hazrat Mohammad Malang Masoom Naqshbandi
The golden chain (Shijrah) Chistiya al-Ashrafiya Saintly Order
Hadrat Muhammad Mustufa Rasool-e-Kareem (Salla Allahu Ta’ala alayhi wa Sallam) (eleven AH) Madinah Shareef
Hadrat Sayyad Ali (forty AH) Najaf Ashraf
Hadrat Khawaja Hasan Basri (one hundred ten AH) Basra
Hadrat Khawaja Abdul Wahid Bin Zaid (176 AH) Basra
Hadrat Khawaja Fuzail Bin Ayaz (187 AH)
Hadrat Khawaja Ibrahim Bin Adham (267 AH) Syria
Hadrat Khawaja Sadiduddin Huzaifal Marshi, Syria
Hadrat Khawaja Aminuddin Basri, Basra
Hadrat Khawaja Mamshaz Denuri (299 AH)
Hadrat Khawaja Abu Ishaq Shami Syria
Hadrat Khawaja Abu Ahmad Abd’al Chishti (355 AH) Chisht
Hadrat Khawaja Muhammad Bin Abu Ahmad Chishti (411 AH)
Hadrat Khawaja Abu Yusuf Chishti (459 AH) Chisht
Hadrat Khawaja Qutbuddin Maudud Chishti (527 AH) Chisht
Hadrat Khawaja Al-Hajj Sharif Zindni, Bukhara
Hadrat Khawaja Uthman Harooni (617 AH) Makkah Shareef
Hadrat Khawaja Muinuddin Hassan Chishti Ajmeri (633 AH)
Hadrat Khawaja Qutbuddin Bakhtyar Kaki (634 AH) Delhi
Hadrat Khawaja Fariduddin Ganj Shakar (669 AH) Pakistan
Hadrat Khawaja Nizamuddin Awliya (715 AH) Delhi
Hadrat Khawaja Siraj al-haqq Wa-din (758 A) Maldah
Hadrat Khawaja Ala al-Haq Pandavi (800 AH) Pandva Shareef
Hadrat Khawaja Makhdoom Ashraf Jahangir Semnani Mehboob-e-Yazdani (808 AH)
Hadrat Khawaja Sayyad Abdur Razzaq Nur’al-Ayn (872 AH)
Hadrat Khawaja Hassan Shareef,
Hadrat Khawaja Tajuddin Awadhi, Ayodhya
Hadrat Khawaja Hussain Al Maaruf,
Hadrat Khawaja Sayyad Chirag-e-Jahan,
Hadrat Khawaja Mahmood Shamsuddin,
Hadrat Khawaja Sayyad Shah Raju,
Hadrat Khawaja Sayyad Ahmad,
Hadrat Khawaja Fathillah,
Hadrat Khawaja Sayyad Muhammad Murad
Hadrat Khawaja Sayyad Bahauddin
Hadrat Khawaja Sayyad Tawaqqal Ali
Hadrat Khawaja Dawood Ali
Hadraa Khawaja Sayyad Shah Niyaz Ashraf
Hadrat Khawaja Sayyad Ashraf Hussain (1348 AH)
Hadrat Khawaja Sayyad Ali Hussain (1355 AH)
*Hadrat Khawaja Sayyad Ahmad Ashraf
**Hadrat Khawaja Abul Muhamid Muhaddith al-A’zam al-Hind

7 Things To Know About Gog and Magog Yajooj And Majooj

7 Things To Know About Gog and Magog Yajooj And Majooj YAJOOJ MA’JOOJ (Gog and Megog)
God created a nation referred to as Ya’jooj and Ma’jooj. Within the commencing they were free. King Zulqarnian imprisoned up at the back of a wall. They are still imprisoned at present, and will probably be freed close the Day of Judgement. They will come out and create various main issue. Their population is ten instances greater than the arena’s population.
As we all know King Zulqarnain travelled from East to West and North to South. When he was once traveling the world, he imprisoned the Ya’jooj Ma’jooj in the back of an extraordinarily thick wall. Zulqarnain went East, the folks stated to him, “In between these mountains, there is a nation known as Ya’jooj Ma’jooj, who are like animals.

Their enamel are like those of wild animals. After they come out they devour snakes, scorpions, horses, mules, donkeys, greens and wild animals. We can provide you with something when you construct a wall between the Ya’jooj Ma’jooj and us so that they is not going to harm us.” Zulqarnain said, “I don’t want paying, however what I would like is that you may help me through bringing me portions of iron, wood and coal.” once they introduced these matters,

Zulqarnain began to construct the wall. After this, he started to blow on it. When it grew to be red-hot, he said, “convey liquid copper.” He put this liquid copper on the wall and made it very robust. Then he mentioned, “they’ll come out from in the back of the wall, when Allah desires them to”

yajooj majooj islam
To these days the Ya’jooj Ma’jooj are trapped at the back of this wall. Daily, they are trying to interrupt this wall. When the solar units, the wall is as skinny as a sheet of paper. Their chief says, “Come on, let’s go house now. Go away it, it is like a page.

We will come the next day and break it down.” when they come tomorrow, with God’s will, the wall is as powerful as earlier than. Daily, that is what they do, but when it’s time for them to return out, then that day they will try to ruin that wall but in the night, the wall can be as thin as a page.umar ibn al khattab quotes in English

The leader will say, “leave it for today and says the words Inshallah (whether it is Allah wills) we can conclude it the next day.” after they come the next day to come, they are going to see that the wall is as thin as a web page and then they’re going to spoil the wall and come out. This will be the time when Hazrat Isa (alayhi salaam) can be ruling the arena. Allah will order Hazrat Isa (alayhi salaam) to take all his followers to the mountain of Tur.
The Ya’jooj Ma’jooj will come and devour the people on the planet. They are going to drink all of the water from the East and all of the water from Buhaira Tabria. Wherever there is water, they’re going to drink all of it. In the event that they find any humans they’ll eat them. Persons can be scared and will disguise. Once they don’t see a individual on the planet they will say, “we now have completed all of the men and women on this planet now we will be able to battle the individuals within the sky.” they’re going to shoot arrows toward the sky.woman in islam 5-islamic articles-WOMAN AS A MOTHER

Allah will make their arrows red and ship them again, and then they are going to be comfortable and say “ That now we have killed the persons within the sky additionally”. At that time, Prophet Isa (alayhi salaam) might be on the mountain. There might be a scarcity of meals. Prophet Isa (alayhi salaam) and the opposite Muslims will pray to Allah, “Oh Allah! Save us from them.”women in islam 2 -islamic Article THE FOUR STAGES IN OF A FEMALE
Allah will listen to their prayers and create a spot on their necks. With that, they’re going to all die. Then Prophet Isa (alayhi salaam) and the Muslims will come down from the mountain, they are going to see that all the ground is covered with bodies and a dirty odor will probably be spreading. They’re going to pray to Allah, “Oh Allah! Shop us from this dirty odor.” Allah will send birds whose necks are like camels’. They are going to take all of the our bodies and throw them on mount Nimbar, this mountain is in Palestine. After this, Allah will send rain. With this, the entire floor will likely be easy.akhlaq of prophet muhammad alaihissalam

Then Prophet Isa (alayhi salaam) together with his people will stay on the bottom and the scarcity of food will conclude. Allah will send advantages in everything. There shall be a lot blessing that one pomegranate will likely be enough for one tribe, and one pomegranate’s peel will make one gigantic tent enough for a bunch of persons to stay under. On this means, one cow’s milk might be ample for one tribe. All these benefits will come when all of the Ya’jooj Ma’jooj are dead.

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Which you could learn the following books of the Moulana Insha Allah for better understading the field of Dajaal and Ya jooj and Ma jooj Insah Allah
An Islamic View of Gog and Magog in the latest Age
Ramadan Greetings in English 2018

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islamic story imam ahmed raza khan alahazrat part 2 Whatever you see, I achieved within the four walls of my room.

This is indeed through the Grace of Sayyiduna Rasoolulah r” (Al Mizaan pg. 342) The above are merely a few branches of knowledge in which A’la Hazrat t reached such great heights of proficiency wherein he was considered to be the discoverer of that branch of knowledge! An example of this is to found in his book, ‘Ar Raudal Baheej fi Adaabut 26 Takhreej’, dealing with the Principles of Chronomatic Recording of Ahadith. Commenting on this, the famous Historian, Maulana Rahmaan Ali, (M.P. Madya Pradesh) states, “If there are no books to

be the very inventor of this branch of knowledge”. (Tazkirah Ulama-eHind, pg. 17) 27 CHAPTER 3 ACADEMIC SERVICES Proficiency in over fifty Branches of Knowledge; Translation and Commentary of the Holy Qur’an; Authority in the Field of Hadith;

A Great Jurist of his Time; A Few of his Fatawa; Imam Ahmed Raza’s Ilm-e-Jafar; His Knowledge of Philosophy and Science; Knowledge of Astronomy and Astrology; A Mathematical Genius; Contribution to the Field of Poetry.

28 PROFICIENCY IN OVER FIFTY BRANCHES OF KNOWLEDGE If we study the life of A’la Hazrat t, we will discover that his proficiency in various subjects total over fifty four branches of knowledge. Is it possible today, to find an Islamic scholar or even a non-Muslim professor, scientist, educationist or a Nobel Prize owner who possesses such qualifications? Arab Scholars such as Sheikh Ismail bin Khalil and Sheikh Musa Ali Shami (radi Allahu anhuma) commended A’la Hazrat t as the Revivalist of the 14th Century A.H.: “If he is called The Revivalist of this Century, It will be right and true.

” Commenting on A’la Hazrat’s t reputation and his knowledge, Dr Jamil Jalibi, Vice Chancellor, Karachi University (Pakistan) said: “Maulana Ahmed Raza Khan Barelvi was an eminent Jurist, leading scholar, scientist, Naa’tia poet, a keen observer of Shariah and a Saint.

His crowning scholarship can be imagined by the fact that he had commanding knowledge of about 54 branches of various sciences and humanities. He has contributed valuable works in almost all of them. He left behind more than a thousand treatises.

” Professor Dr Wahid Ashraf, Baroda University, in Baroda says: “There is no shortage of renowned personalities in the history of Islam who made rich contributions to various fields of knowledge through their divine-gifted qualities of learning,

wisdom and insight. Ibn Sina, Umar Khayyam, Imam Razi, Imam Ghazzali, Al Beruni, Farabi and Ibn Rushd are a few rich names that shall always be remembered with pride. Among them, someone is renowned for Philosophy and Medicine, some other famous for Mathematics, another in Astrology, yet another is known for Moral Philosophy.

Someone is an expert in Greek Thoughts, etc., but the most outstanding personality was born in India and passed away in the present century. He was Ahmed Raza Bareilvi who enjoyed such a command in various branches of knowledge that only experts of the special faculty can discuss fully and successfully.” 29 TRANSLATION AND COMMENTARY OF THE HOLY QURA’N Many people have translated the Holy Qura’n into the Urdu language, but the translation of the Holy Qura’n presented by A’la Hazrat t called “Kanzul Imaan” is proven to be the most unique translation in the Urdu language. In his translation one sees that A’la Hazrat Imam Ahmed Raza Khan t used only those words in his translation which are truly worthy of the Attributes and Qualities of Almighty Allah U and of His Beloved Rasool r.

It is said that the translation of the Holy Qura’n by A’la Hazrat t is not merely a literal translation, but is also the commentary of the Holy Qura’n. In the words of Hazrat Sayyiduna Muhadith-e-Azam Hind t, “It is not only the translation of the Qura’n,

it is the Qura’n.” We have taken just one example of a Verse from the Holy Qura’n that has been translated by numerous persons and compared it with the beautiful translation of A’la Hazrat t. We have taken Sura 93, Verse 7 as an example: ووجدك ضالا فَهدى (1) “And he found you lost on the way and he guided thee.Hazrat Kadija Raziyzllahu tala anha in urdu

” Translation by Mohammad Asad

(2) “And found thee groping so he showed the way.” Translation by Muhammad Ali Lahori Qadianiimam ahmad raza khan barelvi alahazrat story in hindi

(3) “And He found you uninformed of Islamic laws so he told you the way of Islamic laws.” Translation by Ashraf Ali Thanwi

(4) “Did he not find thee erring and guide thee.” Translation by Arberry 30

(5) “And saw you unaware of the way so showed you the straight way.” Translation by Fatheh Muhammad Jalledhri

(6) “And he found thee wandering and He gave thee guidance.” Translation by Yusuf Ali Now that we have examined six different translations of Sura 93, Verse 7, let us examine the difference and the uniqueness of the translation of A’la Hazrat Imam Ahmed Raza Khan t.

He translates the verse: ووجدك ضالا فَهدى “AND HE FOUND YOU SELF ENGROSSED IN HIS LOVE THEREFORE GAVE WAY UNTO HIM” One should pay special attention to the uniqueness and the cautiousness evident in this translation of Imam Ahmed Raza Khan t! He abstained from using such words that may cause any disrespect to the dignity and personality of the Holy Prophet r. This too, was a sign of his true and sincere love for Rasoolullah r.

Due to the enormous amount of time A’la Hazrat t spent in compiling books on Fiqh and numerous other topics, it was not possible for him to compile a complete commentary of the Holy Qura’n. However, a few learned scholars have stated that if all the books of A’la Hazrat t have to be brought together then there is a great possibility that a complete commentary of the Holy Qura’n may be compiled.

Like his translation of the Holy Qura’n, they have said that his Tafseer will also be exceptional. The original commentary to A’la Hazrat’s translation of the Holy Qur’an was written by his Khalifa, Sadrul Afaadil Allama Na’eemud’deen Muradabadi t which also holds a unique position in its field. 31 Commenting only on the “Bismillahir Rahman nir Rahim”, A’la Hazrat t presented such a lengthy discourse on this phrase that it was compiled into a complete book and published under the title, “Al Meeladun Nabwiya.” Once, during the Urs Shareef of Hazrat Maulana Shah Abdul Qaadir Sahib t, A’la Hazrat t delivered a discourse on Sura Wad’duha from 9 a.m. right up to 3p.m. This discourse on Sura Wad’duha alone lasted for 6 hours.Alahazrat naat Best naat collection

After completing his lecture A’la Hazrat t said, “I only wrote 80 percent of the commentary on this Sura and had to leave it aside. Where is there time enough to write the Tafseer of the entire Qura’n-e-Azeem!” Allama Ata Muhammad Bindayalwi t; Sarghoda (Pakistan) said: “Hazrat Bareilvi t has written about a thousand treatises.

He exhaustively dealt with every topic he touched, but his most glorious work is his Urdu translation and explanation of the Holy Qura’n entitled, Kanzul Imaan. Indeed, there is no parallel. Real worth of this monumental work can be evaluated by only those scholars who possess vast and deep knowledge of different other translations and explanations of high standard in Urdu.

A’la Hazrat kept the same pattern as adopted by the renowned writers, but he excelled in the explanation and expansion of the most difficult and complicated subject matter in relatively few simple words”. AUTHORITY IN THE FIELD OF AHADITH Imam Ahmed Raza Khan t was also a great authority of his time when it came to the subjects of Hadith and Usool-e-Hadith. He knew the names of almost every Hadith narrator.

When he was questioned concerning details of a certain narrator, he was able to give a complete biography of the narrator. When he studied any Hadith he was able to explain the type of Hadith, its benefits and the reasons behind that Hadith. He wrote many booklets on the topic of Hadith. 32 One of his books is entitled, “Hajizul Jarain An Jamma Bainas Salaatain”, which covered the Ahadith pertaining to “Jamma Bainas Salaatain” or the “Combination of Two Salaahs in one time”

. Dr Professor Mohiy’yud’deen, Azhar University, Cairo (Egypt) says: “Renowned scholar, Ahmed Raza Khan, visited Arabia twice to perform Hajj at Makkah and paid homage to the Holy Prophet r in Madina. During his stay he visited numerous centres of learning and had extensive exchange of views with the scholars covering various branches of learning and religious issues. He secured permission from some authentics to quote them in reference to particular Ahadith, and in return, he allowed them to mention his authority in respect of some other Ahadith.”Alahazrat imam ahmed raza

“It is an old saying that scholarly talent and poetic exuberance rarely combine in one person, but Ahmad Raza Khan was an exception. His achievements contradict this diction. He was not only an acknowledged research scholar, but also a great poet.” A GREAT JURIST OF HIS TIME Fiqh (Islamic Jurisprudence) is that branch of knowledge which is derived from the Holy Qura’n and the Hadith of Sayyiduna Rasoolullah r. Only that person can be regarded as an accomplished Jurist, who is well-versed in both the Holy Qura’n and the Hadith of Rasoolullah r.ahmed raza khan alahazrat part 1

He must also be well-versed in all the other important branches of knowledge, such as Tafseer, Logic, Philosophy, Translating, and many other branches. A’la Hazrat Imam Ahl-e-Sunnat t was regarded as the greatest Jurist of his era. He was totally proficient in the field of Fiqh and received acceptance by the great Ulama of the East and the West. The greatest proof of his position and status in the world of Fiqh can be understood from his answers concerning the Shariat-e-Mustapha r, which was compiled to form 12 bulky volumes, comprising of approximately 12 000 pages to form the famous book, “Fatawa Radawiyyah,”

which is 33 used in every Darul Ifta (Fatawah Departments) around the world today. The Fatawa Radawiyyah has been currently categorised and referenced and now makes up 30 volumes comprising almost 30 000 pages. A renowned theologian and a great Saint of Delhi, Hazrat Maulana Zayd Abul Hassan Faruqi t, who completed his education at the Al Azhar University, Cairo, acknowledged the unrivalled mastery of Imam Ahmed Raza Khan t over Islamic Jurisprudence and other branches of learning in the following words:

“None can deny the knowledge of Maulana Ahmed Raza Khan in the field of Fiqh. He was, no doubt, the greatest Faqih (Jurist) of his time.” When Sheikh Ismail Khalil, the Curator of the Library at Makkatul Mukarramah, read the Fatawa of A’la Hazrat Imam Ahl-e-Sunnat t he was ecstatic and wrote to A’la Hazrat t saying: “By Allah, if Abu Hanifa Nu’man t would have gone through these Fatawa, undoubtedly, it could have been his heart’s delight and he would have included its writer among his student”. A FEW FATAWA OF A’LA HAZRAT t Question: 3rd Rabi ul Aakhir Shareef 1320 Hijri What do the learned Ulama and the Learned Muftis say concerning whether it is permissible to say “Ya Rasoolallah” sallal laahu alaihi wasallam and Ya Wali Allah?

Is it permissible or not to seek assistance from the Prophets and saints and to say “Ya Ali Mushkil Kusha” in times of need? Please answer this query with your signature and seal, so that I may be confident and clear in explaining this to the people. Also please translate in Urdu the verses of the Quran and Hadith etc.

where ever they appear in your answer. The Answer: It is permissible as long as you accept them as the servants of Allah and wasila in the Court of Allah and to fully accept that they have been blessed with this excellence through the permission and Will of Allah. One must have complete faith in the fact that without Allah’s Will, even one atom can not move. And without doubt, this is the belief of every 34 Muslim. To think contrary to this concerning the Muslims is to falsely accuse them, which itself is haraam. Without Allah’s giving, none can give even one grain, one can not hear a single alphabet, and one can not even blink once

. Now, undoubtedly, to call to them truly and sincerely believing this, is totally permissible. It is evident from the Hadith of Jaame Tirmizi etc. that the Holy Prophet r himself taught the following dua to a blind man. He said that after Namaaz he should read:

“Ya Rasoolullah r, I turn my attention towards my Creator through the wasila of Huzoor r in seeking what I wish for, so that this need of mine is fulfilled.” In some narrations it has been narrated as follows: “So that the Prophet r may fulfill this need of mine.” The blind person read this dua and was immediately able to see. It is in the Hadith of Tibraani etc. that in the time of Hazrat Uthman-e-Ghani t, a companion by the name of Hazrat Uthman bin Haneef t gave this dua to a Sahabi or Taabi’ee to recite. After Namaaz, he said, “Ya Rasoolallah r, I turn my attention towards Almighty Allah whilst making the Prophet r my wasila.

” Even his need was fulfilled. Thus, the Ulama-e-Kiraam said this to be effective in having ones needs fulfilled. It is also as follows in the Hadith: “When you wish to call out and ask help, then you say this, ‘Assist me O servants of Allah.’” It is in Fatawa Khairiyah as follows: “Ya Sheikh Abdal Qaadir Jilani Shai an Lil’lah is a call. What reason is there for it to be prohibited?

” This humble servant (Aala Hazrat) has written a booklet on this topic by the name of “Anwaarul Intiba Fi Haali Nida Ya Rasoolallah” r. Peruse this booklet and you will find it very clear that in every era and every time, the Ulama and the pious have always called for help from the beloveds of Allah in times of difficulty. According to the Wahabis, from the Sahaba’s time onwards, all the pious servants of Allah would be branded as Mushriks (Allah Forbid).

“Wa laa Howla wa Laa Quw’wata il’la bil’laahil Aliyil واالله تعالٰی اعلم “Azeem 35 Question: 14 Rabi ul Aakhir 1320 Hijri What do the learned scholars decree regarding the rights of the children towards their deceased parents? The Answer: The first rights of the children towards their deceased parents, is that once they have passed away, to make all arrangements for the janazah, such as ghusl, kaffan, Janazah Namaaz and burial.

In doing so, one should make sure that all the sunnats and mustahabs are also fulfilled, so that the deceased may receive full blessings. One should continue making dua for them and also making istighfaar for them and not to be negligent of that. To continue to send the sawaab of sadqa and khairaat to their souls.

Try not to allow any shortcoming in doing so and only do what is within your means. When reading Namaaz for you, also read Namaaz for them (send reward of Namaaz to them). When keeping fast for yourself also keep fast for them (send reward). Actually when doing any good deeds, send the reward to them and to the souls of all the deceased Muslims.

Every one of them will receive their sawaab and there will be no shortage in sawaab for anyone. One will receive great success and prosperity in doing this. If they owed anyone any money, then try your best to swiftly pay off this debt. One must note that by paying of their debts with your wealth is a means of blessing for you in this world and in the hereafter. If you are not able to fulfil or pay off the debt, then take assistance from close family members and other kind relatives, so that it may be paid off. Try to fulfill all other debts. If they have not made Hajj, then make Hajj on their behalf or send someone to make Hajj-e-Badal. If they owed any zakaat etc. then try and pay this. If they have any fast (roza) or Namaaz that was not completed, then give kaffarah as compensation and this is based on assumption. Take responsibility to fulfil all their shortcomings to the best of your ability and strive in doing so, so that they may gain salvation. Try to the best of your ability to make sure that any permissible wasiyat (bequest) made by them is carried out, even though it may not be necessary 36 upon you in the light of the Shariat and even if it is difficult upon you, for example if the deceased makes a bequest that half his property be given to a certain relative, even though according to shariat he was only allowed to make a bequest for one third of his property, his children should put his bequest before themselves and try to adhere to what he asked and have it fulfilled. Even after their demise, to be loyal to a Qasam (oath) he had taken. In other words, if he took an oath saying that his son will not go to a certain place or meet with a certain person, then one should not think that now that he has passed away, there is no need to have any consideration for the oath he had taken. It is not so. One must continue like it was in his life time, unless there is something in Shariah that does not allow you to do so. This does not however only refer to their oaths or vows, but it refers to doing every permissible thing after their demise like they wished during their lifetime.

Go for ziyaarat of their graves every Friday. To recite Quran in a tone, that they are able to hear you and to send the reward of the recitation to their souls. Whenever you pass by their grave, never bypass it without making salaam to them or making Fateha. Love their relatives for your entire lifetime. Be kind towards their friends and to always respect them.

Do not ever swear the parents of others, causing the other person to reply by swearing your parents The thing that you need to note most is that do not remain sinful and cause them grief and sadness in their graves due to your wrongdoings. Your parents are aware of all what you are doing. When they see you doing good deeds, they become pleased and their faces begin to beam with brightness and happiness. When they see you doing wrong, then they become sad and their hearts become burdened. It is not for us to even cause them grief after they have gone to their graves. We pray that Almighty Allah, the Merciful,

The Compassionate, blesses all Muslims with the ability to do good deeds. We pray that Allah protects us from sinning. We pray that Allah always fills the graves of our Akaabirs 37 (elders) with Noor and blesses them with comfort for Allah is all Powerful and we are weak and helpless. Allah is Ghani and we are dependant. حسبنا االله و نعم الوکيل نعم المولٰی و نعم النصير۔ولاحول و لا قوة الا باالله العلی العظيم۔ و صلی االله تعالٰی علی الشفيع الرفيع الغفور الکريم الروف الرحيم سيدنا محمد و اله و صحبه اجمعين۔امين الحمد الله رب العالمين This faqeer (Aala Hazrat radi Allahu anhu) would now like to present a few Ahadith from which I have derived that which I mentioned.

First Hadith: An Ansari sahaba t came to the Prophet Sall Allaho Alaihi Wa Sallam and asked if there was anything he could do to benefit his parents after they had passed away and the Prophet Sall Allaho Alaihi Wa Sallam said, “Yes. There are four things; to make their Namaaz (Janazah), to make Dua for their forgiveness, to fulfill the bequests and to respect their friends and relatives from their side by keeping the relationship established. These are those good actions that are to be done for them after they pass away. Second Hadith: The Prophet r said,

“The children should make Dua-eMaghfirat for them after they have passed away. رواہ ابن النجار عن ابی اسيد الساعدی رضی االله تعالٰی عنه مع القصة و رواہ البيهقی فی سننه رضی االله تعالٰی عنه قال قال رسول االله صلی االله تعالٰی عليه وسلم لا يبقی للولد من بر الوالدالا اربع، الصلٰوة عليه والدعاء له و انفاذ عهدہ من بعدہ و صلة رحمه واکرام صيقه Third Hadith: The Prophet Sall Allaho Alaihi Wa Sallam said, “When a person stops making dua for his mother and father, his sustenance is رواہ الطبرانی فی التاريخ و الديلمی عن انس بن مالک رضی االله تعالٰی عنه “.stopped Fourth & Fifth Hadith: The Prophet Sall Allaho Alaihi Wa Sallam said, “If anyone of you gives some Nafil Khairaat, then he should do so on behalf of your parents, so that they may attain its reward and there shall be no shortage in reward. رواہ الطبرانی فی اوسطه و ابن عساکر عن عبداالله بن عمرورضی االله تعالٰی عنهما۔ و نحوہ الديملی فی مسند الفردوس عن ماوية بن حيدة القشيری رضی االله تعالٰی عنهما Sixth Hadith: A Sahabi t came to the Prophet r and said, “O Prophet of Allah r, When my father was alive I treated him very well. Now that he has passed away what can I do to treat him well?” The Prophet r said, “To treat 38 him well after his passing away, you must read Namaaz for him with your Namaaz and keep fast for him with your fast. “ In other words when you read Nafil Namaaz etc for your self and keep fast for your self, then you should award the reward of it to your parents.

Make intention for them to receive reward as well and their will be no shortage in your sawaab. مرو كما لفظ الوجهين بل هذا الصق بالميتة محيط It is also stated in Tataar Khaniyan and then in Durr-e-Mukhtar: الافضل لمن يتصدق نفلاَ ان ينوى لجميع المؤمنين والمؤمنات لاا تصل اليهم ولا ينقص من اجره شئى Seventh Hadith: It is in Awsat from Tibrani and from Darqutni in sunan on the authority of Ibn Abbas t as follows: “One who makes Hajj on behalf of his parents and pays off their debts, then Allah will rise him amongst the pious on the day of Qiyaamah. رواہ الطبرانی فی الاوسط والدار قطنی فی السنن عن ابن عباس رضی االله تعالٰی عنه Eight Hadith: Hazrat Umar-e-Farouk t owed eighty thousand. At the time of his demise, he called his son Hazrat Abdullah bin Umar t and said, “From my belongings, first sell my things. If it is sufficient (to pay off my debt), then it is fine. If not, request (assistance) from my people, the Bani Adi

ahmed raza khan alahazrat part 1

ahmed raza khan alahazrat part 1 Cahmed raza khan alahazrat part 1HILDHOOD Imam Ahmed Raza’s Blessed Birth; His Blessed Name; Illustrious Family History; Im 10 A’LA HAZRAT’S BLESSED BIRTH Imam Ahmed Raza Khan t was born on a Monday, the 10th of Shawaal 1272 A.H. (14th June 1856), at the time of Zohar Salaah in a place called Jasoli, in the city of Bareilly Shareef, situated in the Northern Province (Uttar Pardesh) of India.

A few days before the birth of Imam Ahmed Raza Khan t, his father, Allama Maulana Naqi Ali Khan t, had a wonderful dream.

He immediately disclosed this dream to his father, Allama Maulana Raza Ali Khan t, who interpreted the dream in the following words: “This is a sign that you are to be the father of a child, a boy, who will grow up to be pious and knowledgeable. His name will gain prominence from East to West.

” This was the glad tiding that was given to Allama Maulana Naqi Ali Khan t on the birth of none other than the “Emerald from amongst the Treasures of Almighty Allah”, the “sweet-scented rose from the fragrant garden of the Holy Prophet r”, A’la Hazrat Imam Ahmed Raza Khan t.

AlaHazrat t extracted from the Holy Qur’an, the verse which when added up in Numerical value denoted the date of his birth: أُولَئِك كَتب فِي قُلُوبِهِم الْإِيمانَ وأَيدهم بِروحٍ منه “These are they in whose hearts Allah has inscribed faith and assisted them with a spirit from Him” (Surah Al Mujadilah Verse 22) HIS BLESSED NAME At birth, he was given the beautiful name “Muhamamad”.

The name corresponding to the year of his birth was “Al Mukhtaar.” His grandfather, a great Scholar of the Ahle Sunnah Wa Jama’ah, Allama Maulana Raza Ali Khan t, also gave the young child the beautiful 11 name “Ahmed Raza”. It was by this name that he was famously known.

Much later in his life, A’la Hazrat t added the words “Abdul Mustafa” to his name, signifying his great love and respect for Sayyiduna Rasoolullah r. The Grand Mufti of Makkatul Mukarramah, Sheikh Hussain bin Saleh Makki t, also blessed him the title “Zia’udeen Ahmed”.

ILLUSTRIOUS FAMILY HISTORY Imam Ahmed Raza Khan Al-Qaadri, was the son of Allama Maulana Naqi Ali Khan, the son of Allama Maulana Raza Ali Khan, the son of Allama Maulana Mohammed Kaazim Ali Khan, the son of Allama Maulana Shah Mohammed Azam Khan, the son of Allama Maulana Sa’adat Yaar Khan, the son of Allama Maulana Sa’eedullah Khan (Allah is pleased with them all).

The distinguished forefathers of A’la Hazrat t migrated from Qandahar (Kabul) during the Mogul Dynasty and settled in Lahore. Allama Maulana Sa’eedullah Khan, the foremost forefather of A’la Hazrat t held a lofty government post when he arrived in the Indo-Pak sub-continent. His son Allama Maulana Sa’adat Yaar Khan t, after gaining victory in the city of Rohailah was elected as the Governor of that city.

Allama Maulana Hafiz Kaazim Ali Khan, the son of Maulana Mohammed Azam Khan (radi Allahu anhum), was a Senior Revenue Officer in the city of Badayoun. His son, Allama Maulana Raza Ali Khan t, the illustrious grandfather of A’la Hazrat t did not serve in the Government. It was from this generation that the heads of the family began to adopt Tasawuf as their way of life. A very concise account of A’la Hazrat’s t father and grandfather has been included below: 12 HIS FATHER:

AlaHazrat’s t father, Hazrat Maulana Naqi Ali Khan t received his early education at the hands of his father, Allama Maulana Raza Ali Khan t. He wrote more than 50 books, among them, “Suroorul Quloob fi Zikri Mouloodil Mahboob”, which received a very distinctive prominence in Islamic literature. The treatise is characteristic in its condemnation of the enemies of Islam, both internally and externally. A’la Hazrat’s t father passed away in 1297 A.H. (1880) when A’la Hazrat t was 24 years old.

HIS GRANDFATHER: One of the greatest Sufis of his era, Allama Maulana Raza Ali Khan t was born in the year 1224 A.H. He was also a great fighter and fought beside General Bakht Khan in opposition to the English invaders in the year 1834. He received his early education at the hands of Molvi Khaleer-ur-Rahman.

At the age of 23, he had already completed his Islamic education, earning certificates of distinction in numerous fields of knowledge. He passed away in the month of Jamaadil Awwal in the year 1282 A.H. A’la Hazrat t was only 10 years of age at this time. A’LA HAZRAT’S PIETY AS A CHILD A’la Hazrat t was a child of 4 years when this incident took place. On that particular day, he was dressed in a long Kurta.

As he stepped out of his house, a few females of ill character walked past him. In order to cover his eyes, the young A’la Hazrat t quickly held the bottom of his Kurta with both his hands and lifted the Kurta over his face. When one of them saw what he did, she said, “Well! Young man. You covered your eyes, but allowed your Satr to be disclosed”. With his face and eyes still covered, the young A’la Hazrat t replied, “When the eyes are tempted, then the heart becomes tempted. When the heart is tempted, then the concealed parts become tempted.” So shocked and affected was this wommushkil ki asani ka wazifa easy amal in hindian on hearing such a reply from a child that she lost consciousness.

13 Another incident which happened in the Month of Ramadaan also points to A’la Hazrat’s t piety and fear of Allah, even as a child. Fasting was not Fard (obligatory) upon him because he was still a child, but on that particular day he intended to keep fast. It should be known that it is very difficult for a little child to keep fast in India during the summer months. The average temperature on a summer’s day rises to approximately 50 degrees Celsius. On that day, the suns heat was intense.

Hazrat Allama Naqi Ali Khan t took his young son, A’la Hazrat t, into a room where sweets some were kept. He closed the door shut and said, “There, You may eat the sweets” A’la Hazrat t replied that he was fasting. His father then said, “The fasting of children is always like this. The door is closed and no one is looking.

Now you may eat.” On hearing this, the young A’la Hazrat t respectfully said, “Through Whose command I am fasting, He is Seeing me (i.e. Allah is All Seeing)”. On hearing these words from a little child, tears began to flow from the eyes of Hazrat Allama Naqi Ali Khan t. In a state of spiritual delight, he then left the room with A’la Hazratt. A’LA HAZRAT’S FIRST LECTURE A’la Hazrat Imam Ahl-e-Sunnat t delivered his first lecture at the age of 6 years. It was during the glorious month of Rabi-ul-Awwal.islamic quote of the day 8th ramzanul mubarak

A’la Hazrat t stood whislt standing on the Mimbar (Pulpit) delivered this lecture before a very large gathering which also consisted of learned Ulama. His lecture lasted for approximately 2 hours. A’la Hazrat t spoke on the Wilaadat (Birth) of Sayyiduna Rasoolullah r. He brightened the hearts of the listeners with the love of Sayyiduna Rasoolullah r. The audience were profoundly impressed and inspired by the maturity and eloquence of this lecture which was being delivered by a 6 year old child! 14 HIS INTELLIGENCE AS A CHILD A’la Hazrat t was so gifted and intelligent that there was no need for him to study beyond the fourth Kitaab of his course under the tutorship of any of his teachers. He studied the remaining Kitaabs by himself and would later ask his teachers to assess him. Once, his teacher asked him, “Mia! Are you a Jinn or a human being? It takes me much time to teach a lesson, but it does not take you much time to learn the same lesson.” A’la Hazrat t answered, “Praise be to Allah! I am human.

” When he was only 8 years old, A’la Hazrat t  wrote a Mas’ala on Faraa’id. When his father looked at the answer, he joyfully remarked, “If only some adult could answer in this manner.” At the age of 10, whilst studying the Kitaab, “I’lm-us- Thuboot” under the guidance of his noble father, he noticed a few objections and answers of his father written as a footnote.

A’la Hazrat t studied this book carefully and wrote such a well- explained footnote that even the need for an objection was ruled out.islamic quote of the day 17 ramzanul mubarak

His father came across his research on the particular objection. He was so delighted that he stood up and held the young A’la Hazrat t to his heart and said, “Ahmad Raza! You do not learn from me, but you teach me”.Hazrat Khwaja Peer Fazal Ali Quraishi -awliya e pakistan

Professor Dr Ghulam Mustafa Khan, Head of Department: Urdu, Sindh University, Sindh (Pakistan) said: “Allama Hazrat Ahmed Raza Khan is among the outstanding scholars. His deep learning, intelligence, vision and acumen, surpassed that of great contemporary thinkers, professors, renowned scholars and orientalist. Indeed, there is hardly any branch of learning that is foreign to him.”

ASTONISHING EVENTS OF CHILDHOOD At the age of 3, A’la Hazrat t was once standing outside the Raza Musjid in Bareilly Shareef. An “unknown” person, attired in an 15 Arabian garb approached him and spoke to him in the Arabic language. Those who were present witnessed to their amazement, as the young A’la Hazrat t conversed with the person in pure and eloquent Arabic. This person who conversed with the young A’la Hazrat t was never seen in Bareilly Shareef again. A Majzoob (one deeply absorbed in his love for Almighty Allah) by the name of Hazrat Basheerud’deen Saahib t used to live at the Akhun Zada Musjid in Bareilly Shareef.

He spoke very firmly to anyone who visited him. A’la Hazrat t wished to meet this Majzoob. One night, at about 11 o’clock, he set off alone to meet him. He sat respectfully for about 15 minutes outside the Majzoob’s home. After some time, the Majzoob noticed him and asked, “Who are you to Maulana Raza Ali Khan t.” A’la Hazrat t replied that he was the grandson of Hazrat Raza Ali Khan t.what is hadith importance of hadith

The Majzoob immediately embraced him and took him into his little room. He asked A’la Hazrat t if he had come for any specific matter, but A’la Hazrat t mentioned that he had come merely to request his Duas.

On hearing this, for approximately half an hour, the Majzoob made the following Dua: “May Allah have mercy on you, May Allah bless you.” 16 CHAPTER 2 PRIMARY & TERTIARY EDUCATION Commencement of Islamic Education; Imam Ahmed Raza’s First Fatwa; His Marriage and Blessed Children; Incidents Pointing to His Immense Knowledge; Branches of Knowledge attained from various Ulama; Branches of Knowledge attained without the assistance of Teachers 17 COMMENCEMENT OF ISLAMIC EDUCATION During A’la Hazrat’s t “Bismillah Kwaani” or “Commencement of Islamic Education” a very strange incident occurred.ummul mumineen Hazrat khadija 10 Ramzanul mubarak

His respected teacher asked him to recite the Tasmiyah الرحيم الرحمن االله بسم and then instructed him to read “Alif, Baa, Taa, . . . .” A’la Hazrat t began reading the “Alif, Baa, Taa, …” until he reached the word “Laam Alif”, at which point A’la Hazrat t became silent. When his teacher asked him once more to read “Laam Alif”, he remained silent. The teacher instructed him by saying, “Say, ‘Laam Alif’”. A’la Hazrat Imam Ahl-e-Sunnat t then replied, “I have already read them earlier on. What need is there for me to repeat it?” Hazrat Allama Raza Ali Khan t who was witnessing this incident said, “Son! Listen to what your Ustaad is saying.” Upon further reflection, Hazrat Allama Raza Ali Khan t realised the reason for the objection of the young A’la Hazrat t. It was because the teacher was teaching A’la Hazrat t the lesson on single alphabets. A’la Hazrat t felt that how was it possible that a complete word like “Laam Alif” should be found in such a lesson that only dealt with single alphabets! Hazrat Allama Maulana Raza Ali Khan t knew that it was a very delicate matter that could not be understood by a child.

Nevertheless, he explained, “Son! It is true that which you are thinking of. But the ‘Alif’ which you had earlier read, in reality, is ‘Hamza’ and this which you are reciting now is ‘Alif’.

‘Alif’ is always ‘Saakin’ and one cannot commence with an alphabet which is ‘Ssakin’’. Therefore, it is for this reason that the alphabet ‘Laam’ is brought before the ‘Alif’”. When A’la Hazrat t heard this explanationr, he replied, “If that be the case, then any other alphabet could be joined to the ‘Alif’. Why specifically the ‘Laam’”? Maulana Raza Ali Khan t, out of sheer happiness and excitement embraced A’la Hazrat t and showered him with Duas.

He then explained the answer to A’la Hazrat t in the following brilliant manner: “In looking at them, they both appear to 18 resemble each other very closely, since they are both empty. Even when written together, they look very much alike.

When it comes to their qualities, then ‘Laam’ is the heart of ‘Alif’ and ‘Alif’ is the heart of ‘Laam’.” In this brilliant and well explained answer, Hazrat Allama Maulana Raza Ali Khan t was in reality opening the doors and the treasures of knowledge and spiritual insight to A’la Hazrat t.imam hussain karbala Husayn ibn Ali

A’la Hazrat t was only 4 years old when he completed the recitation of the Holy Qura’n. Due to the extraordinary intelligence bestowed upon him by Almighty Allah, A’la Hazrat t completed his Islamic education at the very young age of 13 years, 10 months and 5 days. A’la Hazrat t states that, “I completed my religious education during the middle of the month of Shabaan in the year 1286 A.H. I was 13 years, 10 months and 5 days old at that time. It was also at this time that Salaah became Fard upon me and I began to have great interest in the Laws of Shariah”.

(Al Ijaazatur Radawiyya) A’la Hazrat t gained his basic knowledge at home. He later continued his studies under the guidance of certain noted teachers. He studied under the watchful eye of his noble father, Hazrat Allama Maulana Naqi Ali Khan t. He completed his primary education under the tutorship of Janab Mirza Ghulam Qaadir Baig, under whom he studied the book, “Mizaane Munsha’ab.” A’la Hazrat t also studied under the guidance of the following luminous personalities: 1. Hazrat Maulana Abdul Ula Rampuri t 2. Sheikh-e-Kabeer, Hazrat Allama Syed Shah Abul Hussain Ahmed-eNoori t 3. Sheikh-e-Tariqah Imam-ul-Asfiya Hazrat Allama Syed Shah Aale Rasool Marahrawi t 19 4. Sheikh Ahmed bin Zaini Dahlaan Makki t 5. Sheikh Abdur Rahman Makki t 6. Sheikh Hussain bin Saaleh Makki t A’LA HAZRAT’S FIRST FATWA (RELIGIOUS DECREE) In a letter sent to his illustrious Khalifa, Malikul Ulama, Hazrat Maulana Zafaruddeen Bihaari t, A’la Hazrat t wrote, “Through the Grace of Almighty Allah, this servant wrote his first Fatwah at the age of 13. It is also at this age that I completed my religious education and gained the certificate of proficiency in this field.

On this day, a question was put forward to me as to whether milk, if reaching the belly of a child, would prove fosterage or not? I replied that even if milk reached the child’s belly, either through the nose or mouth, fosterage would be proven, therefore, making it Haraam upon the child to marry this women”. (Al Malfooz, Vol.1, pg. 12) His father was so amazed and delighted by his in-depth reply that he assigned the young A’la Hazrat t the task of issuing Fatawahs (Islamic Decrees).

For many years thereafter, A’la Hazratt carried out this very important obligation with complete dignity and responsibility. A’la Hazrat t began answering hundreds of Fatawa daily. He received them in all languages – Arabic, Urdu, Persian, English and many other languages. Professor Dr J.M.S. Baljon, Department of Islamology, University of Leiden (Holland), commenting on A’la Hazrat’s t answers to religious enquiries, said: “Indeed, a great scholar I must confess. When reading his Fatawa, I am deeply impressed by the immensely wide reading he demonstrates in his argumentations. Above it, his views appear much more balanced than I expected.

You are completely right; he deserves to be better known and more appreciated in the West than is the case at present.” 20 HIS MARRIAGE AND BLESSED CHILDREN In the year 1291 A.H. (1874), A’la Hazrat t married Irshaad Begum (radi Allahu anha) who was the beloved daughter of Sheikh Fadl Hussain Sahib. He was 18 years old at the time of his Nikah. Almighty Allah blessed A’la Hazrat t with 7 beautiful children – 2 sons and 5 daughters. Both his sons became eminent Islamic Scholars and great Awliyah Allah. A’la Hazrat’s t eldest son, Hujjat-ul-Islam,

Hazrat Allama Maulana Muhammad Haamid Raza Khan Noori Barakaati t was very much efficient in Arabic and various other religious sciences. His features resembled his illustrious father. Hujjatul-Islam t departed from this mundane world on the 17th of Jamadil Awwal 1362 A.H., whilst in the state of Salaah. His Mazaar Shareef (Blessed Tomb) is in Bareilly Shareef, India. Ghousul Waqt Huzoor Mufti-e-Azam-e-Hind, Ash Shah Imam Mustafa Raza Khan Noori Barakaati t, the younger son of A’la Hazrat t studied primarily under the guidance of his elder brother. He also received education at the blessed feet of his noble father and earned himself a certificate of proficiency in religious sciences. Huzoor Mufti-e-Azam-e-Hind t has millions of Mureeds (Disciples) around the world. He is also regarded as a Mujaddid (Reviver) of Islam of the 15th Century. He departed from this mundane world on the eve of the 14th of Muharram 1402 A.H. (1981). His Mazaar Shareef is also in Bareilly Shareef.

INCIDENTS POINTING TO HIS IMMENSE KNOWLEDGE Speaking about A’la Hazrat’s t immense knowledge, Dr Sayyid Muhammad Abdullah, Chairman Department of Encyclopaedia of Islam, University of Punjab, Lahore (Pakistan) said: “The scholar is said to be the mind and spokesman of the nation, especially that scholar who derives inspiration, through and vision from the Holy Qura’n, and the Holy Prophet’s r traditions, a narration of divine knowledge, and exponent of divine scheme. He is the voice of the Creator, a benefactor 21 of mankind. It is not an over statement of exaggeration, but acceptance of truth to say that Ahmad Raza is such a scholar.” “He, indeed, is a renowned scholar, great philosopher, eminent Jurist, man of vision, interpreter of the Holy Qura’n and the Holy Prophet’s (peace be upon him) traditions, and a spell binding orator.” A few days after the Nikah of A’la Hazrat t, a person came to Bareilly Shareef. He presented a Fatwa of Maulana Irshaad Hussain Mujaddidi t to Hazrat Allama Maulana Naqi Ali Khan t and requested the answer to the said query. The Fatwa bore the signatures of many Ulama. Hazrat Allama Naqi Ali Khan t, instructed the said person with the following words: “

Go into the room. Moulvi Sahib is there. He will answer your question.” The person entered the room and saw only the young A’la Hazrat t sitting there. He returned to Hazrat Allama Naqi Ali Khan t and said, “There is no Moulvi Sahib there. All I see in the room is a young lad.” Hazrat Allama Naqi Ali Khan t said to him, “Give the Mas’ala to him and he will answer it.”

The man walked over to A’la Hazrat t and handed him the Fatawa. He studied it carefully and noticed that the answer on the Fatwa of Maulana Irshaad Hussain t was incorrect. A’la Hazrat t wrote the correct answer to the Fatwa and respectfully presented it to his father. His father then verified his t answer as being correct. This Fatwa of A’la Hazrat t was taken to the Governor of Rampur. After studying the Fatwa of A’la Hazrat t, the Governor requested the presence of Maulana Irshaad Hussain Sahib t. When the said Maulana appeared before the Governor, the Fatwa was shown to him. Mufti Irshaad Hussain Sahib t humbly acknowledged that his Fatwa was incorrect (there was an error in the answer) and that the Fatwa from Bareilly Shareef was the correct answer. 22 The Governor of Rampur then said, “If the Fatwa of Bareilly is correct, then how is it possible that all the other Ulama verified and endorsed your Fatwa?” Maulana Irshaad Hussain t replied, “They endorsed my Fatawa because I am prominent, but the True Fatwa is the one issued by The Mufti of Bareilly.” When the Governor learnt that Imam Ahmed Raza Khan t was only 20 years old, he immediately had the great yearning to meet him. It happened such that A’la Hazrat t once visited Rampur. The Governor went forth to meet A’la Hazrat t. The Governor was overwhelmed, and as a mark of respect he offered A’la Hazrat t a silver chair to sit on. A’la Hazrat t refused to sit on the silver chair saying that the use of silver furniture is Haraam. Feeling ashamed, the Governor requested A’la Hazrat t to sit on the bed. While conversing with A’la Hazrat t, the Governor commented that since he was so brilliant at such a young age, A’la Hazrat t should study a few books in Mantiq under the supervision of Moulvi Abdul Haq Kheyrabaadi. At that precise moment, Moulvi Abdul Haq Kheyrabaadi arrived. They were introduced to one another.akhlaq of prophet muhammad alaihissalam

After getting acquainted, he questioned A’la Hazrat Imam Ahl-e-Sunnat t concerning the books that he had studied in the field of Mantiq. A’la Hazrat t told the Moulvi that he had studied the Kitaab, “Kaazi Mubaarak”. Moulvi Abdul Haq Kheyrabaadi did not believe A’la Hazrat t because he felt that he was too young to study “Kaazi Mubaarak”. He then, very sarcastically, asked, “Have you studied ‘Tahzeeb’?” A’la Hazrat t also answered in a very ironic manner by saying, “Is ‘Tahzeeb’ taught after ‘Kaazi Mubaarak’ at your institution?” After carefully listening to the answers of A’la Hazrat t, he began questioning him about his qualifications. A’la Hazrat t said that he preferred teaching, engaging in the work of Fatawa and writing books. 23 He further asked A’la Hazrat t concerning his field of expertise. A’la Hazrat t replied by saying that he specialised in any field that was necessary at any given time, and this included debating the wahabis. When Moulvi Abdul Haq heard A’la Hazrat’s response, he remarked, “That fanatical person from Badayoun is also in this

fanaticism.”(He was referring to Maulana Abdul Qaadir radi allahu anhu). On hearing this, A’la Hazrat Imam Ahl-e-Sunnat t was very offended and said, “Your father Maulana Fadl-e-Haq Kheyrabaadi t was the first person to debate the wahabis and he was the one responsible for writing a book against Isma’il Dehlvi. He called this book Al Fatawa Fi Butali Taghwa.”

Maulana Abdul Haq Kheyrabbadi then said, “If in my presence you answer me in this way, then it will be impossible for me to teach you.” A’la Hazrat t replied by saying, “I have already decided not to study under you, since for me to study under you will be an insult to the Ulama-e- Ahle Sunnah”. Maulana Mufti Mazharullah said: “Once, I enquired from A’la Hazrat about the holy sacrifice offered by Muslims. He, in his reply, described innumerable kinds of sheep which was a matter of surprise for me.

I kept his letter with me. It happened such that Maulana Kifaayatullah came to see me and by chance he saw the letter. He was astounded and said, ‘No doubt his learning and knowledge knows no boundaries’.” 24 BRANCHES OF KNOWLEDGE STUDIED BY AT HIS FATHER’S FEET A’la Hazrat t became proficient in the following branches of knowledge at the feet of his father: 1. TAFSEER OF THE HOLY QURA’N 2. TASHREEH OF HADITH 3. PRINCIPLES OF AHADITH (USOOL-E-HADITH) 4. ISLAMIC JURISPRUDENCE (ALL FOUR SCHOOLS OF THOUGHT) 5. PRINCIPLES OF JURISPRUDENCE (USOOL-E-FIQH) 6. DIALECTICS 7. QURA’NIC COMMENTARY 8. PRINCIPLES OF BELIEF 9. PRINCIPLES OF DEBATE 10. ARABIC SYNTAX 11. PRINCIPLES OF RHETORIC 12. LANGUAGE USAGE OF METAPHORS 13. SCIENCE DEALING WITH RHETORIC 14. LOGIC 15. DEBATES 16. PHILOSOPHY AND POLITICS 17. RHETORIC DEVICES 18. PHYSICS 19. MATHEMATICS 20. PHYSICAL ENGINEERING On page 22 of the Kitaab “Al Ijaazatul Mutay”yanah” A’la Hazrat t mentions the following in relation with the above mentioned 20 branches of knowledge. He says, “I learnt these twenty branches of knowledge, personally at the feet of my father”. 25 OTHER BRANCHES OF KNOWLEDGE ATTAINED FROM VARIOUS ULAMA He studied Qura’nic Recitation, Correct Recitation with Tajweed, Mysticism, Mystical Initiation, Islamic Ethics, Discussion on Narrators of Hadith, and Biography of The Holy Prophet r, Islamic History, InDepth Study of Arabic and Literature. A’la Hazrat t states: “These ten branches of knowledge, I attained at the feet of the following teachers: Shah Aale Rasool marahrawi, Maulana Naqi Ali Khan, Sheikh Ahmed bin Zain Dahlaan Makki, Sheikh Abdur Rahman Makki, Sheikh Hussain bin Saaleh Makki, Shah Abul Hussain Ahmed Noori (alaihimur rahmah).” BRANCHES OF KNOWLEDGE ATTAINED WITHOUT THE ASSISTANCE OF ANY TEACHER A’la Hazrat t learnt Arithmetic, Algebra, the twelve branches of Mathematics, Modern Astronomy, Science of Inheritance, Science of Prosody, Astrology, Science of History, Prose in Hindi, Prose is Persian, in-depth study of Arabic and in-depth study of plain Persian writing. When A’la Hazrat t was questioned about his amazing capabilities in solving intricate and confusing Mathematical theories, and as to whom his mentor was, he replied, “I did not have a teacher in this field.

 

imam ahmad raza khan barelvi alahazrat story in hindi

imam ahmad raza khan barelvi alahazrat story in hindi Wiladat-e-Ba-Sa’adat Meray Aaqa AalaHazrat, Imamay Ahl-Sunnat, Wali-eNe’mat, Azeem-ul-Barakat, A’zeem-ul-Martabat, Parwana-eSham-e-Risalat, Mujadid-e-Den-o-Milat, Hami-e-Sunnat,  Mahi-e-Bid’at, A’alim-e-Shari’at, Bais-e-Khayr-o-Barakat, Hazrat A’llama Maulana Al-Haj Al-Hafiz Al-Qari Shah Imam Ahmad Raza Khan ki wiladat-e-Ba-Sa’adat Bareli Shareef kay mahalla Jasoli may 10 Shawwal-ul-Mukarram 1272 Hijri Baroz hafta ba-waqt-e-zuhur mutabiq 14 june 1856 ko hui. San-e-Paydaish kay a’tibar say aap ka naam Al-Mukhtar (1272 Hijri) hay.

 AalaHazrat,ka san-e-wiladat Mayray Aaqa AalaHazrat,nay apna Tazkirah-e-Imam Ahmad Raza Khan 3 Apka Naam-e-Mubarak Muhammad hay our Apkay dada nay Ahmed Raza kah ker pukara our isi naam say mash’hor huway.

Hayrat Angayz Bachpan U’momam her zamanay kay bachon ka wohi haal hota hay jo aaj kal bachon ka hay kay saat (7) A’ath (8) saal tak to unhen kisi baat ka hosh nahi hota our na hi wo kisi baat ki tayh tak pohanch saktay hayn, Magar

A’ala ka bachpan bari ahmiyat ka hamil tha. Kam sini, khurd Sali (ya’ni bachpan) our kam umri may hosh mandi our quwwat-e-hafiza ka ye a’alam tha kay sarhay chaar saal ki nanhi si umar may Quran-e-Majeed nazira mukamal parhnay ki nay’mat say baryab ho gay.

Chay Saal kay thay kay Rabi-ul-Awal kay Mubarak mahenay may mumber per jalva-Afroz ho kar Milad-u-Nabi kay mozo’ per aik bohat baray ijtam’a may nihayat pur magaz takreer farma ker u’lamaye kiraam our Mashaykh ‘Uzzam say tehseen-o-afreen ki dad wusool ki. Usi umar may Ap nay Baghdad Shareef kay baray may simt ma’loom kar li phir tadam-e-Hayat baldah-e-mubarika Ghaus-e-A’zam Ɍ (ya’ni Ghaus-e-A’zam kay Mubarak shahar) ki taraf pa’aon na phaylaye. Namaz say to Ishq ki had tak lagao tha chuna-chay Namaz-e-panjgana ba-jama’at takbeer-e-ola ka tahaffuz kartay huwey masjid may ja kar ada farmaya kartay, jab kabhi kisi

4 khatoon ka samina hota to furan nazrayn neechi kartay huwey sar jhuka liya kartay, goya kay Sunnat-e-Mustafa ;alaihissalam ka Ap per ghalaba tha jis ka izhar kartay huway Huzoor Pur Noor alaihissalam ki khidmat A’aliya mey youn salam pesh kartay hayn:

AalaHazrat,nay larakpen may takwa ko is qadar apna liya tha kay chaltay waqt qadmon ki A’ahat tak sunnae na deti thi. Saat saal kay thay kay Mah-e-Ramazan-ul-Mubarak may rozay rakhnay shuru ker diye.

Bachpan ki ayk hikayat Janab-e-Sayad Ayub Ali Shah Sahib farmatay hayn kay bachpen may Ap ko ghar per a Tazkirah-e-Imam Ahmad Raza Khan 5 e-Pak mangwa ker dekha to us may katib nay galti say zair ki jaga zabar likh diya tha, ya’ni jo A’la Hazrat  ki zaban say nikalta tha wo sahi thakay Dada nay pucha kay betay jis tarah Moulvi Sahib parhatay thay tum usi tarah kuyon nahi parhtay thay?

Arz ki: Mayn iradah karta tha magar zaban per qabo na pata tha. A’la Hazrat khud farmatay thay kay meray ustad jin say Mayn ibtada’e kitab parhta tha, jab mujhay sabaq parha diya kartay, aik do martaba mayn dekh ker kitab band ker deta, jab sabaq suntay to haraf ba-haraf lafz ba-lafz sunna deta. Rozana ye halat dekh ker sakht ta’jub kartay. Aik din mujh say farmanay lagay kay Ahmed Miyan! Ye to kaho Admi ho ya Jin?

kay mujh ko parhatay dayr nahi lagti hay magar tum ko yad kartay dayr nahi lagti ! Ap nay farmaya kay Allah ÄȐÇ Ä ǽ ka sukar hay mayn insan hi hon haan Allah ǽ ka Fazul-o-Karam shamil-e-Hal hay.

Allah ki un per rahmat ho our unkay sadqay hamari behisab maghfirat ho. 

 

6 Peyhla Fatwa Mayray Aaqa A’la Hazrat nay sirf terah (13) saal dus (10) mah chaar (4) din ki umer may tamam Muraweja u’loom ki takmeel apnay Walid Majid Raees-ul-Mutakallimeen Moulna Naqi Ali Khan Ä say ker kay sanad-e-faraghat hasil ker li. Usi din Ap nay aik suwal kay jawab may peyhla fatwa tahreer farmaya tha. Fatwa sahi paa ker Ap kay Walid-e-Majid nay Masnad-e-Ifta Ap kay supurd ker di our akhir waqt tak fatwa tahreer farmatay rahay.
Allah ki un per rahmat ho our unkay sadqay hamari bayhisab maghfirat ho.

AalaHazrat, Ki Riyazi Dani Allah Ta’ala nay A’la Hazrat ko bay-andazah u’loom jalila say nawaza tha. Ap Ȝ È nay kamo-baysh pachas u’loom mayn qalam uthaya our qabil-e-qadar kutub tasneef farmayen. ko her fun may qafi dastaras hasil thi. Elm-e-toqeet mayn is qadar kamal hasil tha kay din ko suraj our raat ko sitaray dekh ker ghari mila letay. Waqt bulkul sahi

7 hota our kabhi aik minute ka bhi farq na huwa. Elm-e-Riyazi may Ap yagana-e-rozgar thay. Chuna-chay Ali-Garh University kay Voice Chanceller Doctor Ziya-u-din jo kay riyazi may gair mulki digriyan our tamgha-jaat hasil kiye huway thay. khidmaat may riyazi ka aik mas’ala puchnay Aey.

Irshad huwa : Farmaiey ! Unhon nay kaha: wo eysa mas’ala nahi jesay itni asani say arz karon. A’la Hazrat Ȝ È nay farmaya: Kuch to farmaeye. Voice Chanceller Sahib nay suwal pesh kiya to A’la Hazrat nay usi waqt iska tashafi bakhsh jawab day diya.

Unhon nay intahae herat say kaha kay mayn is mas’alay kay leye ‘ jana chahta tha ittifakan hamaray Diniyat kay Professor Moula Sayed Sulayman Ashraf Sahib nay meri Rayhnuma’e farmae our mayn yahan hazir ho gaya. Youn Ma’loom hota hay kay Ap isi mas’alay ko kitab dekh rahay thay.

Doctor Sahib Ba-sad farhat-o-Musarrat wapas tashreef lay gaey our aap kishakhsiyat say is qadar Mutassir huway kay darhi rakh li our Soom-o-Salat kay paband ho gaey.
ki un per rahmat ho our un kay sadqay hamari bay-hisab maghfirat ho.

E’lawa Azen Meray Aaqa A’la Hazrat Elm-e-Takseer, Elm-eHayet, Elm-e-Jafar waghera may bhi qafi maharat rakhtay thay.

Hayrat Angez Quwwat-e-Hafiza Hazrat Abu-Hamid Sayed Muhammad Muhaddis Kacho-chwi Ȝ È     farmatay hayn kay jab Dar-ul-Iftah may kam karnay kay sil-silay may mera Berayli Shareef may qiyam tha to raat din esay waki’at samnay aatay thay kay A’la Hazrat ki hazir jawabi say log heran ho jatay. unki hazir jawabiyon may herat may dal denay walay waqe’at wo e’lmi hazir jawabi thi jis ki misal suni bhi nahin gae.

Maslan Istifta (Suwal) Aaya, Dar-ulIfta may kam karnay walon nay parha our esa ma’lom huwa kay nae qisim ka hadisa daryaft kiya gaya (ya’ni nae qisim ka mua’mila pesh aaya hay) our jab jawab juziyya ki shakal may na mil sakay ga Fuqaha-e-Kiram kay usool-e-A’mma say istinbat karna paray ga. (ya’ni fuqaha-e-kiram  kay bataey huway usolon say mas’ala nikalna par Tazkirah-e-Imam Ahmad Raza Khan

Sirf Aik Maah Mayn Hafiz-e-Quran Janab Sayed Ayoub Ali Sahib ka bayan hay kay aik roz A’la Hazrat nay irshad farmaya kay baaz nawaqif hazrat meray naam kay aagay Hafiz likh diya kartay hayn, halankay mayn is laqab ka ahal nahi hon.

Sayed Ayoub Ali Sahib farmatay hayn kay A’la Hazrat    nay isi roz say dour shuru ker diya jis ka waqt galiban E’sha ka wuzu farmanay kay b’ad say jama’at qaim honay tak makhsos tha. Rozana aik para yad farma liya kartay thay, yahan tak kay teesven roz teesvan para yad farma liya. Aik Mo’qay per farmaya kay mayn nay kalam-e-Pak bil-tarteeb ba-koshish yaad kar liya our ye is liye kay in bandgan-e-Khuda ka (jo meray naam kay aagay hafiz likh diya kartay hayn) kehna ghalat sabit na ho.

Allah ki un per rahmat ho un kay sadqay hamhari bay-hisab maghfirat ho

 

ka sarta-paa namuna thay, Ap ka na’tiya dewan ‘Hadaiq-e-Bakhshish Shareef’ is amar ka shahid hay. Aap  ki Noq-e-Qalam balkay Gehra’e qalb say nikala huwa her misr’a Mustafa Jan-e-Rahmat nay kabhi kisi dunyawi tajdar ki khushamad kay leye qaseeda nahi likha, is liye kay Aap Ȝ È     nay Huzoor-e-Tajdar-e-Risalat ki eta’at-o-ghulami ko dil-o-jan say qabool ker liya tha. Our us may martaba-e-kamal ko puhnchay huway they, is ka izhar Ap nay aik shay’r may is tarah farmaya:

Hukkam Ki Khushamad Say Ijtinab Aik martaba riyasat nan-parah (zila bahraich yupi Hind) kay nawab ki madah (ya’ni ta’reef) may shu’ra nay qasaid likhay. Kuch logon nay Ap ay bhi guzarish ki kay Hazrat Ap bhi nawab sahib ki madah (ta’reef) may koi qaseeda likh dayn. Ap nay us kay jawab may aik na’at shareef likhi jis ka matla’e1 ye hay: 1 Ghazal ya qaseedah kay shuru ka shay’r jis kay dino misron may qafiye hon wo matla’ kahlata hay.     

Alahazrat naat Best naat collection

Alahazrat Naats By  Owais Raza Qadri 

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islamic stories Hazrat khwaja Gulam Dastagir moti wale

islamic stories Hazrat khwaja Gulam Dastagir moti wale twenty ninth Nov – Nishan ( Flag Hosting ) at 8.30 PM
The flag could be hosted at the Dargah at Egmore, Chennai.
24th December 2008 – SANDAL FUNCTION
Sandal will begin with Kismat at 3 PM afternoon through washing the Mazar -e- Noor with with Rose water.
At around 10 PM that night time a Grand Procession will start from Dargah Shariff at Egmore, Chennai with Decorated Mehendi in which the Sandalwood silver Pot is stored with Bands & firework.
After the return of procession to Dargah the Sandal might be Anointed on the Maazar at spherical three AM.
ON 25th December 2008 -URS
There will be Maulood at Dargah followed by means of Tamil & Urdu Qwalli.
Every year very popular Urdu Qwalli is Held at Dargah on the URS day.
Dastaghir Saheb Baba :: Syed Moosa Shah Qadri Baghdadi
Kunangudi Masthan :: Moti Baba (RA) Dargah
Gumbaz shareef of Hazrath Dastaghir Saheb Baba (RA)
Mazar-e-Mubarak of Hazrath Dastaghir Saheb Baba (RA)
Bismillah ir-Rahman ir-Raheem.
Mu’Avvidhan Mu’Basmilan Mu’hamdhilan Mu’Salliyan-va-Mu’Sallima
Raleena Billahi Rabban-va-bil Islami Dheenan, Va Bi Mohammadhin Sal-lal-lahu Alaihi Va Aalihi Va Sahbihi Va Sallam, Nabiyyan Va Rasulah, Va Bi Muhyiddeeni Abdul Qadir Jeelani Raliyallahu Tha’ala Anhu, Sheikhan Va Murshidha.
Dargah-e-Hazrath Dastaghir Saheb Baba (Rahmathullahi Alaihi), Located at 83, Dr. Natesan Road. Triplicane, Chennai 600 1/2
Mazar-e-Mubarak of Hazrath_Madina_Peer (RA) who’s buried in
the Dargah-e-Hazrath Dastaghir Saheb Baba (RA)
It is nearly three hundred years on account that his Pardha. Hazrath Dastagir Saheb Baba (RA) has fore visible his dying and has instructed his disciples no longer to behavior the Janaza (Funeral) prayers below every other Imam. Baffled disciples have been a whole lot delighted when Hazrath Dastagir Saheb Baba (RA) himself seemed and disappeared after undertaking his personal Janaza prayer.
Urs/Sandhal Mubarak of Hazrath Dastagir Saheb Baba (RA) is well known each Hijri year, Rajab third.
Dargah-e-Hazrath Dastaghir Saheb Baba (RA) is positioned at Triplicane, that’s situated about a half km from the Bay of Bengal coast and Fort St George, one of the oldest important commercial enterprise districts of Chennai, South India.
Mazar-e-Mubarak of Hazrath Dastaghir Saheb Baba (RA)
Triplicane is called the Bachelors Paradise of Chennai. The locality has a big range of mansions – a nearby synonym for guest homes. Many of those are suitable for students, unmarried specialists and traffic. Walking around the lanes of Triplicane at some point of evening time, one is apt to come upon hosts of children talking in a babel of languages – English, Hindi, Telugu, Tamil and Malayalam. The location is understood for its academic book stalls and used bikes. Triplicane’s Pycrofts Road is a mini T. Nagar in which one can purchase all sorts of garments and baggage.
Mazar-e-Mubarak of Khaleefa-e-Hazrath Dastagir Bawa (RA),
Hazrath Sheikh Khwaja Fakruddin Mehkari (RA)
If you are accomplishing Chennai via bus, please get down at Chennai Mofussil Bus Terminus (CMBT), Koyambedu and from there, please pick out up a bus for Triplicane and ask any muslim you spot on the road approximately the Dargah and they’ll genuinely guide you, Insha ALLAH. In addition to that, Triplicane and Mount Dargahs are located very close by. Thus, you may reach Triplicane after finishing your Ziyarath from Mount Road Dargah.
The beloved son (RA) of Hazrath Dastaghir Baba (RA)
The loved spouse (RA) of Hazrath Dastaghir Baba (RA)
Mazar-e-Mubarak of Hazrath Dastaghir Saheb Baba (RA)
Allah aur Rasul-e-Kareem, Sal-lal-lahu Alaihi Wa Sallam aur Sahab-e-Rasool Sallalahu Alaihi wa Sallam and Hazrath Dastaghir Saheb Baba (Rahmathullahi Alaihi) may additionally do khass Nazar e Karam on you and your own family and your loved one ones. Ameen. Ya Rabbil Alameen.
Wassalam, Fee Amanillah,
Ghulam-e-Khalwathu Nayahangal (RA) Thaikka Shareef,
Cumbum Shareef
Ahamed Sayeedul Khalwathi Sayeedi
—————————————————————————
Bismillahir Rahmanir Raheem.
Mu’avvidhan Mu’Basmilan Mu’hamdhilan Mu’Salliyan-va-Mu’Sallima.
Raleena Billahi Rabban-va-bil Islami Dheenan, Va Bi Mohammadhin Sal-lal-lahu Alaihi Va Aalihi Va Sahbihi Va Sallam, Nabiyyan Va Rasulah, Va Bi Muhyiddeeni Abdul Qadir Jeelani RaziyAllahu Tha’ala Anhu, Sheikhan Va Murshidha.
Allahumma Salle ‘ala Syedina wo Maulana wo Rahati Qulubina wo Shafiyaa Zunoobina wo Tabiba Zaherana wo Batinana Mohammeddin wo ‘Ala Alihi wo Ashabihi wo Auliyahi wo Ummatihi bi Rahmatika ya Ar-Rahmar-Rahimeen wal Hamdullillah hi Rabbil Alameen, Ameen.
‘Ala inna Auliya Allahi la Qaufun Alaihim wa l. A. Hum Yahzanoon.
City / Town / Taluk: Chennai.
District: Chennai
State: India.
Name of the Dargah: – Dargah-e-Hazrath Syed Moosa Shah Qadri Baghdadi (Rahmathullahi Alaihi) urf Annasalai (or) Mount Road Dargah.
This is the most well-known Makham of all Chennai Dargahs and attracts humans of all faith from all walks of existence which includes music director, A.R. Rahman, who visits every Thursday, Arcot Prince, High Court Chief Justice and diverse famous icons of numerous industries.
Hazrath Syed Moosa Shah Qadri Baghdadi (RA) arrived from Baghdad Shareef inside the center of the 17th Century (450 years back) and lived on the web page of what’s now better known as the Mount Road Dargah. In life, Hazrath Syed Moosa Shah Qadri Baghdadi (RA) is stated to have had excellent recovery powers. When he died, he turned into buried next to his residence and here his family raised the Dargah Shareef. And to it have flocked the ill over the years, looking for the advantages of healing from his spirit.
When a British engineer in the past ordered the shrine to be demolished for avenue-widening, his workmen refused to proceed with the paintings when, at the first strive at excavation across the constructing, blood spurted from the soil. When the engineer forced them to renew paintings, he collapsed – dropped useless, say a few – the instant trenching commenced once more.
It is the faith in Hazrath Syed Moosa Shah Qadri Baghdadi (RA) that attracts people of all faiths to the Dargah Shareef each Thursday, searching for assurances of suitable fitness, solutions to their prayers and the blessings of the holy. The Dargah Shareef, taken care of through the descendants of Hazrath Syed Moosa Shah Qadri Baghdadi (RA) from the time his Dargah become raised, is however, best a part of the campus today. Dominating it in recent times has been one in all the most important mosques in South India, with a 100-toes tall minaret. The five-storeyed Makkah Masjid, with its 5 5000 sq.Ft. Halls that can accommodate 5000 worshippers at a time, can be a landmark, however it is the spirit of Hazrath Syed Moosa Shah Qadri Baghdadi (RA) that make this, one of the metropolis’s holy websites.
The Minar-e-Pak at Dargah-e-Hazrath Syed Moosa Shah Qadri Baghdadi (RA) is quite prominent other than the LIC building and the Tarapore Towers in Mount Road.
Dargah-e-Hazrath Syed Moosa Shah Qadri Baghdadi (RA) is located in Anna Salai, formerly known as Mount Road, is the most essential arterial street in Chennai, India. It starts offevolved at the Cooum Creek, south of Fort St George connecting with St. Thomas Mount in Saidapet. This 15 km stretch of street jogging diagonal throughout the town has turn out to be the hub of commercial enterprise for the city. It has been growing in a massive pace inside the past century. The British developed this street during the colonial era, and that they named it as Mount Road, after Little Mount, till which the road extends. Later on, the street turned into renamed as Anna Salai by using ex – Chief Minister of Tamil Nadu. The phrase ‘Salai’ in Tamil translates to street in English. Anna Salai is maintained via the National Highways Authority of India. This is the most effective street in Chennai in which lane machine of visitors is observed.
Needless to mention, anywhere from India, you have access to Chennai thru air, roads and railway. If you’re reaching Chennai via bus, please get down at Chennai Mofussil Bus Terminus (CMBT), Koyambedu and from there, please select up a bus for “Anna Salai urf Mount Road and ask all of us approximately the Dargah and they may guide you nicely.
Allah and Rasool Allah Aal lalahu Alaihi wa Sallam aap ki har mushkil dhoor kare. Ameen. Ap ki har jayes tamana puri kare. Ameen. Ap ki and Ap ke Ghar walon ki hayati ki darasi karne. Ameen. Ap aur Ghar walon ke upar tah qayamat tak Auliya Allah and Burzugan-e-deen ka saaya rahe. Ameen. Ap ko Ghar walon ko deen aur duniya me kamiyabee hasil kare. Ameen. Ya Rabbal ‘Alameen.
Allah humma Salle ‘ala Syedina wo Maulana wo Rahati Qulubina wo Shafiya Zoonubina wo Tabeeba Zaheranana wo Batina Mohammedin wo ‘Ala Alihi wo Ashabi wo Auliyahi wo Ummatihi bi Rahmatika Ya Ar-rahman nir Raheem wal Hamdullilahi Rabbil ‘Alameen.
Allah aur Rasul-e-Kareem, Sal-lal-lahu Alaihi Wa Sallam aur Hazrath Syed Moosa Shah Qadri Baghdadi (Rahmathullahi Alaihi) may additionally do khass Nazar e Karam on you and your own family and the one that you love ones. Ameen. Ya Rabbil Alameen.
Wassalam, Fee Amanillah
Ghulam-e-Khalwathu Nayahangal (RA) Thaikka Shareef,
Cumbum Shareef
Ahamed Sayeedul Khalwathi Sayeedi
Email – ahamed.Kalwathi@gmail.Com
Even in india there are two daghas of suhabi e Rasool. One in Kovallam 30 kms from chennai, Hazrath Tameen Ansari (ra) and one extra in Ferangipet (parengipettai) approximately forty kms south to Pondicherry, Hazrath Ukkasha (ra) who kissed Meher e Naboowat and this small town include eight mosque and approximately a thousand darghas of various sufis from one of a kind eras.
—————————————————————————
Ashiq-e-Mehboob-e-Subhani (Rali), Qutb-e-Qalandhar of his time, Hazarath Kunangudi Masthan Saheb’s (Raliyallahu Thaala Anhu Va Rahimahu) Mazar-e-Mubarak is positioned in Royapuram, Madras, Tamilnadu.
Hazarath Kunangudi Masthan Sahib (Rali) had the private love for Qutb-ul-Aqtab, Hazarath Ghous-e-Pak (Rali). He has sung so many songs on Allahu Jalla Jalaluhu Thaala, Rasul-e-Kareem Sallallahu Alaihi Va Sallam and on Hazarath Ghous-e-Pak (Rali). Every phrase in those songs is an ocean of Irfan.
What a lay-man will understand by using reading the above traces. That’s the peak of love, Hazarath Kunangudi Masthan Sahib (Rali) had in the direction of Parwar Digaar-E-Alam, Allahu Jalla Jalaluhu Thaala.
Mazar-e-Mubarak of Hazrath Qadir Masthan (RA),
the cherished husband of Madhar Bibi_(RA)
He decreased his Nafs in that manner. He used to mention – there’s no sinner within the world but I’m the greatest sinner. He says – “Our frame is septic tank” which our lavatories are linked to. In all of the feasible approaches, he had lowered himself in front of ALLAH, Rasul-e-Kareem, Sallallahu Alaihi Va Sallam and Ghous-e-Pak (Rali) that no one can do.
SubhanALLAH. I can’t specific his Darajah/Makham/Heights he accomplished in Wilyath. So many Awliyah-ALLAH used to move very inner most in the jungle and attempted to meet Hazarath Kunangudi Masthan Sahib (Rali) to convey salam and on the way, many Awliyahs died as properly. Hazarath Kunangudi Masthan Sahib (Rali) used to be in thorns in Zikr status. He did not marry because of the love He (rali) had towards Mahboob-e-Subhani (Rali)
Hazarath Kunangudi Masthan Sahib (Rali) requested ALLAH to cover his Makham and want to be faraway from Dhuniya even after his Pardha. Very few might also guide you whilst you visit his Dargah in Royapuram, Madras.
Mazar-e-Mubarak of Hazrath Madhar Bibi (RA), the beloved Khadim
of Hazrath Kunangudi Masthan Saheb (RA)
It’s a very very quite simple Mazar-e-Mubarak however Hazarath Kunangudi Masthan Sahib (Rali) is the Qutb-e-Qalandhar of his time surely. He got Baiyath without delay from Ghous-e-Pak (rali). He (rali) used to call Ghous-e-Pak (rali) as Kunangudi (that means – the only where good person remains ) so Ghous-e-Pak (rali) stored the equal call to him (rali) even as giving Baiyath.
His height of Wilayath is the best of the best of the highest of the………………………………………….Go without end…SubhanALLAH…I will talk for years approximately Hazarath Kunangudi Masthan Sahib (Rali).
Everest is a tiny particle in front of the affection Hazarath Kunangudi Masthan Sahib (Rali) had towards Ghous-e-Pak (Rali). He says to Ghous-e-Pak (Rali)
“You will manage crores of Dhuniya (which ALLAH has created) to your hand as ball and play with it”
“You will shake the 7 Dhuniyas (Which ALLAH has created) and play with them on youn hand”
Mazar-e-Mubarak of Hazrath Ibrahim Saheb (RA), who didn’t communicate after
Hazrath Kunangudi Masthan (RA) puzzled him
whether he could speak or not.
“You will stitch Dhniya/Aahirath into an Atom and play with it”
“You will insert the 7 seas into a mustard and stir them”
“Please are available in front of this Ghulam ”
“I am turning into the worst and worst even after I publish myself on your holy feets”
“You’re the Badhusha and my Peer-o-Murshid, in whom good man or woman (kunangudi) stays”
Mazar-e-Mubarak of Hazrath Sheikh Abdul
Qadir Urf Pulavar Nayagangal (RA)
Hazarath (Rali) used no longer to put on any dress but used to shut his hygienic part by myself. He used to stay in the inner most/dreadful jungle vicinity in which even Animals will worry to stay. Thorns are his homes where he (rali) used to be in Zikr status. Qutb of Qutbs in his lifetime. World No.1 lover of Ghous-e-Pak (Rali)
Ceremonies discovered all through Urs/Sandhal
Mubarak of Hazrath Kunangudi Masthan Saheb (RA)
Raising Nishan-e-Pak – twenty ninth of Rabi-ul-Sani
Sandhal Mubarak – thirteenth of Jamadh-ul-Awwal
Urs Mubarak – 14th of Jamadhu-ul-Awwal
Dropping Nishan-e-Pak – 26th of Jamadh-ul-Awwal
Name board in front of the
Mazar-e-Mubarak_of Hazrath Madhar Bibi (RA) and
Hazrath Qadir Masthan (RA)
About Royapuram:- A locality of Chennai, South India, it is the area in which the primary railway station of south India become built, and from in which the laying down of the second railway line of the South Asia commenced in 1850s. This railway line extended from Royapuram (Madras) to Arcot, then capital of the Carnatic place. This railway line became opened for site visitors on July 1, 1856.
Bus Route to Royapuram in Chennai : 1, 4B, 4D, 6, 6A, 6C, 6D, 8A, 31, 56H and 56N. Please get down at Royapuram Market and ask for the Dargah from muslim people and they may manual you, Insha ALLAH
Wassalam, Fee Amanillah
Khadim-e-Khalwathu Nayahangal Thaikka (Dargah) Shareef,
Cumbum Shareef
Ahamed Sayeedul Khalwathi Sayeedi,
Email – ahamed.Kalwathi@gmail.Com,
kalwathi@yahoo.Co.In
City/Town : Chennai
District : Chennai
State : Tamil Nadu
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Bismillah ir-Rahman ir-Raheem.
Mu’Avvidhan Mu’Basmilan Mu’hamdhilan Mu’Salliyan-va-Mu’Sallima
Raleena Billahi Rabban-va-bil Islami Dheenan, Va Bi Mohammadhin Sal-lal-lahu Alaihi Va Aalihi Va Sahbihi Va Sallam, Nabiyyan Va Rasulah, Va Bi Muhyiddeeni Abdul Qadir Jeelani Raliyallahu Tha’ala Anhu, Sheikhan Va Murshidha.
Dargah-e-Hazrath Khwaja Syed Ghulam Dastaghir (Rahmathullahi Alaihi) Urf Hazrath Moti Baba (Rahmathullahi Alaihi)
Location : Murthuza Sheriff, Pantheon Road, Egmore, Chennai- 625008, Tel : 0091 forty four- 28192025.”
It is popularly called ‘Moti Baba (RA) Dargah’ and is one of the most critical Dargah shareef in Chennai. Hazrath Moti Baba (RA) finished extra heights in Wilayath and did his satisfactory for the upliftment of mankind.
Hazrath Moti Baba (RA) become an Ashiq (loved lover) of Qutb-e-Tamilnadu, Nagoor Badusha, Hazrath Meeran Saheb Abdul Qadir Shahul Hamid Urf Qadir Wali. He got here to Chennai from Nagapattinam & lived with Janab H. A. G. Dastagir Sheriff & Family at 422, Pantheon, Road, Egmore , Chennai- 8. Hazrath Moti Baba (RA) wisal (Pardha) took place inside the identical area on 02nd July 1959.
Zikr Majlis and Moulud Shareef are conducted on every Thursday & Sunday within the Dargah shareef after Maghrib prayer.
Urs/Sandhal Mubarak of Hazrath Moti Baba (RA) is well known throughout Hijri Era Zul-Haj month twenty fifth & 26th each 12 months.
Chennai Egmore is a railway station in Egmore, Chennai, South India. The station acts as the arrival and departure factor for trains connecting Chennai and southern, principal Tamil Nadu and Kerala.This is one of the principal railway terminals inside the metropolis along side Chennai Central, which serves the north and west bound trains from the city. However, a few trains to the north-east and jap parts of the country also start from/skip via here, even though the quantity is a great deal fewer than those from Chennai Central. The Chennai Beach-Tambaram suburban railway line additionally passes via the station. The building of the railway station with decorative domes is one of the distinguished landmarks of Chennai. This station is thought in Tamil as Ezhumbur.Over 80% of the trains starting from Chennai Egmore station bypass thru Trichy at distinctive instances.
If you’re attaining Chennai thru bus, please get down at Chennai Mofussil Bus Terminus (CMBT), Koyambedu and from there, please pick up a bus for Egmore and ask any muslim you notice on the street approximately the Dargah and they may guide you, Insha ALLAH. In addition to that, Triplicane, Mount road and Egmore are located very close by. Thus, you can reach Egmore after completing your Ziyarath from Dargahs of Mount Road and Triplicane.
Allah aur Rasul-e-Kareem, Sal-lal-lahu Alaihi Wa Sallam aur Sahab-e-Rasool Sallalahu Alaihi wa Sallam aur Qutb-ul-Aqtab, Piran-e-Peer, Hazrath Ghous-e-Pak (RA) aur Hazrath Khwaja Syed Ghulam Dastaghir (RA) Urf Hazrath Moti Baba (RA) can also do Khass Nazar e Karam on you and your circle of relatives and your beloved ones. Ameen. Ya Rabbil Alameen.
Popularly known as ‘Moti Baba Darga’ This is the final resting area of Muslim Saint Hazrat Khaja Gulam Dastagir Moti Baba. His Tile is Qutub- E – Aqtab .It is one of the maximum essential durgahs in Chennai. Moti Baba became a chum of Hazrath Kader Wali of Nagore. He got here to Chennai from Nagapattinam & lived with Janab H. A. G. Dastagir Sheriff & Family at 422, Pantheon, Road, Egmore , Chennai- 8. He breathed his last in same place in 1959. Saint of super spiritual heights he did his fine for the upliftment of mankind. His anniversary of Kandoori Urs (called ‘Sandana Koodu’) is celebrated throughout Hijra Era Dul-Haj month 25th & 26th every year.
Special prayers are hung on each Thursday & Sundays in the Dargah at 7 PM.
Location : Murthuza Sheriff, Pantheon Road, Egmore, Chennai- 625008, Tel : 0091 44- 28192025.”
Wassalam, Fee Amanillah,
Ghulam-e-Khalwathu Nayahangal (RA) Thaikka Shareef,
Cumbum Shareef
Ahamed Sayeedul Khalwathi Sayeedi
About Chennai:- Chennai, formerly called Madras, is the capital of the Indian state of Tamil Nadu. Located on the Coromandel Coast of the Bay of Bengal, Chennai has an anticipated populace of 7.Five million (2007), making it the fourth largest metropolitan city in India. The call Chennai is an eponym, etymologically derived from Chennapattinam or Chennapattanam, the name of the city that grew up around Fort St. George, built via the British in 1640. There are one-of-a-kind versions about the starting place of the call.
The town was set up inside the seventeenth century by means of the British, who evolved it into a first-rate city centre and naval base. By the 20 th century, it had grow to be an essential administrative centre, as the capital of the Madras Presidency. The metropolis changed into formally renamed Chennai in 1996, about the same time that many Indian cities were undergoing call modifications due to the fact Madras become seen as a Portuguese name.
Bus offerings to Chennai: – Needless to mention, everywhere from India, you have got get entry to to Chennai thru air, roads and railway. If you’re accomplishing Chennai thru bus, please get down at Chennai Mofussil Bus Terminus (CMBT), Koyambedu. This is the Asia’s Biggest Bus Terminus and the biggest Bus Station in Chennai spread over a place of 37 acre. From CMBT, you could avail bus offerings to any elements of the town.
It’s recommended to start your Ziyarath on this order – Mount Road Dargah, Triplicane Dargah, Egmore Dargah, Royapuram Dargah and Kovalam Shareef.
HAZRATH KHAJA GULAM DASTAGIR MOTI BABA ( QUTUB-UL- AQTAB) RA
twenty ninth Nov – Nishan ( Flag Hosting ) at eight.30 PM
The flag could be hosted on the Dargah at Egmore, Chennai.
Twenty fourth December 2008 – SANDAL FUNCTION
Sandal will start with Kismat at 3 PM afternoon via washing the Mazar -e- Noor with with Rose water.
At round 10 PM that night time a Grand Procession will begin from Dargah Shariff at Egmore, Chennai with Decorated Mehendi in which the Sandalwood silver Pot is stored with Bands & firework.
After the go back of procession to Dargah the Sandal can be Anointed at the Maazar at round 3 AM.
ON twenty fifth December 2008 -URS
There can be Maulood at Dargah observed by means of Tamil & Urdu Qwalli.
Every year very famous Urdu Qwalli is Held at Dargah on the URS day.

what is hadith importance of hadith

what is hadith importance of hadith Hadees (hadiths), as a consequence, is a comprehensive word. It stands for the creative coaching and the modern sports of Prophet Muhammad (peace be upon him). The fundamental types of Hadees are as follows:
(1) The narration of all the ones affectionate phrases that the Holy Prophet (peace be upon him) uttered every so often;
(2) The series of unique instructions and advises which he presented for the guidance of mankind;
(3) The statements of all those noble deeds that he achieved within the presence of his partners and fans;
(four) Other info of his non-public lifestyles as witnessed and said by the individuals of his noble family, and so forth.,
FOUNDATION OF WISDOM AND GUIDANCE
Prophet Muhammad (peace be upon him) become born in 571 AD in Mecca, the renowned town of Saudi Arabia. He died in 632 AD in Medina, some other famed city of the same country. Allah Almighty conferred Prophethood on him thirteen years before the commencement of the Islamic calendar

He was forty then. The duration of Prophethood lasted 23 years. It began on thirteen earlier than A.H. And resulted in 11. AH, the 12 months of his dying.

The ultimate 23 years of his lifestyles, i.E. From 13 before A.H. To eleven A.H., are counted as an excellent generation within the records of mankind. During these memorable years Prophet Muhammad (peace be upon him) persisted spreading Islam,

the religion of peace and development. He uttered a large number of moving phrases for the steerage of humanity. He additionally carried out an expansion of pious deeds. Those words of advice and people deeds of righteousness stand out as a candy basis of practical expertise and optimistic steering for all mankind. Hadees, the recorded version of his sensible phrases and noble deeds, is a stimulating examine for all mankind.

A baby, keen to forge ahead in life, need to familiarize himself with the essence and cause of Hadees.
MUHAMMAD (PEACE BE UPON HIM) INSPIRES ENTIRE MANKIND
Whenever Prophet Muhammad (peace be upon him) uttered a word of steering his companions hastened to dedicate the same to memory. Those who knew the artwork of writing used to place the same in black and white. Then anywhere those top-natured people went they talked about the ones wise sayings for the benefit of others. The Prophet’s (peace be upon him) understanding accordingly saved on spreading some distance and wide. It went on reforming humanity’s idea and conduct.
After the death of the Prophet (peace be upon him) his partners and fans persevered the sacred mission of people’s education and steerage. They carried the torch of wisdom and righteousness to the adjoining lands. Wherever they went they enlightened people at the Islamic way of lifestyles.

This new way of life has been mentioned in the Holy Quran. It became without a doubt practiced by means of the Holy Prophet (peace be upon him).
The maximum super factor turned into reached when the Muslims entered Spain. There they established faculties, schools, universities and libraries. Their cultural hobbies and social sports furnished nourishing food for concept to complete Europe. The Islamic way of lifestyles started out to be understood in the West as well. More and extra human beings began to realize the meaning and motive of Prophet’s (peace be upon him) progressive message. It began to result in a optimistic converting all sectors off their life. A time soon got here while the Islamic manner of existence became famous with the people of the East in addition to the West. The present day international owes plenty of its beauty and betterment to the teachings of Muhammad (peace be upon him) and the humanitarian services of his fans.
EARLIEST HADEES COLLECTIONS
The work of amassing Prophet’s sayings and recording the same systematically had started at the same time as the Prophet was alive. Some of his partners had prepared Hadees collections of varying sizes. Of these early collections the one prepared by using Hazrat Abdullah bin Amr bin Al-Aas (may additionally Allah be thrilled with him) is very famous. This collection is known as Sadiqah. It contains one thousand sayings of the Prophet (peace be upon him)
There are other collections besides the one stated above which had been also prepared at some stage in the Prophet’s (peace be upon him) lifetime. They were complied by means of his illustrious partners like Hazrat Ali, Hazrat Anas, Hazrat Abdullah bin Masud, Hazrat Abu Hurairah and Hazrat Saad bin Abbad (may additionally Allah be thrilled with them).
DEVELOPMENTS DURING EARLY CALIPHATE
After the dying of Prophet (peace be upon him) Muhammad the high-quality caliphs kept on popularizing his teachings many of the humans. The four early caliphs, who’re in particular known for this valuable service to humanity are: (1) Hazrat Abu Bakar Al-Siddique, (2) Hazrat Umar Al-Farooq, (three) Hazrat Uthman Al-Ghani and (four) Hazrat Ali Al-Murtuza (might also Allah be pleased with them). These eminent statesmen are also known as the Rightly Guided Caliphs. Their period is called the age of Early Caliphate.
A quantity of Hadees collections have been prepared throughout the times of the early Caliphs. Of these the only complied by using Hazrat Abu Bakar Al-Siddique is very widely known. It includes 500 Traditions. Besides, Hazrat Imam Hassan, Hazrat Abu Musa Ashaari and Hazrat Abdullah bin Abbas (may additionally Allah be pleased with them) also complied unique Hadees collections at extraordinary instances.
A HISTORIC SERVICE TO HUMANITY
With the quit of the Early Caliphate, began the generation of the Ummayyads. Umar bin Abdul Aziz (might also Allah be pleased with him) changed into the eighth Umayyad caliph. It changed into for the duration of his rule that the assignment of amassing all the Traditions in one location and publishing them inside the form of a complete ebook started out on a huge scale. His rule began in 99 A.H.wazifa for Security of the Home

And led to one zero one A.H. During this period the Muslim empire elevated pretty. It included countries like Spain, Algeria, Morocco, Tunis, Egypt, Syria, Palestine, Iraq, Saudi Arabia, Yemen, Kuwait, Bahrain, Jordan, Asia Minor, Iran, Afghanistan and even northwestern parts of India. Hadees literature turned into in splendid call for in some of these location. Caliph Umar bin Abdul Aziz felt that there has been a chance of the loss of a number of Traditions in case the ones have been now not recorded in writing. He, consequently, issued instant instructions to all of his governors and scholar that each one available Traditions be recorded carefully. They were also ordered to ship the identical to C, which became the federal capital of the Umayyad Empire at that time.
The enthusiasm, precaution and orderliness, which the Caliph displayed in undertaking this important project, are unheard of. In considered one of his royal decrees he ordered: “Whatever Tradition of the Holy Prophet (peace be upon him) you could come upon must be recorded after right scrutiny, as I fear the loss of know-how and the demise of the scholars. But watch out! Never take delivery of any pronouncing aside from that of the Holy Prophet nor report the same.”THE STATE OF THE BODY OF MAN
Damascus became soon flooded with large collections of Prophet’s (peace be upon him) Traditions. The Caliph placed them all in writing after similarly scrutiny .In this way the one-of-a-kind Hadees collection had been added together in one place for the first time in Islamic records. This all-inclusive series then because a fashionable source of steerage and reference. The Caliph got several copies of the identical prepared below his private supervision. One reproduction became placed within the imperative mosque of every most important town of the good sized empire. Consequently the recorder bills of the pronouncing and the deeds of Prophet Muhammad (peace be upon him) got here inside smooth hundreds.
IMAM MALIK’S DECORATED FLOWER VASE
The character next after Caliph Umar bin Abdul Aziz, who enjoys the recognition of systematic collection of Prophet’s (peace be upon him) Traditions and their mass circulation, is Abu Abdullah Malik bin Anas (may additionally Allah be pleased with them). His brief name is Imam Malik. He became a super scholar. Born in Medina in ninety three A.H., he died in 179 A.H. At the age of 86.
Imam Malik lectured on Hadees for 62 years. His famous e-book on the subject is known as Muatta, this means that the embellished. This brilliant book provides Prophet’s Traditions in a tastefully adorned and carefully organized manner. Indeed, the style and the presentation are so fascinating that the e-book honestly like a decorated flower vase. The Imam finished it in one hundred forty A.H. Muatta consists of 1,720 Traditions. It is the primary tremendously organized series of Traditions. The e book is widely valued all around the world.
THE MUSNAD OF IMAM HAMBAL
After Muatta, eminent scholars produced several other collections. Among those later publications Musnad enjoys the biggest reputation. It become prepared by means of Imam Ahmad bin Hambal (may also Allah be thrilled with him). He is referred to as Imam Hambal. The e book consists of 30,000 Traditions.
Imam Hambal become born in 164 A.H. In Baghdad, the famed capital city of Iraq. He died inside the same metropolis in 241 A.H. Imam Hambal became unusually sensible thoroughly pious and a reputed student.
THE SIX SOUND BOOKS
After the booklet of Muatta and Musnad a number of different Hadees collections also appeared at distinct instances. The six such collections, which gained uncommon reputation, are referred to as Sahih Sitta, which means that ‘the six sound books.’ These collections are: –
(1) Sahih Bukhari,
(2) Sahih Muslim,
(three) Jame Tirmizi,
(4) Sunan-e-Abu Daud,
(five) Sunan-e-Nasaaee, and
(6) Sunan-e-Ibn-e-Majah.
1. Sahih Bukhari: The compiler of this famous collection is the eminent pupil, Imam Muhammad bin Ismaeel bin Ibrahim bin Muizz. He is popularly known as Imam Bukhari. He become born in 194 A.H. In Bukhari, the famed city of Iran. He died in 256 A.H. On the age of sixty two.
Sahih Bukhari is also referred to as Bukhari. Imam Bukhari worked over the ebook for 16 years constantly. He eventually decided on 7,275 Traditions for inclusion in is collection. Sahih Bukhari has continually been taken into consideration because the consider-worthiest ebook on Hadees.
(2) Sahih Muslim: Next to Sahih Bukhari the authoritative e-book on Hadees is Sahih Muslim. Its short name is Muslim. Its compiler is Imam Muslim bin Hajjal Al-Qushairi Al-Neishapuri. He is likewise referred to as Imam Muslim. He turned into born spherical about 204 A.H. In Neishapuri, a famous city in Iran. He died in 261 A.H. His series became finalized after a prolonged research of 15 years. It consists of 12,000 Traditions.
Bukhari and Muslim, combined together, are referred to as ‘Sahihain’, this means that ‘two dependable books’. Similarly, Imam Bukhari and Imam Muslim are referred together as ‘Shaikhain’, meaning two notable spiritual scholars. A Tradition, that is common in Bukhari and Muslim, is named as ‘Muttafaqun Alaih’. It method a Hadees that’s agreed upon’ with the aid of Imam Bukhari as well as Imam Muslim. Such as agreed upon Tradition is taken into consideration to be maximum sincere.
(three) Jame Tirmizi: The 1/3 famed Hadees book inside the Sahih Sitta series is the Jame Tirmizi. Its compiler is Imam Abu Isa Muhammad bin Isa, also known as Imam Tirmizi. He was properly- known disciple of Imam Bukhari. He changed into born in 209 A.H in Tirmizi, a famous city in Iran. He died within the same metropolis in 279 A.H Jame Tirmizi includes 2,028 Traditions. Muslim students have excellent regard for this treasured source of a outstanding a top notch expertise.
(four) Sunan-e- Abu Daud: The fourth ebook in this famous collection is referred to as Sunan-e-Daud. The name of the compiler is Abu Daud Sulaiman bin Abbas. He is also referred to as Imam Abu Daud. He become born in 202 A.H. In Sajistan, a place near Qandhar in Afghanistan. He died in 275 A.H. On the age of 73. Sunan Abu Daud consists of four,800 Traditions.
(five) Sunan-e-Nasaaee: This is the fifth well-known collection in the same series. Imam Abu Abdur Rahman Ahmad bin Shuaib Nasaaee is its compiler. His brief call is Imam Nasaaee. He become born in 215 A.H. In Niasaaee, a famed metropolis of Iran. He died in 303 A.H. His e-book incorporates five,seventy one Traditions.
(6) Sunan-e-Ibn Majah: The ultimate a number of the six sound books is the Sunan-e-Ibn Majah. Imam Abu Abdullah Muhammad Ibn Yazeed Ibn-e-Majah compiled it. He is also referred to as Imam Ibn Majah. He changed into born in 209 A.H. In Qazveen, a town in Iran. He died in 273 A.H., after attaining the age of 64. His compilation incorporates 4,000 Traditions.
OTHER FAMOUS HADEES COMPILATIONS
In addition to those famed Hadees collections a massive range of different compilations have additionally been posted on occasion. Of those the three widely recognized ones, numerous Traditions out of which have been mentioned in the present book, are as follows:
(1) Sunan-e-Darimi,
(2) Sunan-e-Baihaqi,
(three) Miskat-ul-Masabih.
(1) Sunan-e-Darimi: Its compiler is Imam Abu Muhammad Abdullah bin Abdur Rehman Al-Darimi. He is also known as Imam Darimi. He changed into born in 181 A.H. In Samarqand, the famed city of Russia. He died in 225 A.H. He enjoys brilliant reputation for his sound individual and widespread information. His collection contains three,550 Traditions.
(2) Sunan-e-Baihaqi: This collection turned into compiled through Imam Abu Bakr Ahmad bin Al-Hussain Al-Baihaqi. He turned into born in 384 A.H. In Baihaq, a village near Neishapuri in Iran. He died in 458 A.H. Imam Baihaqi become too fond of manufacturing sound non secular literature. He is writer of approximately 1000 general books and scholarly papers.
(3) Mishkat-ul-Masabih: Its compiler is Imam Walli-ud-Din Abu Abdullah bin Abdullah Al-Khateeb At-Tabrizi, also known as Imam Tirmizi. He ranks as one of the most eminent Hadees scholars of the eighth century A.H. Khateeb Tirmizi turned into born in 421 A.H. In Tabriz, the famous metropolis of Iran. The date of his loss of life is 502 A.H.
Mishkat-ul-Masabih includes 5,945 Traditions. The collection may be very comprehensive and dependable. At the moment it ranks because the maximum popular e book on Hadees. Of all the works on Hadees this series has been consulted most regularly in the instruction of the prevailing e-book.
Short Biography of Imam al- Bukhari(rah)
IMAM Abu Abdullah Muhammad bin Ismaeel bin al-Mughirah al-Bukhari become born on thirteenth of Shawwal 194 AH in Bukhara. A town inside the japanese a part of Turkestan.
His father died while he turned into nevertheless in his infancy and his upbringing turned into left entirely to his mom, who taken care of his fitness and training very carefully and spared nothing so one can offer him with the excellent schooling.
Quite early in life, Imam Bukhari’s intellectual features have become major. He had top notch piety and an splendid reminiscence and devotion to mastering. It is stated that while he changed into nevertheless in his young adults he knew by way of coronary heart seventy thousand Sayings of the Holy Prophet Muhammad.
At the age of sixteen, he went to Macca together with his mother and loved his live inside the Holy City so much that he decided to lengthen his visit so as to enjoy the enterprise of the awesome Muslim scholars who were usually to be observed there. At the age of eighteen, he wrote his first ebook with regards to the Prophet’s Companions and their immediate successors, and later a e book on history known as “Al-Tarikh-al-Kabir”.
Imam Bukhari was very inquisitive about records and the Ahadith (sayings of the Prophet). He sought the company of excellent students so that it will research and discuss the Ahadith of the Holy Prophet. He visited numerous countries, journeying to Damascus, Cairo, Baghdad, Basra. Mecca, Medina and so on. During his live in Baghdad, he frequently held discussions with the Imam Ahmed Hanbal, the founder of the Hanbali school of law.
During these kinds of travels, Imam Bukhari had one aim: to accumulate as plenty knowledge as feasible and to make the greatest feasible collection of the Traditions of the Holy Prophet. He wrote profusely all the time. He as soon as said that, “l have written about 1800 folks, every of whom had a Saying of the Prophet, and I even have written best about those who have passed my check of truthfulness.”
The Imam possessed one of the most terrific memories, and his contribution to the technology of the Ahadith stays unequalled. He wrote numerous books on Ahadith but in his ebook: “Al-Jami-al-Sahih’: the Imam had recorded all of the Sayings of the Prophet which he found to be proper after thorough exam and scrutiny. He spent 16 years in research and examined extra than sixty thousand Sayings from which he selected some 7,275 Sayings whose genuineness and accuracy he established beyond the slightest doubt. Deducting duplicates, the Imam’s series incorporate about 4 thousand wonderful Sayings.
Imam Bukhari was extremely charitable in his feedback and evaluations about men and scholars. Seldom did he brand the reporter of a false or faulty Hadith as a liar or forger, however sincerely referred to as him “untrustworthy”.The night worship of Hadhrat ‘Uthman
His reputation stimulated jealousy inside the hearts of reactionary Ulema of his time and he was banished from the land of his start by using the Governor of Bukhara as a result of intrigues towards him.
Writings and Other Compilations
Imam Bukhari wrote many kitaabs besides Bukhari Shareef (Al Jamius Sahih). Hereunder are a few books written by means of Imam Bukhari
1. Al Aadaabul Mufrad
2. Juz – Raf-e-Yadain
3. Juz – Qiraat-Kalful-Imam
four. At-Taareekh-Al Kabeer – Al Awsat-As Sageer
five. Kitabul Ashribah
6. Kitabul Hibah
7. Mabsoot
eight. Kitabul Ilal
9. Kitabul Wuhdaan
10. Af’aalul Ibaad
eleven. Al-Aadabul-Mufrad
Imam Bukhari died on 1 Shawwal 256 AH. At the age of 62 years in a small city close to Samarkand, Tadzhikistan
May Allah Have Mercy on his Soul
Motivating elements of compiling Sahih Bukhari
There had been many books written on hadith but there have been combos of Sahih and Daeef ahadith. Imam Bukhari felt that there must be a compilation of most effective Sahih ahadith. Once whilst sitting inside the accumulating of Ishaaq ibn Raahwai he (Ishaq) expressed his want that a e-book of Sahih ahadith be compiled, while he heard this, his feeling of compiling such a ebook became bolstered and this become later consolidated with a dream wherein he (Imam Bukhari) saw a dream that he turned into waving away flies from Rasulullah (sallallahu alaihi wasallam) with a fan. The dream become interpretated as Imam Bukhari will sift out the fabricated Ahadith form the true Ahadith.
The dominant purpose of compiling Bukhari Shareef from the motivating elements was to assemble and gather handiest Sahih ahadith. Apart from that, Imam Bukhari designed and brightened his e book with other elements as properly, for eg., he would deduce fiqhi factors from the hadith, he would express the authenticity of the hadith by way of offering another sanad (chain of narrators). He also explains the that means of many ahadith and many others. It is due to the above elements that the hadith in Bukhari Shareef are not in a subject or topic sequence. However, Imam Muslim has organized and compiled his e book in keeping with a subject series.
2. Specialities of Bukhari Shareef
1. It is the first e-book compiled only on sahih ahadith.
2. It took the writer sixteen years to compile his book. The tarajims (subjects) have been organized on the rowda mubarak.
Three. Abu Zaid Mirwazi Shafi, who was a very fond shafi turned into drowsing in the mataaf location whilst he made ziyarat of Rasulullah (sallallahu alaihi waallam) who asked him, why do you now not make studies and read my book. Abu Zaid requested: “Oh prophet of Allah that is your e book?” Rasulullah (sallallahu alaihi wasallam) responded the e book of Muhammad ibn Ismail ie. Bukhari Shareef.
4. When study at the time of difficulties and hardships, matters are made smooth.
When examine in a boat it does now not sink.
5. There are 22 Sulusiyyaats in Bukhari Shareef. However Darami has greater sulusiyyaats than Bukhari Shareef.
3. Conditions of Choosing a Hadith
Muhammad Maqdasi says that the conditions of choosing a hadith in Bukhari Shareef aren’t stated by means of the writer himself. The muhadditheen have contemplated and studied the book and deduced those conditions, presuming they were the criteria set out by using the author. Tahir Maqdasi says that the situations of choosing a hadith in Bukhari Shareef are:
1. The narrator is unanimously realiable. Here a question may also arise as to why is there discussions on the reliability and authenticity of many narrators in Bukhari Shareef. Ibn Humam has spoke back this that certifying a narrator as dependable or unreliable isn’t absolute (qat’ie). A muhaddith certifies in keeping with his knowledge and studies.
2. The chain of narrators should be an unbroken one (itti’saal – see page 5).
Three. If narrators narrate from each narrator it’s miles higher however not a situation.
4. Haakim, writer of Mustadrak says it is a condition of Bukhari Shareef that there constantly be two narrators from a narrator. This isn’t always correct. The first and last hadith indicates that even narrations with one narrator is frequent. In truth, there are about two hundred such ahadith in Bukhari Shareef. Ziya Maqdasi has prepared a book Galaaibus Sahihain on this remember.
Hereunder is a more clear explanation as to what type of narrators are chosen by Imam Bukhari.
Imam Zuhri has 5 categories of college students:
1. Very realiable in memory and authenticity and continually or for a completely long time stayed within the employer of Imam Zuhri.
2. Also very realiable but stayed lesser than the primary organization.
3. Stayed with Zuhri however have been criticized by means of some.
Four. Did no longer stay with Zuhri and had been criticized by way of some.
Five. Weak and unknown narrators.
Imam Bukhari took narrators of the primary class, seldom could he take from the second category. Imam Muslim might take from the third cateory as properly.
Abu Dawood and Nasai might take from the 0.33 class.
Tirmizi from the fourth category, Tirmizi is more superior to Abu Dawood due to the fact he discusses the purpose a hadith is vulnerable, etc.
Imam Abu Dawood makes use of the 5th class to help and consolidate. (Read after the section on itti’saal.)
A question arises that if in step with Imam Bukhari, the chain of narrators must be an unbroken one, why are there ahadith-e-muanan (hadith with an-an).
According to Imam Bukhari for a hadith muanan to be beneath the class of unbroken chain of narrators, the narrator and from whom he is narrating have to be contemporaries and have to meet at the least as soon as.
In order to in reality recognize the above, the subsequent ought to be understood:
The narrator and from whom he is narrating, if they’re no longer contemporaries, this kind of narration is known as as Irsaale Jali.
If they are contemporaries but they did no longer meet, that is called Irsaale Khafi.
If they may be contemporaries, met however narrates some thing he did now not hear, this is Tadlees.
According to Imam Bukhari, the two ought to meet at the least as soon as. According to Muslim, merely being contemporaries is sufficient. Imam Bukhari views this as a opportunity of being Irsaal, as a result the narration will no longer be of an unbroken chain (muttasal).
One may additionally increase an objection that consistent with Imam Bukhari, meeting as soon as is sufficient, however nevertheless there may be a opportunity of non-narration. The answer is that we are discussing approximately a narrator who does not practice Tadlees. A mudallis’s narration isn’t always muttasil, for this reason disqualifies from being conventional.
In the light of the above discussion, it’s miles clean that Bukhari shareef is greater superior to Muslim or any other e book on hadith. Dare Qutni says:
The declaration of Abu Ali Nishapuri: “There is not any different kitaab at the floor of this earth extra sahih than Muslim Shareef,” is antagonistic via Nishapuri’s Ustaad, Imam Nasai, who stated there may be no higher e-book than Bukhari Shareef.
However, it ought to be cited that the superiority of Bukhari Shareef over Muslim Shareef and other books of ahadith is on a standard basis, not that every hadith of Bukhari Shareef is greater superior to any hadith in some other e-book of hadith.
4. The Topics (Taraajim) of Bukhari Shareef
1. Sometimes the cause of Imam Bukhari isn’t literal. He says something and method isharatun-nas or dalatun-nas.
2. Imam Bukhari does not repeat a subject, in that case the cause is one of a kind.
Three. Generally the subject is sort of a claim and the ahadith comply with it as evidence, but usually, he manner to explain the that means of the following hadith.
Four. A tarjuma now and again has two meanings, clean and uncertain. People suppose and expect the clear meaning, for this reason they revel in trouble in reconciling the subject with the hadith, whereas the uncertain meaning is the cause of Imam Bukhari.
5. Sometimes there may be no link among the topic and hadith quoted underneath it, but the hadith with that link is close by, if no longer similarly in the kitaab, or maybe it isn’t always in Bukhari Shareef, because it does no longer conform with the conditions of Bukhari Shareef.
6. Sometimes with the topic, Imam Bukhari costs sayings of sahaba and tabi’een (radhiallahu anhum), however the ones sayings haven’t any direct relevance.
7. Sometimes there is a baab but no hadith under the baab. The purpose for that is that the hadith is somewhat associated with the previous baab, similar to the fasal of the fuqaha. Imam Bukhari’s motive is likewise probable to sharpen the mind, that one ponders within the hadith and deduce a few valid point.
Eight. Sometimes there is a tarjama but no hadith under it. This is of various types:
Either there are verses of quran after the topic, or the verses are part of the subject. In the above two the verses are sufficient substantiations.
However if there is a subject and no verse or hadith, the motive is either that the hadith isn’t always in conformity with the conditions set out by using Imam Bukhari or the hadith is referred to someplace else and to keep away from actual repetition, he did now not point out it or for sharpening the brains, that one ponders over a hadith to verify.
9. Sometimes a topic is noted twice, the purpose of the second is to complicated on the primary one.
10. Sometimes such a subject is noted that does not need any rationalization however he brings it to refute an opinion of a few muhaddith. This is not unusual in Bukhari Shareef in opposition to Musannaf Abdur Razzaak and Ibn Abi Shaiba.
5. Repetitions in Bukhari Shareef
Generally Imam Bukhari repeats a hadith however with a one-of-a-kind chain of narrators or extraordinary phrases. However there are about 21 or 22 locations in Bukhari Shareef wherein there are specific (sanad or phrases) repeated. This is certainly a totally negligent range in evaluation to the significant number of ahadith in Bukhari Shareef. However, wherein a hadith is repeated but with a exceptional chain of narrators or exceptional words, the blessings of reporting them are:
1. When one sahabi narrates a hadith, that same hadith is narrated through some other sahabi, the purpose of quoting the other sahabi’s narration is to take away the false impression of non-familiarity (garaabat).
2. One narrator charges the hadith short, the other complete, Imam Bukhari fees both as narrated by means of the narrators.
Three. A hadith is narrated with unique words, for every exchange of phrase he brings a distinctive topic and repeats it.
4. If there are two posibilities in a single narration, of damaged and unbroken chain of narrators (muttasil and ghair muttasil) Imam Bukhari fees the both opportunities to signify that the irsaal does no longer save you the itti’saal’s recognition.
5. Similarly if there are two possibilities, of dependant (mawkuuf) and whole (marfu) narrations.
6. In a few chain of narrators, if there is an addition, Imam Bukhari brings both variations to show that each are correct.
7. One narration is muanan, the opposite chain expresses assembly, Imam Bukhari brings each to take away doubt.
6. Important Books related to Bukhari Shareef
1. Aini (762-855 A.H.) – He wrote his sharah (commentary) over a duration of 27 years. This sharah consists of 25 volumes. In this meanings of the phrases within the hadith are given and the hyperlink between the subject (baab) and hadith and lots of other factors.
2. Fathul Baari (Ibn Hajar Asqalani 773 – 852 A.H.) – This sharah become written over a duration of 25 years. It includes thirteen volumes. Before this sharah, Ibn Hajar wrote (Alhadyus Saari) an introduction to Bukhari Shareef and Taghleequt-Taaleeq. After Aini wrote his sharah, Ibn Hajar wrote Intiqaasul I’tiraaz to answer Ainis objections. In Aini and Fathul Baari, there are answers of the equal objections through each other. This become additionally because of some college students eg. Burhaan ibn Khizar attending both discourses and informing each of them for that reason. However each the sharah have their own beauties and superb capabilities, but Aini is easier to consult and understood quickly, due to its concise and orderly fashion.
3. Irshaadus Saari (851- 923 A.H. Qastalani) – This sharah is likewise referred to as Sharah Qastalani. This sharah is a synopsis of the above sharahs.
Four. Alkawaakibud-daraari (Allama Kirmaani 717-786 A.H.) – The creator turned into napping by the kaba and there he was inspired to preserve this call for his sharah.
Five. Faizul Baari (Allama Badre Aalam) – Has written the primary points from Allama Anwar Shah Kashmiris instructions in Bukhari Shareef.
6. Alabwaab Wat-taraajim (Hazrath Sheikh Zakariyya) – This is a have to reference for Abwaab as well as other important discussions.
7. Laamiud Daraari – (Moulana Yahya Saheb) cited the points from Hazrath Moulana Rashid Ahmed Gangohi’s discourses of Bukhari Shareef.
AND ALLAH KNOWS BEST
Muqaam-e-Hadith (The Actual Status of Hadith)
The human mind has proved itself effete and tardy. Very careful scrutiny and ransacking of the thoughts is needed to attain the heart of any depend, however it eschews and cuts corners at every viable possibility. As the sector turns, new discoveries and legal guidelines are made in social circles and all the greater so within the realm of faith, in which some incidences have grow to be preferred clichés or myths of understanding over the passage of years. No one deems it important to think twice as to how maximum of those parables or folklore became the standards of awareness and religion although, these doctrines of knowledge might have been twisted via the generations.
The insurmountable impediment while analyzing, scrutinizing or giving our severe notion on any spiritual myth or cliché is the righteous halo we’ve woven round it. We recollect ourselves of a blasphemy, a sin of the highest intensity or committing a blunder of the superlative degree, to question the origins of any non secular delusion or cliché. No be counted how lots we make the character recognize the significance of cogent rationale on those standard religious clichés, nevertheless, his degree of notion hesitates to go into into broader horizons. It is usually located that someone is extra inclined towards locating a justification of the spiritual cliché one adheres to, instead of having an open and an unbiased mind. More bold than the internal turmoil are the fears of wrath from ones religious connoisseurs. The derogatory opinion and threats of being outcaste via these demigods, do no longer permit an individual to muster braveness enough to provide ones critical thoughts on these myths or tales attributed towards the bulwarks with unshakable religion.The Fear For Allah – islamic Article one
The Need for Research
On the alternative hand, if we agree and are of the opinion, that simplest ‘truth’ have to have value, that has been through the procedure of our rational sifting and handiest that ‘faith’ carries weight which has been received after our thorough speculation and cognitive stories, then it becomes incumbent upon us to weigh the professionals and cons of any spiritual issue. No depend how many treacherous peaks we may have to climb. At this factor, it’s far advised to refrain from our non-public conflicting non secular experiences and put off all external fears. In this connection we shall endeavour to take into account a common spiritual doctrine, that in our subconscious, appears as component and parcel of the core of our non secular set of beliefs.
You question any Muslim today as to how could he outline the machine or ‘DEEN’ of Islam. Without any hesitation we’re replied that, ‘Islam is a compound of the Holy Quran and Hadith.’ The indoctrination of this reply is so deep down in our hearts, we do now not have the faintest notion of doubt about it whilst answering, irrespective of how obviously self-contradictory the parable may appear to us. The essential query is, the parable or story we take so much with no consideration, the sentence we speak everyday with so much confidence and robust conviction; has it ever been brought to our private scrutiny and examined through motive, before being frequent by means of us? Or do we be given, simply as it has traveled down to us thru many, many generations. If that doesn’t appear to be the case, then let us have the braveness to stand the culmination of the ancestral paths we have chosen.
By rationalizing our perception we are acquiring dual advantage. If the parable or cliché stands the scrutiny of our attention, then it shall emerge as greater profound and ingrained in our minds and near our heart beats, in any other case we will recognise, we relinquished a fantasy that was not anything else however a rigmarole of a person’s fantasy. Even greater so, it’ll open our eyes to the reality that our belief turned into based totally on sheer custom. The technique of cogent reasoning whilst accepting any statement is also reaffirmed by means of the Holy Quran that characterizes momins as:
And those who do not fall (forsaketh purpose) for those ayats (Allah’s phrases) like the dumb and deaf. 25:seventy three
Reasoning additionally coincides with one of the postulates of the Holy Quran, in which is said:
Do no longer comply with that of that you knoweth not; do not forget, your feel of sight, listening to and cognitive abilities can be wondered. 17:36
DEEN
It is was hoping we are of no two evaluations over the truth, that Deen in reality is one that is invincible, in other phrases which isn’t based totally on fantasy or illusion. So it’s far stated in Quran:
Most of those (people) are susceptible to fantasy and rumour. In truth ‘phantasm’ will have no gain in contrast with ‘fact.’ And Allah knoweth every body as to what they do. 10:36
It will become obligatory for us, when it is stated, ‘Islam is a composition of the Holy Quran and Hadith,’ to determine whether in truth it takes place to be the case or now not. Is it in fact proper that both of the above noted books had been discovered as Deen in Islam through MuhammadPBUH? The Holy Book reiterates severa times, that this Book is not anything else however the ‘Truth.’
“What we have revealed unto you is reality…………” 35:31
The commencing words of this ebook of awareness are… . There is without a doubt no doubt approximately this e-book. In different words, it’s miles actual and not primarily based on delusion or phantasm. This is as a long way as the spirit of the Book is concerned. Now how was it revealed and compiled and in what potential is it going to exist, Quran similarly says:
Verily, unto us is the compilation and transmission of its know-how. Seventy five:17
It goes past compilation and explicitly asserts that we maintain its duty as a long way as its maintenance is worried. Till the Day of Judgment not a unmarried letter can be changed. It augurs:
Verily! We have discovered, unto us lies its upkeep. 15:nine
To provide this perception of upkeep a realistic form, it further commands:
O Muhammad! Deliver it to the human beings, what’s being found out unto you. Five:67
QURAN
What did the Messenger MuhammadPBUH do to enforce this command of Almighty, we nearly everybody are aware of it. Whatever become revealed unto the Messenger, he had each and each letter of the revelation dictated to his disciples or fans. Thousands had been made to memorize the revelations on MuhammadPBUH via coronary heart. Not best that, MuhammadPBUH himself listened to the ones verses who had learnt them by using coronary heart and then cast his seal of approval upon them.
Messenger MuhammadPBUH before taking his ultimate breadth, ascertained and made positive that something have been found out unto him, had been added to the humankind in its whole form. In his well-known sermon of final Friday of the closing Ramadan, before his soul departed from this world he bore Allah as his witness and showed from his target market, that he had added all revelations to them in its entire shape. In the caliphate length, after the unbearable demise of MuhammadPBUH, the 4 caliphs made it obligatory upon themselves, the sacred obligation of preserving the Holy Quran. Henceforth, these holy scriptures, that are within the hearts of myriad of Muslims and also on paper, are coming down over the years in its original and true shape. Even overseas spiritual students do not question its verity.
HADITH
However moved we can be, by way of the uniformity of our spiritual liturgy, the case with our Hadith in some way, does not seem to preserve water. We ought to now not pass over the reality that nowhere has Allah held the responsibility of hadith, as it has carried out in the case of the Holy Quran. That is of extreme significance, because the hadith includes parables and sayings of Messenger MuhammadPBUH and nothing else, we need to keep in mind Muhammad’s mind-set in the direction of hadith. If Hadith is part of Deen, then the methods Messenger followed for Quran are not carried out within the case of hadith. Like having it memorized, then being attentive to his fans for any errors or that he satisfactorily permitted what were dictated and written, that over and chiefly, it changed into in its natural and proper shape. Though the mind questions, if hadith is all that full-size, why the Messenger did now not take the same measures as he did in the case of Holy Quran? On the opposite, we find in that very hadith, Muhammad PBUH without a doubt says:
Do no longer have something else dictated from me, shop the Quran. If all and sundry of you has written any phrase aside from the Quran, erase it!
We also are informed that this changed into a temporary mandate from the Messenger. That at over again, it is found, upon the request of Hazrat Abdullah bin OmarR, the Messenger accepted them to jot down down his sayings. As is observed, the Messenger simplest accredited his followers, he did no longer make it mandatory for them to write down, as we discover he did, within the compilation of the Holy Quran. Moreover, he did not at each time, ask as to what that they had written or heard or query the verity in their writings. Neither we discover MuhammadPBUH adopting measures to safeguard or preserve the ones hadiths as he had done with Quran. It is normally said and believed that in the ones days the Arabs had stupendous reminiscence and additionally those sayings were very pricey to the hearts of the disciples. Now the thoughts once more questions, if reminiscence changed into sufficient of a possible aid to be depended upon, why then became the want felt to have the Holy Quran dictated and written on paper, then recited once more to remove any possibility of mistakes or mistakes for the duration of the system of its dictation. If any disciple of the Messenger had learnt the ones hadiths or sayings of the Messenger by heart, we nonetheless are not in a role to vouch for it. Until and until the ones sayings had been no longer verified, and the seal of approval forged on them by way of the Messenger Muhammad PBUH himself, we cannot rely on them. We also have no understanding of the Messenger ever giving to the Muslims the Hadith in the shape of a e-book and coming right down to us through the generations. We study the Messenger MuhammadPBUH did now not take any of the precautions inside the case of hadith, as he did for the Holy Quran.
What we have amassed from the historical sources, is that we do find documents aside from the Quran, that were written below the orders of MuhammadPBUH. For instance, contracts, treatises and letters that he sent to different tribes. What on this remember, has come to our information and what we have been able to gather, at the time of Messenger’s demise, are the subsequent:
· A register containing the list of names of 1500 holy disciples or followers of Muhammad PBUH.
· The letters MuhammadPBUH wrote to various kings and rulers of that age or time.
· Documents of treatise and different obligatory regulations.
· Hadiths from Hazrat Abdullah bin Omar, Hazrat Ali and Hazrat Uuns who wrote them on their personal.
No one is aware of if those sayings written down have been ever confirmed via the Messenger himself or not and whether they have got come all the way down to us in its unique version. We don’t have any understanding of any collected works or hadith that Messenger himself gave to the Muslims earlier than his departure from this global. We do in reality discover inside the Hadith of Bukhari, that someone requested Hazrat Ibn e AbbassR as to what MuhammadPBUH had left at the back of for the Muslims. He stated, ‘The Messenger left behind nothing, shop the Quran.’ (Bukhari, Vol. III, Fuzail ul Quran.) (Sahih Bukhari: Virtues of the Quran)
The Deeds of Disciples
As we leaf through the names of Islam’s ancient personalities, we be aware that once Muhammad’s lifetime, the caliphate length is likewise worth of being seemed into. In the Musnad of Imam Ahmad we discover the disciples saying,
“Whatever utterances we heard from MuhammadPBUH we noted them down in writing. One day it so took place the Messenger appeared and requested us about the situation of our writings. We responded that in any way we pay attention from his Majesty’s lips we transform it into writing. To which he stated,
“What! Are you compiling another ebook along side the book of Allah?”
Meaning in different phrases that this can not be made possible. He then insisted and commanded us that we have to preserve Allah’s phrases natural and that we should no longer amalgamate them with any kind of ambiguities. So we made a bonfire of our notes and parables in an open area.” (Quoted from Tudween e Hadith, page 249)
At some other example we discover Imam Zuhbi mentioning Hazrat Abu Bakr who collecting the disciples of the Messenger, after his passing away said,
‘You human beings have a lot self-contradictory gossip approximately MuhammadPBUH which you squabble among yourselves. The future generations will become greater inflexible than you all and quarrel extra. You have to no longer feign sayings of Holy Messenger which are fallacious. If every person inquires you may continually say that we have the Holy Quran between us. Whatsoever has been granted have to be made permissible and whatsoever has been prohibited ought to be relinquished.’ (Quoted in Tazkara tul Hifaaz e Zuhby, page 321)
Then Imam Zuhbi charges every other parable of the Messenger’s spouse Hazrat Aisha and writes:
“The spouse of the Messenger mentions that her father (Hazrat Abu Bakr) had collected the Hadiths of the Messenger which have been 5 hundred in number. She says,
‘One night I noticed that my father became stressed in his mattress and turned into very perturbed. I asked him if he was in some bodily ache or become this condition because of any horrific information that he would possibly have heard? He did now not solution my query. In the morning he asked me to carry him the gathering of Hadiths after which he made a bonfire of all of them.” (Quoted in Tudween e Hadith, web page 285-88)
As a long way as Hazrat Omar’s caliphate is concerned, Allama Ibne Abdulbur has referred to him in his famous e-book Jama e Biyaan ul ilm, in which he says:
“OmarR desired to assemble the sayings and parables of the Messenger. He asked from the companions of Messenger MuhammadPBUH to furnish him a decree, to which they faithfully conceded.
Inspite of the partners consent Hazrat OmarR turned into no longer convinced. For complete one month Hazrat OmarR executed Istekhara. Then one morning while Allah calmed his body and thoughts and he changed into able to deal with the issue to hand in serenity, he talked to his humans about his choice to assemble the hadiths. But then he stated I idea approximately the generations which have passed earlier than us, who wrote books and adhered to the ones books so strongly that they forgot the Book of Allah. I swear upon Allah, I will now not permit the word of Allah be amalgamated with other phrases.” (Quoted in Tadween e Hadith, page 394)
This changed into determined due to the fact the Messenger had ordered each associate not to invite him to dictate something else except the Quran. Whosoever has written anything else except Quran should erase it. Omar did not finish the matter here. He no longer simplest prohibited and banned the gathering of ahadith, he went a step in advance and as is written in Tubqaat ibn Sa’ad:
“During Hazrat Omar’s caliphate the ahadith had been in abundance. He made sure with the aid of placing the people beneath oath that something hadith the human beings had in their possession must be brought earlier than him. As ordered, the general public submitted whatever they possessed. He then ordered to make a public bonfire of these hadiths.” (vol.Five, page 141)
This turned into the 0.33 incident of igniting the hadith collection. The first ignition came about whilst the Messenger commanded. The 2nd instance changed into when Hazrat Abu BakrR did the identical along with his very own series and the third time Hazrat OmarR took all the collections from the human beings beneath oath and publicly ignited them. All this occurred inside the capital town. As to what happened afterwards we get a glimpse of it in Hafiz Ibne Abdulbur’s Jama e Biyaan in which he states:
“Hazrat Omar ibn KhattaabR first expressed his preference to assemble the ahadith, it dawned upon him later that it’ll no longer be appropriate. So he despatched a circular inside the districts and cantonments to ruin whichever hadith everyone turned into in ownership of.” (Tadween e Hadith,Vol.1, web page four hundred)
He writes in addition and offers us an in depth account, of ways intricate and precautionary measures have been taken for the compilation of the Holy Quran. If the authorities wanted, what in all likelihood may want to have come in the manner of adopting the identical coverage toward the compilation of the Hadith. He states that the authorities of that point did now not undertake the identical policy towards the Hadith with a selected reason. This turned into the situation at the time of the Messenger and his partners, of hadith.
Recapitulation:
1. The Messenger ordered his companions now not to ask him to dictate anything else besides the Quran.
2. Whatever Hadith series became gift most of the partners, it was ordered to be ignited.
Three. Hazrat Abu Bakr made a bonfire of his own series and banned others from quoting any hadith.
Four. Hazrat Omar after giving his nice thought for one month, reached the conclusion to prohibit the compilation and series of ahadith.
5. Hazrat Omar additionally requested to post all ahadith in possession of the public who were below oath after which ignited them all.
6. He also sent a round in all cities to spoil any evidence of hadith.
This did not take place by way of danger, in step with Maulana Munazar Ahsin Gilani this coverage changed into followed with a precise purpose in thoughts.
More Strict Measures:
Day after day Hazrat OmarR have become extra strict on this difficulty of transmission of hadith. According to Qaza bin Qa’ab, ” When Caliph Omar sent us to Iraq he emphatically drummed it into our heads, that Iraq became an area in which sounds of Quran echo like wild bees and we need to exercise intense precaution as now not to distract their minds with all types of ahadith.” It changed into asked from Abu HurairaR if at some stage in Hazrat Omar’s caliphate he ever remembered pointing out the hadith within the identical manner as he changed into doing now. To that he spoke back, if he had finished so Hazrat OmarR might have bodily scolded him. It has additionally come down to us that Hazrat OmarR had imprisoned Hazrat Abdullah bin Ma’soodR, Abu DurdaR and Abu Ma’sood AnsariR for illegally in possession of ahadith.
It is quite feasible these ahadith may have been weeded out because of ambiguity, even though in step with the author of this ebook they’re toward being real, as they were according to the standards of Quran and additionally parallel to the choice of MuhammadPBUH. We however, are not interested by debating in this point. Even if we do no longer have the above quoted hadiths, we still are in ownership of any other ancient reality that can not be denied. We examine that via the end of the caliphate length, there is not a single reproduction of Hadith that turned into compiled and completed underneath the supervision of any Caliph of that duration. From those historic facts it can without difficulty be decided, if the ones Caliphs or the Holy Messenger had ever taken into consideration the hadith to be part of the Deen of Islam, they might have followed the equal measures as have been taken towards the Holy Quran. Hence after the demise of the Messenger no steps had been taken in the direction of series of Hadith.
Hamam Ibn Mamba’s Manuscript
What the non secular scholars of hadith, after tons war, have succeeded in coming across, has come all the way down to us underneath the name of Hamam ibne Mamba’s manuscript. This become posted with the aid of Dr. Hameed ullah numerous years in the past from Hyderabad (India). It is believed that Hamam ibne Mamba turned into the student of Abu HurairaR who died in hijra 131. In this manuscript there are 138 ahadith in total, which its creator states were compiled before his teacher Abu Huraira. His trainer is thought to have departed from us in hijra 58. By different manner we are able to say that this manuscript became compiled earlier than hijra 58. We additionally observe that Imam Mamba writes these hadiths earlier than hijra 58 in Medina and is capable of obtain most effective 138 ahadith. Whereas in hijra three hundred while Imam Bokhari decides to collect ahadith he gathers 600 thousand. (Imam Humbal determined a million ahadith and Imam Yahya bin Moeen located 1,200,000 hadiths) Another fact we have a look at that the ones ahadith that have been confered upon Abu HurairaR quantity to hundreds, although his student changed into able to write simplest 138 ahadith. However, in the first century of the Islamic calendar, the sum general of all character series is Imam Mamba’s 138 ahadith. There aren’t any different written facts of Holy Messenger’s gospel belonging to that period of Islamic records.
Imam ZuhriWho Wrote The Holy Quran
At the near of hijra100 we word that Caliph Omar bin Abdul AzizR on his own, had a few work carried out on Hadith. After him turned into Imam Ibne Shahab ZuhryR who at the order of Caliph Bannu Umayya compiled a concise edition of Hadith and that also according to its author turned into towards his preference. At present we neither have any copy or manuscript of hadith of Hazrat Omar bin Abdul AzizR nor the concise edition of Shahab Zuhry. Although ahadith confered of their names are stated at a later period, when the need turned into felt to deliver into document the ancient events of Holy Messenger’s lifestyles. The material for the ancient statistics turned into a conglomerate of all that were coming all the way down to them via the generations. Some writers narrowed their studies to only the ones information that confer with the parables, gospels or sayings of the Messenger MuhammadR. This collection is titled Hadith (the very phrase hadith approach conversations).
The first compilation of Hadith that is gift today belongs to Imam Malik (died hijra179) and is called Muta. In it we find 3 to 5 hundred various ahadith, it in addition informs us about the activities of Messenger’s companions in Medina. After Imam Malik we find diverse different pupils venturing on this problem and compiling several specific variations of Hadith.
During the Abbasids length we have a look at mind-blowing development within the area of Islamic arts and sciences and along with that the range of hadith compilations also expanded. The most famous of all compilations that has come down to us is known as the ‘Sahiheen,’ these books are authored by means of Imam BokhariR and Imam MuslimR. Imam BukhariR who died in hijra 256 had made a collection of 600,000 ahadith. After sifting through diverse ahadith he sooner or later decided to preserve 2,630 and produced them in e book shape beneath the name of ‘Us’hal Kitab baaduz Kitab e Allah’ (The maximum natural book after the e book of Allah).
This Hadith is now being said as inseparable a part of the Deen of Islam. Six exclusive variations of Hadith are considered to be the most genuine by means of the Sunniites and are known as ‘Sahaa Sitaa.’ The Shiites have their own collections that are extraordinary from Sunniites. Those six versions come below the subsequent titles:
Sahih Bukhari / Sahih Muslim / Trimzi / Abu Dawood / Ibne Maja / Nisaayee
The creation to the authors of the above indexed collections is as follows:
· IMAM BUKHARI: He turned into born in Bukhari in hijra 256 and a few believe the date to be hijra 260 however we all recognize that he died in Samarkand. It is said that when wandering via exclusive cities and villages he accumulated near six hundred thousand hadiths and after sifting thru he discovered 7,300 ahadith that he considered near being genuine. Some were repeated in numerous chapters. If we do now not count the repetitions, the overall figures we get are 2,630 or 2,762.
· IMAM MUSLIM: Muslim bin Hajaj belonged to a town in Iran called Nishapur. He changed into born in hijra 204 and died in hijra 261.
· TRIMZI: Imam Abu Isa Muhammad Trimzi was from the metropolis called Trimz in Iran. He become born in hijra 209 and died in hijra 279.
· ABU DAWOOD: He comes from Seestan in Iran. He become born in hijra 202 and died in hijra 275.
· IBNE MAJA: Abu Abdullah Muhammad bin Zaid ibne Maja came from northern Iran, a metropolis that goes through the name of Kazdin. His yr of start is hijra 209 and he died in hijra 273.
· IMAM NISAAYEE: Imam Abdur Rahman Nisaayee got here from a city known as Nisa in Iran’s eastern province of Khorasan. He died in hijra 303.
After a quick introduction of those spiritual pupils one can without difficulty infer that (a) all of them got here from Iran. (b) None of these pupils turned into from Arab descent. We also word that not one of the Arabs have been prepared to do what those students have performed. (c) All of them had been born inside the 1/3 century. (d) Whatever ahadith had been amassed, have been all rumour, (e) there have been no written facts of hadith before their collections.
From these heaps of ahadith that were accumulated, they chose some and discarded others. The criterion of selection turned into their private judgment. For those gospels, their authors had no decree of any type from God (revealing to them as to which hadith to pick out and which of them to discard). Nor we find they’d the consent or approval of the Holy Messenger (proving that the selected ahadith had been the real parables or sayings of the Messenger). Again, there were no previous data that they might have borrowed the fabric for his or her collections. All the sayings have been simply word of the mouth they accumulated from numerous towns and villages. After giving their own judgment or approval those spiritual pupils decided on some and discredited others on their own. Hence the denounement of Hadith.
(After having assessed the long chase of the departed Messenger MuhammadPBUH, it seems as even though Allah turned into no greater an important Being in the existence of Muslims. Which turned into quite contrary to what Muhammad became trying to educate.)
How can every person vouch for those kinds of ahadith primarily based on hearsay or show, that in actuality those have been the original words of the Messenger? Keeping in mind that, after two or two and a half of centuries, no longer a single phrase may be guaranteed that it belonged to the Messenger, or has been conveyed from father to son or instructor to student by means of memorizing. These have been garbled words of preceding centuries.
(In as a lot as I could need to hear the precise phrases of the last of the Great Messengers; on the identical time to just accept a version that isn’t first hand, 2d hand or maybe third, forth or fifth hand, does now not make any sense at all. On the opposite, we are defeating our very cause for which the Ahadith had been written i.E., to searching for the Truth. And by means of accepting a clone, we are corroding our very own machine of thought.)
Discredited Ahadith
It might no longer be futile to understand the wide variety of ahadith that have been discredited.
Ahadith Compiler Found Ahadith Selected Ahadith for the e-book
Imam Bukhari six hundred,000 2,762 (after repetitions)
Imam Muslim 300,000 four,348
Imam Trimzi three hundred,000 3,one hundred fifteen
Imam Abu Dawood 500,000 four,800
Imam Ibn Maja four hundred,000 four,000
Imam Nisai 200,000 4,321
What comes to thoughts once more, after the sifting was done through the authors of hadith, who can say for certain the authors did no longer relegate the actual sayings or parables of the Messenger. Many of these ahadith that these authors have blanketed in their collection, also move against the Messenger. This dialogue may be taken afterward in this ebook.
From the above research, it is determined, the collection of parables and teachings of the Messenger became an person effort without any guarantee from Allah or any kind of consent from the Messenger. These findings additionally invite one to contemplate as to what would had been the condition of the DEEN (Quran), if it become thrown on the mercy of humankind.
It is widely discussed, we have been fortunate that Imam BukhariR and numerous different religious scholars had been capable of make a set, otherwise we’d have been (God forbid) robbed of our Islamic treasure. Some students pass thus far as to exclaim that handiest one 10th of the information is within the Quran and the rest of 9 tenths of the treasure is within the Hadiths. (No marvel 9 tenths of the time the arena is at struggle with each different). Please give your severe attention to this. A God who explicitly broadcasts in the Quran that ‘the gadget of DEEN is now complete,’ and after hearing that can we even for a moment consider, that the closing of the Messengers will go away so gargantuan quantity of different understanding about it on the mercy of destiny? I have grave doubts if so that it will make any feel!
INTERPRETED HADITH
It might have been possible, as we had seen with the retaining of the Holy Quran, that the phrases of the Messenger be made to tour from heart to coronary heart till they were compiled inside the shape of a book. Their authenticity might have been, to pretty an quantity vouched for. As we all understand now, even this become not the tale. The Hadith books which are gift nowadays, do now not contain the unique sayings of the MuhammadPBUH. These are interpretations of his gospel or sayings. As in common communication and literature we discover sentences with ‘in different phrases……….’ For example the Messenger’s associate heard him say or utter some thing and reached his very own conclusion and brought it to another companion in a one of a kind tone, then the second one tried to recognize and conveyed it to any other companion. Now consider this happening, no longer for at some point or two days, one or months, no longer even three hundred and sixty five days or years, this went on for a vital period of or two and a half of centuries. And these centuries, thoughts you, had been full of conspiracies and intrigues against the Islamic ideology. How lots truth is left, whilst sentences had been transferring from one mind to another for this extended time frame, I shall go away it that allows you to believe?
BENEFIT OF DOUBT
It could be worthwhile to mention Maulana Abul A. Maudoodi’s criticism right here. In order to very well recognize the genius of the Messenger, (what to talk about the overdue comers in Hadith writing) he gives his critique at the pioneer Abu Huraira as follows:
“Apparently, it seems that either Abu HurairaR become unable to comprehend Muhammad’s declaration or he did no longer pay attention him absolutely………..These kinds of misinterpretations are not uncommon in our Hadith literature, from time to time a announcing has been clarified through any other announcing whilst there are others which are still greater ambiguous.” (Quoted from Tasneem, Ahadith quantity, Oct. 14, 1959)
This turned into his viewpoint on the interpretation of the first compiler on Hadith. As a long way as transfering these interpretations to others is worried, the equal creator narrates in his ebook (Tafheemaat, extent, 1) as follows:
“Let us say for instance, I am giving a speech these days and lots of lots are taking note of me. Few hours later, when I have completed my speech (now not months or years, however only some hours later), just ask the people as to what I turned into announcing. It could be observed that every one translations may be distinctive from every different. Everyone will emphasize a one-of-a-kind part of the speech. Somebody will take down word for word while every other will interpret that sentence in step with his very own understanding. One character may have a higher mind and could provide the suitable meaning of it, whereas any other with restricted highbrow potential, can also garble the actual meanings. One person maybe having an awesome memory and can come up with a word for phrase translation, whereas another with a vulnerable memory will make mistakes conveying the meaning to others.”
SAYINGS ATTRIBUTED TO THE MESSENGER
This become in fact the manner in which the statements and parables of the Messenger traveled via or and a half centuries. That is truely the purpose while one reads the Quran we say it in all notion, (qalallahwatallah ) “which Allah promulgates.” When we start to relate any statement of Hadith we are saying ‘The Messenger of Allah said…’ And on the stop we are saying (oqamaqala’rasoolallah ) that means ‘otherwise or because the Messenger may have stated.’ That is also why the statements in Hadith are not considered the unique words of the Messenger. The statements in hadith are believed to be the ones which might be referenced to Messenger’s statements. And are not his precise phrases.
Narrators of Ahadith
It is apparent, inside the traditional parables, we stumble upon numerous names of writers, on a unmarried statement of the Messenger. After the compilation of Hadith, query arose as to the ethical health and behavior of these who’ve refered those statements. For that we need to take every and each hadith and check for the morals and man or woman of its author. This is one of those arts, of which we are able to proudly boast and that is little known anywhere else. We do not have the faintest bit of doubt on the aim of narrators. Again the essential query is, can we by way of this technique arrive at Truth? You can vouch for the character’s man or woman who is announcing the hadith to you, how will you say with authority that each one the folks who carried the words of Messenger had been honest at coronary heart or could be trusted. It is not the question of having self assurance in the ones writers, the most vital component is, were they able to thoroughly understanding a assertion and giving the proper interpretation of it. If we can show, that in or and a half centuries the phrases are capable of ultimate in their original form, then I assume we have solved the finest thriller of our instances……….. It is impossible!

 

 

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